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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

३५२ सूर्य-सिद्धान्त
इससे दो वक्र बन गये हैं। दो पासवाली ऊर्ध्वाधर (vertical) रेखाओं के बीच
का अन्तर ३ अंश और दो पासवाली क्षितिज (horizontal) रेखाओं के बीच का
अन्तर एक पल माना है। जब भा शून्य होता है तब र + १८.६ पल होता है और रा
शून्य होता है इसलिये शून्य भोगांश के सामने धनात्मक दिशा में १९वीं क्षैतिज रेखा
पर र के लिए एक बिन्दु बना दिया है। जब भा ३० अंश होता है तब र + १८.२
और रा - २.१४ होते हैं। इसलिए ३० भोगांश के सामने धनात्मक दिशा में १८वीं

त्रिप्रश्नाधिकार ३५३
क्षैतिज रेखा पर एक बिन्दु र के लिए और ऋणात्मक दिशा में २१वीं और २२वीं
क्षैतिज रेखाओं के बीच एक बिन्दु रा के लिए स्थिर किया गया है। इसी प्रकार
अन्य बिन्दु भी स्थिर किये गये हैं। र प्रकट करनेवाले जितने बिन्दु हैं उनको मिला
देने से ख ख ख ख वक्र बन गया है। इसी प्रकार रा प्रकट करने वाले बिन्दुओं को
मिला देने से खा खा खा खा वक्र बन गया है। इन दोनों वक्रों की सहायता से
क क क क वक्र इस प्रकार खींचा गया है—
शून्य भोगांश पर र = + १८.८ और रा = ० । इन दोनों का योग भी

  • १८.८ ही होगा इसलिए क क क क वक्र का बिंदु भी + १८.८ पर होगा अर्थात्
    इस दशा में ख ख ख ख और क क क क वक्रों के बिंदु सामान्य होंगे । ३० भोगांश
    पर र = + १८.२ और रा = - २१.४ । इन दोनों का योग - ३.२ है । इसलिए
    क क क क वक्र का बिंदु ऋणात्मक दिशा में तीसरी क्षैतिज रेखा पर होगा । ६०°
    भोगांश पर र = + १२.४ और रा = - २१.४ । इन दोनों का योग - ६ है । इसलिए
    क क क क वक्र का बिंदु ऋणात्मक दिशा में ६वीं क्षैतिज रेखा पर होगा । ६० भोगांश
    पर र = + ३.६ और रा = शून्य इसलिए क क क क वक्र का बिंदु धनात्मक दिशा
    दिशा में चौथी क्षैतिज रेखा पर होगा। यह बिंदु क क क क और ख ख ख ख दोनों
    वक्रों पर होगा, इत्यादि ।
    क क क क वक्र य भुज को (Axis of x को ) जहां चार बिंदुओं पर
    काटता है वहां यह प्रकट होता है कि काल-समीकरण शून्य है। इन समयों में सूर्य
    का मध्यम भोगांश क्रम से २३, ८२, १६० और २७३.५ के लगभग होते हैं। यह
    भोगांश क्रम से मेष की २ री, मिथुन की १ ली, सिंह की १६ वीं और धनु की
    १०वीं तिथियों को होते हैं। इसलिए इन तिथियों में काल-समीकरण शून्य होता है ।
    इसका अर्थ यह है कि इन तिथियों में स्पष्ट काल और मध्यम काल एक ही होते हैं।
    १७वीं तुला को काल समीकरण - ४१ पल है। इसका अर्थ यह है कि इस तिथि को
    स्पष्ट सावन काल में अथवा धूप-घड़ी के समय में ४१ पल घटाने से मध्यम काल
    (यांत्रिक घड़ी का समय) ज्ञात होगा । इसी प्रकार मकर की २६वीं तिथि को काल
    समीकरण + ३६ पल है, अर्थात् इस दिन धूप-घड़ी के समय में ३६ पल जोड़ने से
    मध्यम काल ज्ञात होगा ।
  • यह ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज रेखाएं चित्र में नहीं दिखलायी गई हैं। इनका
    अनुमान भोगांश के अंकों और बगल में दिये हुए धनात्मक यह ऋणात्मक १०, २०,
    ३० के अंकों से किया जा सकता है।
    २३

