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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

२७२ सूर्य-सिद्धान्त
अग्राज्या लिखा है इष्टकालिक कर्णाग्रा या जैसा भास्कराचार्य लिखते हैं कर्णवृत्ताग्रा
कहना अधिक उचित होगा । अग्रा से केवल वह कोण समझना चाहिए जो क्षितिज-
वृत्त पर पूर्व या पच्छिम विन्दु से सूर्य, ग्रह या तारे का अंतर होता है । चित्र ४३ में
उदयकालिक ग्रह का स्थान क्षितिज वृत्त के ग विन्दु पर है और पूर्व विन्दु प है इसलिए
ग्रह की उदयकालिक अग्रा ग पू धनु है । इसी प्रकार ग्रह की अस्तकालिक अग्रा गा प
धनु है क्योंकि प पच्छिम विन्दु और गा ग्रह का अस्तकाल के समय का स्थान है ।
यदि ग अथवा गा विन्दुओं से पूर्व पच्छिम रेखा पर लम्ब गिराया जाय तो इसी का
मान उदयकालिक अग्राज्या के नाम से व्यवहार किया जायगा । चित्र ४२ में प श
सीधी रेखा उदयकालिक ग्रह की अग्राज्या है । उदयकाल के सिवा किसी अन्यकाल
में सूर्य का ऊर्ध्ववृत्त क्षितिज के जिस विन्दु पर गिरेगा उस विन्दु से पूर्व या पच्छिम
विन्दु का अन्तर इष्टकालिक अग्रा कही जायगी ।
२२वें श्लोक में अक्रांग्रा उदयकालिक सूर्य की अग्राज्या के लिए, इष्टकर्ण इष्ट-
काल के छायाकर्ण के लिए और मध्यकर्ण त्रिज्या के लिए प्रयोग किये गये हैं इसलिए
इनको ध्यान में रखना चाहिए । किसी-किसी अनुवादक ने मध्यकर्ण को मध्याह्न
कालिक छायाकर्ण माना है परन्तु यह भ्रम है । मध्यकर्ण को रंगनाथ जी ने त्रिज्या
इस तरह सिद्ध किया है -- "कर्णस्य व्यासस्य मध्यमर्धमिति मध्यकर्णो व्यासार्ध-
त्रिज्यांतयेत्यर्थः ।" * व्यास के अर्थ में कर्ण का प्रयोग मध्यमाधिकार के ५६ वें श्लोक
मे भी हुआ है । इसी अधिकार के अगले २७ वें श्लोक में यही नियम दुहराया गया है
जिसमें मध्यकर्ण की जगह त्रिज्या का प्रयोग किया गया है । इसलिए मध्यकर्ण का
अर्थ त्रिज्या के सिवा और कुछ नहीं है । इस श्लोक का सार यह है :--
अग्राज्या = क्रान्तिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ (१)
कर्ण वृत्ताग्रा = अग्राज्या x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या
= क्रांतिज्या x विषुवत्कर्ण / १२ x इष्ट छायाकर्ण / त्रिज्या (२)
परंतु विषुवत्कर्ण / १२ = त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या [देखो १३वें श्लोक का भाष्य]
इसलिये अग्रा ज्या = क्रान्तिज्या x त्रिज्या / अक्षांश कोटिज्या (३)
*वेङ्कटेश्वर प्रेस का सूर्य सिद्धान्त, पृष्ठ ८० ।

