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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

३६४ सूर्य-सिद्धान्त
ख
ति
त
ता
द
चित्र ६८
तारे का स्पष्ट स्थान ता से ति हो गया अर्थात् तारा खस्वस्तिक ख की ओर कुछ
चढ़ा हुआ देख पड़ता है । इसलिए वर्तन के कारण खगोलीय पिंड का नतांश कुछ
कम हो जाता है और उन्नतांश उतना ही अधिक हो जाता है । चित्र में इस वर्तन
का परिमाण ता द ति कोण के समान है । त का यथार्थ नतांश ता द ख और
स्पष्ट नतांश ति द ख है । जिस समय खगोलीय पिंड क्षितिज में रहता है उस समय
उसका वर्तन सबसे अधिक ३५' के लगभग होता है ।
अब यह प्रकट हो गया होगा कि वातावरण के कारण किसी खगोलीय पिंड
का स्पष्ट स्थान वही नहीं होता जो यथार्थ में होना चाहिए । इसलिए यदि वर्तन का
संस्कार न किया जाय तो गणना में कुछ भूल रह जाती है । नीचे एक सारिणी* दी

  • R. S. Ball's Spherical Astronomy page 120.