३५४ सूर्य-सिद्धान्त
अब यह सिद्ध हो गया कि जो लोग रेल या तारघर से मिली हुई घड़ी के समय
को ही धूप-घड़ी का भी समय समझ कर लग्न निकालते हैं उनका लग्न शुद्ध नहीं होता
क्योंकि धूप और मध्यम घड़ियों में कभी-कभी ४१ पल अथवा १६ मिनट का अंतर रहता
है । इसके सिवा देशान्तर के कारण भी अन्तर पड़ता है क्योंकि भारतवर्ष के रेल या तार-
घर की घड़ियों का समय ग्रीनविच के* मध्यम समय से ५ १/२ घंटा अथवा १३ घड़ी ४५ पल
आगे रखा जाता है । इसलिए यह समय केवल उन स्थानों के मध्यम काल के अनुसार
ठीक होता है जो ग्रीनविच से ५ १/२ घंटा अथवा ८२° ३०' पूर्व हैं । मिरजापुर ग्रीनविच
से ८२° ३८' १०'' पूर्व है । इसलिए मिरजापुर का मध्यम काल भारतीय मध्यम काल
से ८' १०'' अथवा ८ असु या सवा पल अधिक है । यदि सवा पल का विचार न किया
जाय तो कहा जा सकता है कि भारतीय मध्यम काल जो रेलवे और तार-घरों में
प्रयोग किया जाता है मिरजापुर के मध्यम काल के समान होता है । इसलिए पूर्व के
स्थानों के मध्यम काल जानने के लिए देशान्तर का संस्कार जोड़ना चाहिये और
पच्छिम के स्थानों का मध्यम काल जानने के लिए देशान्तर का संस्कार घटाना
चाहिए । यह नीचे के उदाहरणों से स्पष्ट होगा :-
उदाहरण १-प्रयाग में जिस समय सूर्योदय के उपरान्त धूप-घड़ी के अनुसार
१६ घड़ी १५ पल बीतता है उस समय रेलवे की घड़ी में क्या समय होगा जब सूर्य
का निरयण भोगांश उदय काल में ३रा ५° १' ६'' हो ?
इस दिन सूर्य कर्क राशि के ६ठे अंश पर है इसलिए कर्क की ६ठी तिथि है ।
सारिणी में कर्क की ७वीं तिथि को काल समीकरण + १५.४ पल है । इसलिए
सारिणी से केवल यही पता लग सकता है कि इस दिन काल समीकरण + १५ पल के
लगभग है । चित्र ६४ से जहाँ काल-समीकरण का वक्र दिया हुआ है यह पता चल
सकता है कि कर्क की ६ठी तिथि को काल समीकरण १५.४ पल से अधिक था या
कम । देखने से स्पष्ट है कि ७ कर्क के दिन क क क क वक्र के बिंदु की जो कोटि है
उससे कम ७ कर्क के पहले के दिनों में है इसलिए यह निश्चय होता है कि ६ कर्क को
काल समीकरण + १५.४ पल से कुछ कम है और ४ कर्क को यह ठीक + १५ पल
है । इसलिए अभीष्ट काल-समीकरण + १५.३ पल के लगभग है । यह धनात्मक है
इसलिए १६ घड़ी १५ पल में इसे जोड़ना चाहिए । इसलिए जब प्रयाग में धूप-घड़ी

  • कुछ लोग समझते हैं कि तार-घर की घड़ी में मदरास का समय रहता है
    परन्तु यह भ्रम है। मदरास में एक वेधशाला अवश्य है और पहले वही समय सब
    घड़ियों में रखा जाता था परन्तु अब नियम बदल दिया गया है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३५५
के अनुसार ६ कर्क को १६ घड़ी १५ पल होता है तब प्रयाग का मध्यम काल १६ घड़ी
३०.३ पल होगा ।
परन्तु प्रयाग का मध्यम काल भारतीय मध्यम काल से कम होता है क्योंकि
प्रयाग देशान्तर ग्रीनविच से ८१°५५'१५'' पूर्व है और भारतीय मध्यम काल
ग्रीनविच से ८२°३०' पूर्व होता है। इसलिए भारतीय मध्यम काल का देशान्तर
प्रयाग के देशान्तर से ३४'४५'' पूर्व है । जब देशान्तर में १° का अंतर
होता है तब समय में ४ मिनट या १० पल का अंतर हो जाता है और जब
देशान्तर में १ कला का अंतर होता है तब समय में १ असु का अंतर पड़ता है
इसलिए जब ३४'४५'' का अंतर है तब समय में ३५ असु या ६ पल के लगभग अंतर
पड़ेगा । भारतीय मध्यम काल के देशान्तर से प्रयाग पच्छिम में है इसलिए भारतीय
मध्यम काल प्रयाग के मध्यम काल से आगे है। इसलिए अभीष्ट काल में भारतीय
मध्यम काल १६ घड़ी ३०.३ पल+६ पल = १६ घड़ी ३६ पल के लगभग होगा ।
यह ६ घंटा ३८ मिनट २४ सेकंड के समान है ।
इस दिन सूर्योदय से मध्याह्न तक का स्पष्ट सावन काल १६ घड़ी ४३ पल
है (देखो पृष्ठ ३३१) जो ६ घंटा ४१ मिनट १२ सेकंड है। परन्तु मध्यान्ह ठीक १२
बजे होता है इसलिए १२ घंटा - ६ घंटा ४१ मिनट १२ सेकंड = ५ घंटा १८ मिनट
४८ सेकंड पर सूर्य का उदय हुआ होगा ।
सूर्योदय का स्पष्ट काल = ५ घं० १८ मि० ४८ से०
सूर्योदय से इष्ट समय तक का मध्यमकाल = ६ घं० ३८ मि० २४ से०
∴ रेल घड़ी का समय = ११ घं० ५७ मि० १२ से०
अर्थात् इस समय रेल की घड़ी में ११ बजकर ५७ मिनट और १२ सेकंड
होगा ।
उदाहरण २-यदि मध्यान्ह के बाद घड़ी में जो रेल की घड़ी से मिली
हुई है ५ बजकर २४ मिनट हुए हों तो काशी और प्रयाग की धूपघड़ियों में क्या
समय होंगे ? इस दिन सूर्योदय काल में सूर्य का भोगांश ६रा १५°२३'३४'' है ।
सूर्य तुला राशि के १६वें अंश पर है इसलिए इस दिन तुला नामक सौर
मास की १६वीं तिथि है । चित्र ६४ से प्रकट है कि तुला की ५वीं तिथि को काल
समीकरण - ३७.५ पल और २०वीं तिथि को - ४१ पल है। इससे सिद्ध होता है
कि १५ दिन में - ३.५ पल के लगभग काल समीकरण बढ़ा है । इसलिए ११ दिन में