त्रिप्रश्नाधिकार २७३
समीकरण (३) से अग्राज्या अर्थात् उदय या अस्तकालिक सूर्य की अग्रा की
ज्या का मान तथा अग्रा सुगमतापूर्वक निकल सकते हैं इसलिए यह अच्छा है ।
इस तरह
क्रान्तिज्या
कर्णवृत्ताग्रा = ————————— × इष्ट छायाकर्ण (४)
अक्षांश कोटिज्या
कर्ण वृत्ताग्रा में पलभा के किस समय जोड़ने या घटाने से छाया का भुज
ज्ञात होता है यह चित्र ४५, ४६ से स्पष्ट है । जब सूर्य दक्षिण गोल में होगा अर्थात्
जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होगी तब कर्ण वृत्ताग्रा में पलभा सदैव जोड़ी जायगी
और योगफल उत्तर भुज होगा क्योंकि ऐसी दशा में छाया की नोक सदैव
विषुवद्वृत्ताग्रा रेखा से उत्तर होती है (देखो चित्र ४५), यदि सूर्य उत्तर गोल में हुआ
अर्थात् क्रान्ति उत्तर हुई तो जब तक सूर्य सममंडल से उत्तर रहेगा तब तक छाया
पूर्व पच्छिम रेखा से दखिन रहेगी इसलिए कर्ण-वृत्ताग्रा पलभा से बड़ी होगी ।
ऐसी दशा में कर्ण वृत्ताग्रा से पलभा घटाने पर भुज ज्ञात होगा (देखो चित्र ४६) ।
परन्तु यदि सूर्य सममंडल से दखिन हुआ तो छाया पूर्व पच्छिम रेखा और
विषुवद्वाग्रा रेखा के बीच में रहेगी । ऐसी दशा में पलभा कर्ण वृत्ताग्रा से बड़ी
होगी और पहले से दूसरी को घटाना पड़ेगा । २३-२४ श्लोकों का सार यह है :-
कर्णवृत्ताग्रा ± पलभा = भुज (५)
इसमें धनात्मक चिह्न उस समय लिया जायगा जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण
होगी अर्थात् जब सूर्य सायन तुला आदि ६ राशियों में रहेगा और ऋणात्मक चिह्न
उस समय लिया जायगा जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होगी अर्थात् जब सूर्य सायन
मेषादि ६ राशियों में रहेगा । पिछली दशा में यदि छाया पूर्व पच्छिम रेखा से
दखिन होगी तो भुज दक्षिण में होगा और यदि छाया पूर्व पच्छिम रेखा से उत्तर
होगी तो भुज उत्तर और पलभा से कर्ण वृत्ताग्रा को घटाना पड़ेगा ।
आजकल गोलीय त्रिकोणमिति के नियमों के अनुसार समीकरण (५) इस
प्रकार निश्चय किया जाता है :-
त्रिभुज ध ख र एक गोलीय त्रिभुज है, इसलिए*
कोज्या (ध र) - कोज्या (ख र) × कोज्या (ध ख)
कोज्या ध ख र = ———————————————————————————— (क)
ज्या (ख र) × ज्या (ध ख)
कोज्या (ध्रुवांतर) - कोज्या (नतांश) × कोज्या लम्बांश
अथवा कोज्या (दिगंश) = ———————————————————————————————— (ख)
ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)
*देखो टाडहंटर और लेथेम की गोलीय त्रिकोणमिति पृष्ठ २१ ।
१८

२७४
सूर्य-सिद्धान्त

चित्र ५७

चित्र का परिचय
उ पू द = क्षितिज वृत्त पू क व = विषुवद्वृत्त
उ ध ख व द = याम्योत्तर वृत्त द पू उ = क्षितिज
पू = पूर्व विन्दु उ = उत्तर विन्दु, द = दक्षिण विन्दु
ख = खस्वस्तिक य = याम्योत्तर वृत्त और विषुवद्वृत्त का सामान्य विन्दु
अ र प = सूर्य का अहोरात्र वृत्त जब क्रांति उत्तर हो,
र, स, रा = सूर्य के तीन स्थान,
ख र आ, ख स पू और ख रा इ = सूर्य के तीन ऊर्ध्व वृत्त,
उ आ, उ पू और उ इ = सूर्य के दिगंश,
पू आ, पू ई = सूर्य की अग्रा,
अ = सूर्य का उदय विन्दु
∠ ख ध अ = सूर्य का उदयकालिक नतकाल
∠ ख ध र, ∠ ख ध स और ∠ ख ध रा = सूर्य के नतकाल जब वह क्रम से
र, स और रा बिन्दुओं पर रहता है
ध अ, ध र, ध स और ध रा = सूर्य के ध्रुवान्तर जो प्रायः समान हैं
र क, स का, रा की = सूर्य की क्रान्तियां जो प्रायः समान हैं
ख र, ख स और ख रा = सूर्य के नतांश
आ र, पू स और इ रा = सूर्य के उन्नतांश ।