३५६ सूर्य-सिद्धान्त
अर्थात् तुला की १६वीं तिथि को काल समीकरण - २७ बढ़कर - ४०.२ पल हो
जायगा जो - १६ मिनट के लगभग है। यह बतलाया गया है कि
मध्यम काल = स्पष्ट सावन काल + काल समीकरण
∵ ५ घंटा २४ मिनट = स्पष्ट सावन काल + (- १६ मिनट)
∴ स्पष्ट सावन काल = ५ घंटा २४ मिनट + १६ मिनट
= ५ घंटा ४० मिनट
यह समय ग्रीनविच से ८२ १/२ अंश पूर्व के देशान्तर-रेखा पर स्थित स्थानों की
धूपघड़ियों में होगा क्योंकि भारतवर्ष भर के तारघरों और रेल के स्टेशनों की
घड़ियाँ इसी देशान्तर रेखा के मध्यम काल से मिली रहती हैं।
काशी ग्रीनविच से ८३° ३' ४" अथवा ८३° ३' पूर्व है जो ८२° ३०' से ३३'
अधिक है इसलिए काशी का स्पष्ट सावन काल उपयुक्त सावन काल से ३३ असु
अथवा ५ १/२ पल अधिक होगा जो २ मिनट १२ सेकन्ड अथवा २ मिनट के समान है।
इसलिए उस समय काशी की धूप-घड़ी में ५ बजकर ४२ मिनट हुआ रहेगा ।
प्रयाग का देशान्तर ८१° ५५' १५" पूर्व है इसलिए यह ८२° ३०' से ३४'
४५" पच्छिम है। इसलिए यहाँ की धूप-घड़ी ३४ ३/४ असु या २ मिनट १६ सेकंड
पीछे होगी। इसलिए प्रयाग की धूपघड़ी में इस समय ५ घंटा ३७ मिनट ४१
सेकंड होगा।
उदाहरण ३—दूसरे उदाहरण में जो समय दिया हुआ है उस समय प्रयाग
में क्या लग्न होगा ?
पहले सूर्योदय का स्पष्ट काल जानना आवश्यक है। इसके लिए प्रयाग का
चर काल जानना चाहिए ।
सूर्य का निरयन भोगांश = ६ रा १५° २३' ३४"
१६८२ वि० की १६ तुला को अयनांश = २२° ४१' ६" [दे० पृ० २५३]
∴ सूर्य का सायन भोगांग = ७ रा ८° ४' ४०"
= ७ रा ८° ५'
= ६ राशि + ३८° ५'
∴ सूर्य की क्रान्ति ज्या = ज्या ३८° ५' × ज्या २३° २७'
[दे० पृ० १२३]
= ˙६१६८ × ˙३९७६
= ˙२४५४

त्रिप्रश्नाधिकार ३५७
$\therefore$ क्रान्ति = १४°१२'
सूर्य का सयन भोगांश ६ राशि से अधिक है, इसलिए यह दक्षिण क्रान्ति है ।
चर ज्या = स्परे अक्षांश $\times$ स्परे क्रान्ति
= स्परे २५°२५' $\times$ स्परे १४°१२'
= .४७५२ $\times$ .२५३०
= .१२०२
$\because$ चरांश = ६°५४'
$\because$ चर पल = ६१ पल
= २७ मिनट ३६ सेकंड
क्रान्ति दक्षिण है इसलिए धूपघड़ी में ६ बज कर २७ मिनट ३६* सेकंड पर
प्रयाग में सूर्य का उदय होगा । परन्तु इस दिन काल समीकरण - १६ मिनट है ।
इसलिए सूर्योदय काल में प्रयाग का मध्यम काल = ६ बजकर २७ मिनट ३६
सेकंड - १६ मिनट = ६ बजकर ११ मिनट ३६ सेकंड
प्रयाग के सूर्योदय काल में भारतवर्ष का मध्यम काल क्या होगा यह जानने के
लिए २ मिनट १६ सेकंड और जोड़ना होगा क्योंकि प्रयाग २ मिनट १६ सेकंड
पच्छिम है इसलिए यहाँ का मध्यम या स्पष्टकाल भारतवर्ष के मध्यम काल से इतना
ही पीछे होगा, इसलिए प्रयाग में सूर्योदय के समय रेल की घड़ी में ६ बजकर १३
मिनट ३५ सेकंड हुआ रहेगा ।
सूर्योदय से मध्यम मध्यान्ह काल १२ घंटा - ६ घंटा १३ मिनट ३५ सेकंड
अथवा ५ घंटा ४६ मिनट २५ सेकंड पर होता है और संध्या के ५ बजकर २४ मिनट
तक ११ घंटा १० मिनट २५ सेकंड होता है । यह २७ घड़ी ५६ पल के समान है ।
इसलिए इष्टकाल में सूर्योदयोपरान्त २७ घड़ी ५६ पल है । यह मध्यम सावन काल
है । इसको नाक्षत्र काल में बदल कर लग्न जानने में सुविधा होगी ।
६ सावन घड़ी = ६ नाक्षत्र घड़ी + १ नाक्षत्र पल (पृष्ठ ३२६)
$\because$ २८ सावन घड़ी = २८ नाक्षत्र घड़ी + ५ नाक्षत्र पल
$\because$ २७ घड़ी ५६ पल (सावन)
= २७ घड़ी ५६ पल + ५ पल (नाक्षत्र)
= २८ घड़ी १ पल (नाक्षत्र)

  • वर्तन (Refraction of light) के कारण सूर्योदय इससे भी कुछ पहले
    होता है जिसकी चर्चा आगे की जायगी ।