त्रिप्रश्नाधिकार २७५
परन्तु दिगंश अग्रा का, ध्रुवांतर क्रान्ति का और लम्बांश अक्षांश का पूरक है,
इसलिए
ज्या (अग्रा) = $\frac{ज्या (क्रान्ति) - कोज्या (नतांश) \times ज्या (अक्षांश)}{ज्या नतांश \times कोज्या अक्षांश}$ (ग)
= $\frac{ज्या (क्रान्ति)}{ज्या (नतांश) \times कोज्या (अक्षांश)} - कोटि स्पर्शरेखा (नतांश) \times$
स्पर्श रेखा (अक्षांश) (घ)
परन्तु स्पर्शरेखा (अक्षांश) = $\frac{पलभा}{१२}$
कोटि स्पर्शरेखा (नतांश) = $\frac{१२}{छाया}$
ज्या (नतांश) = $\frac{छाया}{छायाकर्ण}$
$\therefore$ ज्या (अग्रा) = $\frac{ज्या (क्रान्ति)}{कोज्या (अक्षांश)} \times \frac{छायाकर्ण}{छाया} - \frac{१२}{छाया} \times \frac{पलभा}{१२}$
= $\frac{१}{छाया} \frac{क्रान्ति ज्या \times छायाकर्ण}{अक्षांश कोटिज्या} - पलभा \right}$ (६)
$\therefore$ छाया $\times$ इष्टकालिक अग्रा ज्या = कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा
[देखो समीकरण (४)]
परन्तु छाया $\times$ इष्टकालिक अग्रा ज्या = इष्टकालिक छाया का भुज, क्योंकि
चित्र ४६ में $\angle$ स श पू या $\angle$ छ श भ इष्टकालिक अग्रा है जिसकी ज्या = $\frac{छ भ}{छ श}$
इसलिए छाया $\times$ इष्टकालिक अग्राज्या = श छ $\times \frac{छ भ}{छ श}$
$\therefore$ भुज = कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा
इस चित्र में सूर्य सममंडल से उत्तर है इसलिए भुज दक्षिण होगा । यदि
सूर्य सममंडल के दक्षिण जैसे रा पर हो तो गोलीय त्रिभुज ध ख रा में
कोज्या $\angle$ ध ख रा = $\frac{कोज्या (ध रा) - कोज्या (ख रा) \times कोज्या (ध ख)}{ज्या (ख रा) \times ज्या (ध ख)}$

२७६ सूर्य-सिद्धान्त
अथवा कोज्या (६०° + पू ख रा)
= कोज्या (ध्रुवांतर) - कोज्या (नतांश) × कोज्या (लम्बांश)

ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)
ज्या (क्रान्ति)
= ------------------------------ - को स्परे (नतांश) × स्परे (अक्षांश)
ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
परन्तु कोज्या (६० + ∠ पू ख रा) = - ज्या ∠ पू ख रा = - ज्या (अग्रा)
∴ पहले की तरह

  • ज्या (अग्रा) = १ / छाया { कर्ण वृत्ताग्रा - पलभा }
    अथवा, - छाया × ज्या (अग्रा) = कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    या, - भुज = कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    यहां कर्णवृत्ताग्रा से पलभा घटाने पर ऋणात्मक होता है जिससे प्रकट है कि
    पलभा कर्णवृत्ताग्रा से बड़ी है। सूर्य सममंडल के दक्खिन है इसलिए कर्णवृत्ताग्रा
    पूर्व पच्छिम रेखा और विषुवद्वृत्ताग्रगा रेखाओं के बीच में होगी और पहला भारतवर्ष
    में सदैव उत्तर रहता है इसलिए भुज उत्तर होगा ।
    इन दोनों उदाहरणों में सूर्य उत्तर गोल में है अर्थात् इसकी क्रान्ति उत्तर है ।
    यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो तो चित्र ५८ की तरह स्थिति होगी । गोलीय त्रिभुज
    ध ख र में
    कोज्या ∠ ध ख र = कोज्या (ध र) - कोज्या (ख र) × कौज्या (ध ख)

ज्या (ख र) × ज्या (ध ख)
∴ कोज्या (६०° + अग्रा) = कोज्या (६०° + क्रान्ति) - कोज्या (नतांश)

ज्या (नतांश) × ज्या (लम्बांश)