३५८ सूर्य-सिद्धान्त
उदयकाल में सूर्य का निरयन भोगांश = ६^{रा} १५° २३.′ ३४″
= ६^{रा} १५° २४′
इसलिए उदयकाल में तुला राशि का १५° २४′ लग्न है ।
प्रयाग में तुला राशि का उदयकाल ५ घड़ी ४२ पल है ।
जब ३०° का उदय ५ घड़ी ४२ पल में होता है
तब १५° ,, २ घड़ी ५१ पल में होगा
और ३०′ ,, ५ पल ४२ वि० में होगा
६′ ,, १ पल ८ वि० में होगा
∴ १५° २४′ का उदय २ घड़ी ५५ पल ३४ वि० में होगा
अर्थात् तुला का भुक्तकाल = २ घड़ी ५६ पल के लगभग
∴ तुला का भोग्यकाल = २ घड़ी ४६ पल के लगभग
वृश्चिक का उदयकाल = ५ ,, ४४ ,,
धनु का ,, ५ ,, १५ ,,
मकर का ,, ४ ,, २५ ,,
कुंभ का ,, ३ ,, ४८ ,,
मीन का ,, ३ ,, ४१ ,,
कुल का योग २५ ,, ३६ ,,
अर्थात् सूर्योदय से २५ घड़ी ३६ पल तक मीन राशि का उदय हो चुका ।
इसलिए इष्टकाल में मेष राशि उदय हो रही है इसलिए यही उदय लग्न है ।
इसी को साधारणतः लग्न कहते हैं । यह जानने के लिए कि मेष राशि का कौन बिंदु
लग्न है अनुपात से काम लेना चाहिये ।
इष्टकाल = २८ घड़ी १ पल
मीन के अंत का उदयकाल २५ घड़ी ३६ पल
मेष का भुक्तकाल = २ घड़ी २५ पल
= १४२ पल
मेष का उदयकाल = ४ घड़ी ४ पल = २४४ पल
२४४ पल: १४२ पल :: ३० अंश: भुक्तांश
∴ भुक्तांश = (१४२ × ३०) / २४४ = १७° २७.′५
∴ मेष का १७° २७.′५ लग्न है ।

त्रिप्रश्नाधिकार ३५६
उदाहरण ४—यदि प्रयाग में सूर्योदय काल के स्पष्ट सूर्य का निरयन
भोगांश ६रा १५°२३' ३४" हो तो उस दिन उज्जैन में जिस समय सूर्य यामोत्तरवृत्त
पर आवेगा उस समय भारतीय मध्यम काल क्या होगा ?
उज्जैन ग्रीनविच से ७५°४६' पूर्व देशान्तर और २३°६' उत्तर अक्षांश पर
है । प्रयाग का देशान्तर ८१°५५' १५" और उत्तर अक्षांश २५°२५' है ।
उज्जैन प्रयाग से ८१°५५' १५" - ७५°४६' = ६°९' १५" पच्छिम है।
इसलिए उज्जैन का स्पष्ट मध्यान्ह प्रयाग के स्पष्ट मध्यान्ह से २४ मिनट ३७ सेकंड
पीछे होगा । तीसरे उदाहरण में बतलाया गया है कि प्रयाग में धूपघड़ी के अनुसार
६ बजकर २७ मिनट ३६ सेकंड पर सूर्योदय होगा। इसलिए सूर्योदय के समय
नतकाल = १२ घंटा - ६ घं० २७ मि० ३६ से०
= ५ घंटा ३२ मि० २४ से०
अर्थात् सूर्योदय के ५ घंटा ३२ मिनट २४ सेकंड उपरान्त स्पष्ट मध्यान्ह
होगा। परन्तु सूर्योदय के समय भारतीय मध्यमकाल ६ घंटा १३ मिनट ३५ सेकंड
होता है इसलिए प्रयाग में स्पष्ट मध्यान्ह के समय भारतीय मध्यकाल = ६ घंटा १३
मि० ३५ से० + ५ घं० ३२ मि० २४ से०
= ११ घंटा ४५ मिनट ४६ सेकंड
उज्जैन प्रयाग से २४ मिनट ३७ सेकंड पच्छिम है इसलिए यहाँ स्पष्ट मध्यान्ह
प्रयाग के स्पष्ट मध्यान्ह से २४ मिनट ३७ सेकंड पीछे होगा। परन्तु प्रयाग के स्पष्ट
मध्यान्ह के समय भारतीय मध्यम काल ११ घंटा ४५ मिनट ४६ सेकंड होता है,
इसलिए उज्जैन के स्पष्ट मध्यान्ह के समय रेल की घड़ी में १२ बजकर १० मिनट
२६ सेकंड हुआ रहेगा ।
पृष्ठ ८० की टिप्पणी में लिखा गया है कि किरणों के झुक जाने के कारण
गणना के समय से सूर्योदय कुछ पहले हो जाता है। इसलिए यह बतलाना आवश्यक
है कि किरणों का झुकना क्या है और इससे दिन के परिमाण में जो अन्तर पड़ जाता
है उसका संशोधन कैसे करना चाहिये ।
वर्तन (REFRACTION OF LIGHT)
हवा, जल, कांच, अभ्रक ऐसे पदार्थ हैं जिनमें प्रकाश घुसकर दूसरी ओर
चला जाता है। इसलिए ये पारदर्शक (transparent) कहलाते हैं। जब प्रकाश
एक समजातीय (homogeneous) पारदर्शक पदार्थ से दूसरे समजातीय पारदर्शक

३६० सूर्य-सिद्धान्त
पदार्थ में जाता है तब उसकी दिशा वही नहीं रहती जो पहले पारदर्शक पदार्थ में
होती है। इस घटना को किरण का वर्तन या केवल वर्तन कहते हैं। इसको कुछ
लेखकों ने किरणवक्रौभवन का नाम दिया है परन्तु कई बातों की सुविधा के विचार
से इसको वर्तन कहना अच्छा जान पड़ता है। इससे किसी वस्तु के यथार्थ और स्पष्ट
स्थानों में बड़ा अन्तर देख पड़ता है। कभी-कभी वस्तुएँ विचित्र रूप धारण कर लेती
हैं। परन्तु इन सब घटनाओं की चर्चा करने के लिए यह स्थान उचित नहीं है। यहाँ
केवल उतना ही बतलाया जायगा जितना ज्योतिष से सम्बन्ध रखता है। अनुभव के
लिए एक छोटा सा उदाहरण देना पर्याप्त होगा :-
चित्र ६५
पानी भरा हुआ गिलास धूप में रख दो और देखो कि गिलास का कितना
भाग धूप से प्रकाशित होता है। पानी गिरा कर गिलास को फिर उसी जगह रख
दो। इस बार गिलास का कुछ कम भाग प्रकाशित होगा। चित्र ६५ में ग गा एक
गिलास है। यदि पानी भर कर यह धूप में रखा जाय तो ग से भ तक प्रकाशित देख
पड़ता है अर्थात् यह देख पड़ता है कि धूप गिलास के पेंदे के किनारे तक भी पहुँचती
है। परन्तु पानी गिरा कर गिलास को फिर वहीं रख देने पर देख पड़ता है कि अब
गिलास का केवल ग ख भाग प्रकाशित रहता है, पेंदे तक धूप जाती ही नहीं। इससे
यह प्रकट होता है कि हवा में यदि किरण स गा ख दिशा में होती है तो पानी में
घुसने ही यह गा भ दिशा में हो जाती है।

विप्रश्नाधिकार ३६१
यदि प्रकाश की कोई किरण स प एक सजातीय पारदर्शक पदार्थ ह ह से
दूसरे सजातीय पारदर्शक पदार्थ ज ज में प विन्दु से प्रवेश करके प न दिशा में
चलती हुई न विन्दु से वह फिर ह ह पदार्थ में निकल आती है तो न सा और स प
किरणें समानान्तर होती हैं । स प को आपात किरण (incident ray) प न को वर्तित
किरण (refracted ray) और न सा को निर्गत किरण (emergent ray) कहते हैं ।
यदि प विन्दु पर ल प ला लम्ब (Normal) हो तो स प ल कोण को आपात कोण
(angle of incidence) और न प ला कोण को वर्तित कोण (angle of refrac-
tion) कहते हैं । आपात और वर्तित किरणों तथा प्रवेश विन्दु का लम्ब एक ही तल
में रहते हैं ।
आपात और वर्तित कोणों में जो परस्पर सम्बन्ध होता है वह नीचे के सूत्र
से प्रकट किया जाता है—
आपात कोण की ज्या / वर्तित कोण की ज्या = स्थिर संख्या
यदि आपात कोण को अ, वर्तित कोण को व और स्थिर संख्या को ध से
सूचित किया जाय तो उपर्युक्त सूत्र का सरल रूप यह होगा
ज्या अ / ज्या व = ध; अथवा ज्या अ = ध × ज्या व

चित्र ६६

अ के बदलने से व भी इस तरह बदलेगा कि इन दोनों की ज्याओं का
सम्बन्ध सदैव ध के समान होगा । ध का परिणाम दो पारदर्शक पदार्थों के गुण के

३६२ सूर्य-सिद्धान्त
अनुसार बदलता है । इसको पहले पारदर्शक पदार्थ से दूसरे पारदर्शक पदार्थ का
वर्तनाङ्क (index of refraction) कहते हैं । जब प्रकाश पतले पारदर्शक पदार्थ से
घन पारदर्शक पदार्थ में जाता है तब वर्तित किरण लम्ब की ओर झुक जाती है अर्थात्
वर्तित कोण आपात कोण से छोटा होता है । परन्तु जब प्रकाश घने पदार्थ से पतले
पदार्थ में जाता है तब वह लम्ब से दूर हो जाता है । चित्र ६६ में ज ज पदार्थ ह ह
पदार्थ से घना है इसलिए ज ज में वर्तित किरण लम्ब की ओर हो गई है और ज ज
से निकल कर ह ह में आते समय वह लम्ब से दूर हो गयी है । यदि प्रकाश की दिशा
उलट जाय अर्थात् ज ज में इसकी दिशा न प हो तो ह ह में इसकी दिशा प स हो
जायगी । कई पारदर्शक पदार्थों में होता हुआ प्रकाश जिस जिस वक्र या टूटी हुई
रेखा से जाता है यदि दिशा उलट जाय तो उसी उसी रेखा से वह लौट भी आता है ।
मान लो ह ह, हि हि तीन पारदर्शक पदार्थों के स्तर हैं जो परस्पर
समानान्तर हैं ।
चित्र ६७
यदि ह ह से हा हा का वर्तनाङ्क धा हो और ह ह से हि हि का वर्तनांक धि है
तो हा हा से हि हि के वर्तनाङ्क का ज्ञान सहज ही हो सकता है । यह परीक्षा से
अनुभव किया जा सकता है कि यदि प्रकाश ह ह से हा हा और हि हि होता हुआ
फिर ह ह में प्रवेश करे तो इसकी जो दिशा पहले ह ह में होती है वही अन्त में भी
होती है अर्थात् ह ह और हा हा के प्रवेश बिंदु पर जो अ पात कोण बनता है वही
हि हि से ह ह में निकलते समय निर्गत बिंदु पर भी बनता है । वर्तन के नियम के
अनुसार