  • ज्या (क्रान्ति)
    ∴ - ज्या (अग्रा) = ------------------------------ × कोज्या (लम्बांश)
    ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
  • को स्परे (नतांश) × स्परे (अक्षांश)
    ∴ पहले की तरह
  • ज्या (अग्रा) = १ / छाया { - क्रान्ति ज्या × छायाकर्ण / अक्षांश कोटिज्या - पलभा }
    = १ / छाया { - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा }
    अथवा - ज्या (अग्रा) × छाया = - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा
    या, - भुज = - कर्णवृत्ताग्रा - पलभा

त्रिप्रश्नाधिकार ३७७
∵ भुज = कर्णवृत्ताग्रा + पलभा
यहाँ कर्णवृत्ताग्रा में पलभा जोड़ने से भुज आता है ।
∵ जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब कर्णवृत्ताग्रा में पलभा सदैव
जोड़ना पड़ता है ।
चित्र ५८
चित्र परिचय
उ ध ख व प द = यामोत्तर वृत्त उ = उत्तर विन्दु
ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव ख = खस्वस्तिक
द = दक्षिण विन्दु पू = पूर्व विन्दु
ख पू = सम मंडल व पू = विषुवद्वृत्त
अ प = सूर्य का अहोरात्र वृत्त जब क्रान्ति दक्षिण हो
अ = उदय विन्दु र = सूर्य का इष्ट स्थान
ख र आ = सूर्य का ऊर्ध्व वृत्त उ अ = सूर्य का उदयकालिक दिगंश
उ आ = सूर्य का इष्टकालिक दिगंश अ पू = उदयकालिक अग्रा
आ पू = इष्टकालिक अग्रा ख ध अ = सूर्य का उदयकालिक नत काल
∠ ख ध र = सूर्य का इष्टकालिक नत काल
ख र = सूर्य का नतांश; आ र = सूर्य का उन्नतांश

२७६ सूर्य-सिद्धान्त
यदि सूर्य सममंडल में हो तो छायाकर्ण जानने की पहली रीति
लम्बाक्षजीवे विषुवच्छाया द्वादशसङ्गुणे ।
क्रान्तिज्याप्ते तु तौ कर्णौ सममण्डलगे रवौ ॥२५॥
अनुवाद—(२५) यदि सूर्य सममण्डल में हो तो लम्बज्या को पलभा से
अथवा अक्षज्या को १२ से गुणा करके प्रत्येक को क्रान्तिज्या से भाग देने पर छाया-
कर्ण आ जाता है ।
विज्ञान भाष्य—इस श्लोक का सार यह है :—
जब सूर्य सममंडल में हो तो,
लम्बज्या × पलभा
छायाकर्ण = ———————————
क्रान्तिज्या
अक्षज्या × १२
= ———————————
क्रान्तिज्या
जिस समय सूर्य सममण्डल में होता है उस समय शंकु की छाया ठीक पूर्व-
पश्चिम रेखा पर रहती है, चित्र ५७ में सूर्य इस स्थिति में अहोरात्र वृत्त प अ और
सममंडल ख पू के सम्पात विन्दु 'स' पर रहेगा । ऐसी दशा में कोण ध ख स ६०°
के समान होगा और इष्टकालिक अग्रा शून्य होगी । इसलिए पिछले श्लोक के
समीकरण (६) के बायें पक्ष का मान्य शून्य होगा; इसलिए इस समीकरण के दाहिने
पक्ष का भी मान्य शून्य होगा । इसलिए
क्रान्तिज्या × छायाकर्ण
—————————————— – पलभा = ०
अक्षांश कोटिज्या
∵ क्रान्ति ज्या × छायाकर्ण
—————————————— = पलभा
अक्षांश कोटिज्या
पलभा × अक्षांश कोटिज्या
या छायाकर्ण = ————————————————
क्रान्तिज्या
परन्तु अक्षांश कोटिज्या = लम्बज्या,
पलभा × लम्ब ज्या
∵ छाया कर्ण = —————————— (७)
क्रान्तिज्या
१३वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है कि
शंकु
लम्बज्या = ———————
विषुवत्कर्ण