विप्रश्नाधिकार ३६३
ज्या अ = घा X ज्या वा; ज्या अ = धि X ज्या वि
∵ घा X ज्या वा = धि X ज्या वि
अथवा ज्या वा / ज्या वि = धि / घा
इससे यह सिद्ध होता है कि यदि एक पदार्थ ह ह से दूसरे पदार्थ हा हा का
वर्तनाङ्क धा हो और पहले ही पदार्थ से तीसरे पदार्थ हि हि का वर्तनांक धि हो और
यदि हा हा से हि हि में जाने वाली किरण का आपात कोण वा और वर्तित कोण वि
हो तो दूसरे पदार्थ हा हा से तीसरे पदार्थ हि हि में जाने वाली किरण का वर्तनाङ्क
धि ÷ घा होगा ।
ज्योतिष संबंधी वर्तन—खगोल पिंडों से जो प्रकाश पृथ्वी पर आता है उसकी
किरणें जब वातावरण में घुसती हैं तब इनमें वर्तन होता है। ऐसे वर्तन को ज्योतिष
संबंधी वर्तन (Astronomical refraction) कहते हैं। वातावरण का घनत्व ऊपर से
नीचे तक एक सा नहीं है। जैसे जैसे पृथ्वी से दूरी अधिक होती जाती है तैसे तैसे
वातावरण पतला होता जाता है इसलिए कुल वातावरण सजातीय नहीं है।
खगोलीय पिंड से आती हुई किरण जब वातावरण में प्रवेश करती है तब पहले बहुत
पतले स्तर में जाती है और ज्यों ज्यों पृथ्वी के निकट पहुंचती आती है त्यों त्यों कम
घने से अधिक घने स्तर में आने के कारण वह लम्ब की ओर कुछ कुछ झुकती हुई
पृथ्वी पर पहुँचती है। इसलिए वातावरण में इसका मार्ग वक्र होता है। पृथ्वी पर
पहुँचते समय किरण की जो दिशा होती है उसी में खगोलीय पिंड देख पड़ता है।
किसी तारे से कोई किरण त क की दिशा में क तक सीधी आकर क स्थान
पर वातावरण में प्रवेश करती है। इस स्थान से इसकी राह सीधी नहीं रहती। क
से द्रष्टा के स्थान द तक किरण को वातावरण के भिन्न-भिन्न स्तरों में घुसना पड़ता
है जो क्रमशः घनी होती जाती हैं। इसलिए किरण भी क्रमशः वक्र होती जाती है
और अन्त में द तक पहुँच जाती है। इस वक्र के द बिन्दु पर द ति स्पर्शरेखा है।
द्रष्टा को जान पड़ता है कि तारा द ति दिशा में है। यदि द से द ता रेखा क त के
समानान्तर खींची जाय तो द ता* दिशा में तारा उस समय देख पड़ता जब किरण
को झुका देनेवाला वातावरण न होता। इसलिए वातावरण का प्रभाव यह हुआ कि

  • बिलकुल शुद्ध दिशा द त है परन्तु त तारा इतनी दूर है कि त द ता
    कोण शून्य के समान है।

३६४ सूर्य-सिद्धान्त
ख
ति
त
ता
द
चित्र ६८
तारे का स्पष्ट स्थान ता से ति हो गया अर्थात् तारा खस्वस्तिक ख की ओर कुछ
चढ़ा हुआ देख पड़ता है । इसलिए वर्तन के कारण खगोलीय पिंड का नतांश कुछ
कम हो जाता है और उन्नतांश उतना ही अधिक हो जाता है । चित्र में इस वर्तन
का परिमाण ता द ति कोण के समान है । त का यथार्थ नतांश ता द ख और
स्पष्ट नतांश ति द ख है । जिस समय खगोलीय पिंड क्षितिज में रहता है उस समय
उसका वर्तन सबसे अधिक ३५' के लगभग होता है ।
अब यह प्रकट हो गया होगा कि वातावरण के कारण किसी खगोलीय पिंड
का स्पष्ट स्थान वही नहीं होता जो यथार्थ में होना चाहिए । इसलिए यदि वर्तन का
संस्कार न किया जाय तो गणना में कुछ भूल रह जाती है । नीचे एक सारिणी* दी

  • R. S. Ball's Spherical Astronomy page 120.

विप्रश्नाधिकार ३६५
जाती है जिससे यह जान पड़ेगा कि वर्तन के कारण किसी तारे का नतांश कितना
कम हो जाता है। यह सारिणी उस समय की है जिस समय वातावरण का दबाव
३० इंच ऊँचे पारे के दबाव के समान होता है और तापक्रम ५०° फारनहैट के समान
होता है। इससे भिन्न अवस्था में कुछ अंतर हो जाता है।

स्पष्ट नतांशवर्तनस्पष्ट नतांशवर्तनस्पष्ट नतांशवर्तन
०°०″३५°४१″७०°२′ ३६″
५°५″४०°४६″७५°३′ ३४″
१०°१०″४५°५८″८०°५′ १६″
१५°१६″५०°१′ ६″८५°९′ ५१″
२०°२१″५५°१′ २३″८७°१४′ २३″
२५°२७″६०°१′ ४१″८८°१८′ १६″
३०°३४″६५°२′ ४″८८° ४०′२२′ २३″
९०°३५′ लगभग

इस सारिणी से किसी तारे का यथार्थ नतांश सहज ही जाना जा सकता है।
जैसे यदि किसी तारे का स्पष्ट नतांश ६०° हो तो इसका यथार्थ नतांश ६०° १′ ४१″
होगा। यह भी ध्यान देने की बात है कि जो तारा ठीक सिर के ऊपर (खस्वस्तिक
पर) रहता है उसका स्पष्ट और यथार्थ स्थान एक ही होता है और यदि स्पष्ट नतांश
४५° से कम हो तो उसका वर्तन १′ से अधिक नहीं होता है। यदि स्पष्ट नतांश
२०° से अधिक न हो तो प्रति १° नतांश के लिए १″ वर्तन होता है।
वातावरण सम्बन्धी वर्तन की साधारण मीमांसा—
सरलता के लिए यह समझ लेना अच्छा होगा कि पृथ्वी पूर्ण गोल है और
वातावरण में नीचे से ऊपर तक पतले-पतले स्तर हैं जिनके केन्द्र भी वही हैं जो पृथ्वी

३६६ सूर्य-सिद्धान्त
का केन्द्र है । यह भी मान लेना चाहिए कि प्रत्येक स्तर का वर्तनाङ्क उस स्तर में सब
जगह स्थिर है परन्तु एक स्तर का वर्तनाङ्क दूसरे स्तर के वर्तनाङ्क से भिन्न है ।
चित्र ६६
चित्र ६६ में ऐसे दो स्तरों हा हा ओर हि हि का सम्बन्ध दिखलाया जाता
है । मान लो कि जब प्रकाश शून्य (aether) से हा हा में आता है तब इसका
वर्तनाङ्क धा और जब प्रकाश शून्य से हि हि में आता है तब इसका वर्तनाङ्क धि
होता है । मान लो कि हा हा में किरण की दिशा च छ है और हि हि में इसी किरण
की दिशा छ ज हो जाती है ।
यदि भ पृथ्वी का केन्द्र हो और भ च = का, भ छ = कि,
∠ भ च छ = आ, ∠ भ छ ज = इ ओर ∠ स छ च = उ हो,
तो पृष्ठ ३६३ के अनुसार
ज्या उ / ज्या इ = धि / धा ∴ ज्या उ = ज्या इ × धि / धा
परन्तु भ च छ त्रिभुज में
ज्या उ / का = ज्या आ / कि ∴ ज्या उ = ज्या आ × का / कि

त्रिप्रश्नाधिकार ३६७
धि का
∵ ज्या इ × ── = ज्या आ × ──
घा कि
अथवा किं × धि × ज्या इ = का × धा × ज्या आ
यह नियम किसी दो पासवाले स्तरों के लिये ठीक है। इस प्रकार यह
साधारण नियम निकल आता है—
यदि वातावरण गोल सजातीय स्तरों का बना हुआ मान लिया जाय जिनका
केन्द्र वही हो जो पृथिवी का केन्द्र है परन्तु जिनका घनत्व एक दूसरे से भिन्न होता
जाता है तो जब प्रकाश की किरण एक स्तर से दूसरे स्तर में घुसती हुई आगे बढ़ती
है तब किसी स्तर के वर्तनाङ्क, त्रिज्या और वर्तित कोण की ज्या के गुणनफल स्थिर
होते हैं ।
इस नियम को नीचे के सूत्र से भी प्रकट किया जा सकता है—
का × धा × ज्या आ = क × ध × ज्या न् (१)
जहाँ का, धा और आ क्रमशः किसी स्तर की त्रिज्या, वर्तनांक और वर्तित
कोण और क, ध, न क्रमशः पृथिवी की त्रिज्या, सबसे नीचे के स्तर के वर्तनांक और
वर्तित कोण हैं । भूतल को छूने वाले स्तर में जो वर्तित कोण है वह प्रायः नतांश के
समान होता है इसलिए न खगोलीय पिंड का स्पष्ट नतांश भी है ।
यदि इन स्तरों को बहुत पतला मान लिया जाय तो किरण का मार्ग टूटी हुई
रेखा के स्थान में वक्र रेखा होगी । मान लो च छ ज वह वक्र है जिस पर किरण इन
पतले पतले स्तरों में क्रमशः घुसती हुई पृथिवी तल के ज विन्दु पर पहुँचती है । इस
वक्र के छ विन्दु पर छ ल झ एक स्पर्शरेखा है। किरण छ विन्दु पर जिस स्तर में
घुसती है उसका वर्तनांक धा और त्रिज्या का हैं। यह स्पर्शरेखा वक्र बनानेवाली
किरण से कुछ दूर तक एक हो जाती है इसलिए इस विन्दु पर जो वर्तित कोण
बनता है वह छ ल भ कोण के समान होता है । मान लो यह आ के समान है, जब
किरण वातावरण के सबसे ऊपरवाले स्तर में घुसती है तब इसकी दिशा वही होती
है जो शून्य में उसकी यथार्थ दिशा है । जिस समय किरण पृथिवी तल के विन्दु ज पर
पहुँचती है उस समय इस विन्दु पर वक्र की जो स्पर्शरेखा ज स होती है वह उस
दिशा को सूचित करती है जिसमें किरण द्रष्टा की आंख में पहुँचती है । यदि ज
स्थान का खस्वस्तिक ख हो तो यही ख ज स कोण तारे का स्पष्ट नतांश होता है ।
सबसे ऊपर वाले स्तर में वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है तथा पृथिवी तल के बिन्दु पर
वक्र की जो स्पर्शरेखा होती है उन दोनों के बीच में जो कोण होता है वही ज्योतिष
सम्बन्धी वर्तन कहलाता है। इसी के जानने से किसी तारे के स्पष्ट और यथार्थ स्थान
की जानकारी हो सकती है। इसी को साधारणतः वर्तन कहते हैं। यदि इसका

१६८ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र ७०
परिमाण व माना जाय तो ता (व) अर्थात् व की तत्कालिक गति पासवाले किसी दो
स्तरों के वर्तनों का अन्तर और ता (धा) अर्थात वर्तनांक की तात्कालिक गति उन्हीं
दो स्तरों के वर्तनांकों का अन्तर हुआ । यदि आ और इ इन दोनों स्तरों के वर्तित
कोण तथा धा, धि इनके वर्तनांक हों तो
आ - इ = ता (व) और धि - धा = ता (धा)
∵ इ = आ - ता (व) और धि = धा + ता (धा)
परन्तु का × धा × ज्या आ = कि × धि × ज्या इ
यदि वातावरण के दो पतले स्तर बहुत पास हों तो उनकी त्रिज्याएँ प्रायः
समान होती हैं इसलिए का = कि । ऐसी दशा में
धा × ज्या आ = धि × ज्या इ
= [धा + ता (धा) ] × ज्या [आ - ता (व)]
= [धा + ता (धा)] × [ज्या आ × कोज्या ता (व) -
कोज्या आ × ज्या ता (व)]
परन्तु ता (व) बहुत छोटा और चापीय मान में है इसलिए ज्या ता (व) =
ता (व) और कोज्या ता (व) = १