त्रिप्रश्नाधिकार २७६
अक्षज्या = पलभा / विषुवत्कर्ण
∵ विषुवत्कर्ण = शंकु / लम्बज्या = पलभा / अक्षज्या
∴ पलभा x लम्बज्या = शंकु x अक्षज्या
समीकरण (७) में पलभा x लम्बज्या की जगह शंकु x अक्षज्या रख देने से
इसका रूप यह होगा—
छायाकर्ण = शंकु x अक्षज्या / क्रान्तिज्या
यह बात नेपियर के दूसरे नियम से भी सिद्ध हो सकती है क्योंकि जिस
समय सूर्य सममंडल में होगा उस समय दिगंश ९०° और अग्रा शून्य होगी इसलिए
चित्र ५७ का ∠ ध ख स समकोण होगा । इसलिए त्रिभुज ध ख स समकोण गोलीय
त्रिभुज होगा जिसके भुजों और कोणों का सम्बन्ध नेपियर के दूसरे नियम के अनुसार
यह होगा :—
कोटिज्या (ध स) = कोटिज्या (ध ख) x कोटिज्या (ख स)
यहाँ धनु ध स, स सूर्य का ध्रुवांतर, ख स सूर्य का नतांश और ध ख
लम्बांश है । इसलिए
कोटिज्या (ध्रुवांतर) = कोटिज्या (नतांश) x कोटिज्या (लम्बांश)
परन्तु ध्रुवांतर क्रांति का पूरक होता है, इसलिए
ज्या क्रांति = कोटिज्या (नतांश) x ज्या (अक्षांश)
परन्तु नतांश कोटिज्या = १२ / छाया कर्ण x [देखो श्लोक २१ का समीकरण (ख)]
∴ ज्या क्रान्ति = १२ / छायाकर्ण x ज्या (अक्षांश)
अर्थात् छायाकर्ण = १२ x अक्षांशज्या / क्रान्तिज्या
इससे दूसरा रूप भी पहले की तरह जाना जा सकता है ।
सममंडल में सूर्य हो तो छायाकर्ण जानने की रीति
सौम्याक्षोना यदाक्रान्तिः स्यातदाङ्गु दलश्रवः ।
विषुवच्छायाभ्यस्तः कर्णोमध्द्याग्रयोद्धतः ॥२६॥

२८० सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—यदि उत्तर अक्षांश से उत्तर क्रान्ति कम हो तो मध्याह्नकालिक
छायाकर्ण को पलभा से गुणा करके मध्याह्नकालिक कर्णाग्रा से भाग देने पर इष्ट-
कालिक छायाकर्ण निकल आता है ।
विज्ञान भाष्य-- इस श्लोक का सार यह है :—
जब सूर्य सममंडल में हो तब,
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा
छाया कर्ण = ————————————— (१)
मध्याह्न कर्णाग्रा
उपपत्ति—२२वें श्लोक के अनुसार,
उदयकालिक अग्राज्या x मध्याह्न छायाकर्ण
मध्याह्न कर्णाग्रा = —————————————————————
त्रिज्या
∴ समीकरण (१) में मध्याह्न कर्णाग्रा का यह मान उत्थापन करने से
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा x त्रिज्या
छायाकर्ण = ——————————————————————
उदयकालिक अग्राज्या x मध्यान्ह छायाकर्ण
पलभा x त्रिज्या
= ————————— (२)
उदयकालिक अग्राज्या
समीकरण (२) में उदयकालिक अग्राज्या का मान २२वें श्लोक के प्रथम
पंक्ति या वहाँ के समीकरण (१) के अनुसार उत्थापन करने से,
पलभा x त्रिज्या
छायाकर्ण = ——————————
क्रान्ति ज्या x विषुवत्कर्ण
———————————
१२
पलभा x १२ x त्रिज्या
= —————————————
क्रान्ति ज्या x विषुवत्कर्ण
१२ x त्रिज्या
परंतु १३वें श्लोक के अनुसार ——————— = लम्बज्या
विषुवत्कर्ण
पलभा x लम्बज्या
∴ छायाकर्ण = ——————————
क्रान्तिज्या
जो २५वें श्लोक के नियम का ही एक रूप है । इसलिए यह सिद्ध हुआ कि
जब सूर्य सममंडल में हो तब
मध्याह्न छायाकर्ण x पलभा
छायाकर्ण = —————————————
मध्याह्न कर्णाग्रा
कर्णाग्रा जानने की दूसरी रीति—
स्वक्रान्तिज्या त्रिजीवाघ्ना लम्बज्याप्ताऽग्रमौर्विका ॥
सेष्टकर्णहता भक्ता त्रिज्ययाऽग्राऽङ्गुलात्मिका ।।२७।।

त्रिपश्नाधिकार २८१
अनुवाद-(२७) इष्टकाल के सूर्य की क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके
लम्बज्या से भाग देने पर उदयकालिक अग्रज्या आती है जिसको इष्टकाल के छाया
कर्ण से गुणा करके त्रिज्या से भाग देने पर इष्टकाल की कर्णाग्रा आती है ।
विज्ञान भाष्य - २२वें श्लोक में कर्णाग्रा जानने की रीति बतलायी गयी है
वही यह भी है अंतर केवल इतना है कि वहाँ क्रान्तिज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके
१२ से भाग दिया गया है और यहाँ क्रान्तिज्या को त्रिज्या से गुणा करके लम्बज्या से
भाग दिया गया है जो एक ही है (देखो श्लोक १३ तथा २२) ।
जब सूर्य ईशान, अग्नि आदि चार कोणों में हो तब उन्नतांश या
नतांश जानने की रीति-
त्रिज्यावर्गार्धतोऽग्रज्यावर्गोनाद् द्वादशाहतात् ।
पुनर्द्वादशनिघ्नाच्च लभ्यते यत्फलं बुधैः ॥२८॥
शङ्कुवर्गार्धसंयुक्त विषुवद्वर्गभाजितात् ।
लब्धं तु करणी नाम तां पृथक्स्थापयेत्ततः ॥२९॥
विषुवच्छायाऽर्क वधादग्रज्यासङ्गुणात्तथा ।
भक्तात्फलाख्यं तद्वर्गसंयुक्तकरणीपदम् ॥३०॥
फलेन हीनं संयुक्तं दक्षिणोत्तरगोलयोः ।
याम्योर्याविदिशोश्शङ्कुरेवं यामोत्तरे रवौ ॥३१॥
परिभ्रमति शङ्कोश्च शङ्कुरुत्तरयोश्च सः ।
तत्तिज्यावर्ग विश्लेषान्मूलं दृग्ज्याऽभिधीयते ॥३२॥
अनुवाद-(२८) त्रिज्या के वर्ग का आधा करके उसमें से उदयकालिक
अग्रज्या के वर्ग को घटाकर शेष को १२ से गुणा करके गुणनफल को फिर १२ से
गुणा करने पर जो फल विद्वानों को मिलता है (२९) उसको शंकु के वर्गार्ध और
पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं, जो लब्धि आती है उसे करणी कहते हैं ।
इसको विद्वान् अलग रखते हैं। (३०) १२ को पलभा से गुणा करके गुणनफल को
उदयकालिक अग्रज्या से भी गुणा करके जो आता है उसको भी शंकु के वर्गार्ध और
पलभा के वर्ग के योगफल से भाग देते हैं और लब्धि को फल कहते हैं। फल के वर्ग
को करणी में जोड़कर योगफल का वर्गमूल निकालते हैं, (३१) यदि सूर्य दक्षिण
गोल में हो अर्थात् यदि सूर्य क्रान्ति दक्षिण हो तो वर्गमूल से फल को घटा दे और
यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो वर्गमूल में फल को जोड़ दे । ऐसा करने से जो कुछ