विप्रश्नाधिकार ३६६
$\therefore$ घा $\times$ ज्या आ
$=$ [घा $+$ ता (धा)] [ज्या आ $-$ ता (व) $\times$ कोज्या आ]
$=$ घा $\times$ ज्या आ $-$ घा $\times$ ता (व) $\times$ कोज्या आ $+$ ता (धा) $\times$ ज्या आ
क्योंकि चौथे पद में ता (धा) और ता (व) के गुणनफल का गुणक
(coefficient) बहुत छोटा है इसलिए छोड़ दिया गया है ।
$\therefore \circ =$ ता (धा) $\times$ ज्या आ $-$ घा $\times$ ता (व) $\times$ कोज्या आ
$\therefore \frac{ज्या आ}{घा \times कोज्या आ} = \frac{ता (व)}{ता (धा)}$
अथवा $\frac{ता (व)}{ता (धा)} = \frac{स्परे आ}{घा}$ \hfill (२)
समीकरण (१) और (२) से ऐसा समीकरण जाना जा सकता है जिसमें आ
न रहे ।
समीकरण (१) से ज्या आ $= \frac{क \times ध \times ज्या न}{क \times घा}$
त्रिकोणमिति के यह प्रकट है कि
स्परेआ $= \frac{ज्या आ}{\sqrt{(१ - ज्या^२ आ)}}$
$= \frac{\frac{क \times ध \times ज्या न}{का \times घा}}{\sqrt{( १ - \frac{क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न}{का^२ \times घा^२} )}}$
$= \frac{क \times ध \times ज्या न}{\sqrt{(का^२ \times घा^२ - क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न)}}$
$\therefore \frac{ता ( व )}{ता (धा )} = \frac{१}{घा} \times \frac{क \times ध \times ज्या न}{\sqrt{(का^२ \times घा^२ - क^२ \times ध^२ \times ज्या^२ न)}}$
यही ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन का साधारण चलन-समीकरण (differential
equation) है। यदि सबसे ऊपरवाले स्तर का वर्तनांक १ और सबसे नीचेवाले
स्तर का वर्तनांक ध मान लिये जाय और उपर्युक्त चलन समीकरण का इन्हीं सीमाओं
के बीच चलराशिकलन (Integration) किया जाय तो ज्योतिष सम्बन्धी वर्तन का
पूरा ज्ञान किया जा सकता है। परन्तु ऐसा करने में कठिनाई यह पड़ती है कि इस
चलन समीकरण में का और धा दो चल राशियाँ (Variables) हैं जिनका परस्पर
सम्बन्ध ज्ञात नहीं हो सकता क्योंकि हमें इस बात का ठीक-ठीक पता नहीं है कि
२४

३७० सूर्य-सिद्धान्त
पृथ्वी की किस ऊँचाई पर वर्तनांक क्या है। परन्तु इसके बिना जाने भी उपर्युक्त
समीकरण का चलराशि कलन एक युक्ति से निकाला जा सकता है जिससे यथार्थ
वर्तन का प्रायः ठीक-ठीक ज्ञान हो सकता है।
इस युक्ति में $\frac{क}{क}$ को १ + छ मान लेना होता है जब कि छ का परिमाण
अत्यन्त छोटा होता है क्योंकि का वातावरण के किसी स्तर की त्रिज्या है और क
पृथ्वी की त्रिज्या है। यह भी ज्ञात है कि उस वातावरण की ऊँचाई जिसमें किरणों
को झुका देने (वर्तन करने) का गुण होता है अधिक से अधिक ५० मील है। पृथ्वी
की त्रिज्या अर्थात् क ४००० मील है, इसलिए $\frac{का}{क} = \frac{४०५०}{४०००} = १ + \frac{१}{८०}$। इससे
स्पष्ट है कि छ = $\frac{१}{८०}$ और इसके वर्ग, घन इत्यादि इतने छोटे हैं कि छोड़ दिये जा
सकते हैं। ऐसी कल्पना करने से
व = $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{ध (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न + २ छ धा^२)^{\frac{१}{२}}}$
= $\int_{१}^{ध} \frac{ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} \left( १ + \frac{२ छ धा^२}{धा^२ - ध^२ ज्या^२ न} \right)^{\frac{१}{२}}$
= $\int_{१}^{ध} \frac{ध ध ज्या न ता (धा)}{धा (धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{१}{२}}} - \int_{१}^{ध} \frac{छ.धा.ध ज्या न ता (धा)}{(धा^२ - ध^२ ज्या^२ न)^{\frac{३}{२}}}$
सरल करने पर इसका रूप यह होगा—
व = प स्परे न + फ स्परे$^३$ न (१)
जहाँ प और फ कोई स्थिर राशियाँ हैं और न स्पष्ट नतांश है। प और फ
के मान प्रत्यक्ष वेध से जाने जा सकते हैं।
कैसिनी का सूत्र—
कैसिनी नामक ज्योतिषी ने यह कल्पना किया कि वातावरण ऊपर से नीचे
तक सजातीय है अर्थात् एक ही घनत्व का है। इस कल्पना से वर्तन का जो सूत्र ज्ञात
हुआ वह ऊपर बतलाये गये सूत्र से मिलता जुलता है। इससे वर्तन का जो परिमाण
जाना जाता है वह ८०° तक के नतांश के लिए सन्तोषप्रद है। यदि नतांश ८०° से
अधिक हो तो वर्तन के परिमाण में स्थूलता रह जाती है।

त्रिप्रश्नाधिकार ३७१
इस कल्पना में यह मान लेना पड़ता है कि शून्य से आती हुई किरण वाता-
वरण में प्रवेश करते ही एक बार झुक जाती है और फिर वही दिशा पृथ्वी तल तक
बनी रहती है ।
मान लो स च छ एक किरण है जो च विन्दु पर झुकी हुई है ।
चित्र ७१
पृथ्वी की त्रिज्या = भ छ = क
भ च = क (१+छ) जबकि छ बहुत छोटा है जैसा कि पहले बतलाया
गया है ।
अ = आपात कोण = ∠ स च ल = ∠ स च सा + ∠ ल च सा
= वर्तन + वर्तित कोण = व् + ∠ छ च भ = व् + वा
∠ ख छ च = स्पष्ट नतांश