२८२ सूर्य-सिद्धान्त
आता है वही आग्नेयादि कोणों का शंकु अर्थात् कोण शंकु कहलाता है। (३२) जब
सूर्य दक्षिण में होता है तब कोण शंकु मध्याह्न के पहले अग्निकोण में और मध्याह्न के
पीछे नैऋत्य कोण में होता है। परन्तु जब सूर्य उत्तर में होता है तब कोण शंकु
मध्याह्न के पहले ईशान कोण में और मध्याह्न के पीछे वायव्य कोण में होता है।
कोणशंकु और त्रिज्या के वर्गों के अंतर का वर्गमूल निकालने से दृग्ज्या होती है।
विज्ञान भाष्य — इन ५ श्लोकों का सार यह है :—
⎛ त्रिज्या² ⎞
⎜ ────── — अग्रज्या² ⎟ × १४४
⎝ २ ⎠
करणी = ───────────────────────────
१२²
─── + पलभा
२
१२ × पलभा × अग्रज्या
फल = ───────────────────────────
१२²
─── + पलभा²
२
कोण शंकु = √करणी + फल² ± फल
दृग्ज्या = √ त्रिज्या² — कोण शंकु²
जिस समय सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोणों में रहता है उस
समय इसका जो उन्नतांश (Altitude) होता है उसकी ज्या को कोण शंकु और जो
नतांश होता है उसकी ज्या को दृग्ज्या कहते हैं; किसी अन्य समय के नतांश ज्या को
भी दृग्ज्या तथा उन्नतांश ज्या को शंकु कहते हैं। इसलिए इस शंकु और १२ अंगुल
वाले शंकु के भेद को अच्छी तरह ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए जब सूर्य का
दिगंश (Azimuth) ४५° होता है तब यह क्षितिज से जितने अंश ऊपर रहता है
उस अंश की ज्या कोण शंकु हुई और खस्वस्तिक से जितना नीचे रहता है उस अंश
की ज्या दृग्ज्या हुई। इसलिए चित्र ५७ के समीकरण (क), (ख), या (ग) की
सहायता से कोण शंकु या दृग्ज्या का मान सहज ही निकल सकता है। समीकरण
(ग) इस प्रकार है—
ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) × ज्या (अक्षांश)
ज्या (अग्रा) = ──────────────────────────────────────────
ज्या (नतांश) × कोज्या (अक्षांश)
जब सूर्य ईशान, अग्नि, नैऋत्य या वायव्य कोण में होता है तब अग्रा ४५
अंश के समान होती है, इसलिए ऐसी दशा में
ज्या (अग्रा) = ज्या ४५° = १/√२

त्रिप्रश्नाधिकार २८३
ज्या (अक्षांश) = $\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३]
ज्या (क्रान्ति) = $\frac{१२\timesअग्रज्या}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक २२]
कोज्या (अक्षांश) = $\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$ [श्लोक १३]
समीकरण (ग) से सिद्ध है कि
ज्या (अग्रा) $\times$ ज्या (नतांश) $\times$ कोज्या अक्षांश
$=$ ज्या (क्रान्ति) $-$ कोज्या (नतांश) $\times$ ज्या अक्षांश
इसमें ज्या (अग्रा), ज्या (अक्षांश) इत्यादि के मान उत्थापन करने से
$\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या(नतांश)\times\frac{१२}{विषुवतकर्ण}$
$=\frac{१२\timesअग्र ज्या}{विषुवतकर्ण}-कोज्या (नतांश)\times\frac{पलभा}{विषुवतकर्ण}$
इसी समीकरण के दूसरे पक्ष में जो अग्र ज्या है वह सूर्य की उदयकालिक
अग्रा की ज्या है। इस समीकरण के प्रत्येक पद के हर में विषुवतकर्ण है इसलिए इस
सामान्य संख्या को हटा देने में कोई अंतर नहीं पड़ेगा। यदि पलभा, नतांश और
अग्र ज्या को क्रम से प, न और अ अक्षरों से सूचित किया जाय और विषुवतकर्ण
हटा दिया जाय तो
$\frac{१}{\sqrt{२}}\timesज्या (न)\times१२=१२\timesअ-कोज्या (न)\timesप$
दोनों पक्षों का वर्ग करने से,
३ $\times$ ज्या$^२$ (न) $\times$ १२$^२$ $=$ १२$^२$ $\times$ अ$^२$ $\times$ प$^२$ $\times$ को ज्या$^२$(न)
$-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न)
परंतु १६वें श्लोक के आधार पर
ज्या$^२$ (न) $=$ त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न)
इसलिए उपयुक्त समीकरण का रूप यह होगा
३ $\times$ १२$^२$ $\times$ [त्रिज्या$^२$ $-$ कोज्या$^२$ (न)]
$=$ १२$^२$ अ$^२$ + प$^२$ $\times$ कोज्या$^२$ (न) $-$ २ $\times$ १२ $\times$ अ $\times$ प $\times$ कोज्या (न)

२८४ सूर्य-सिद्धान्त
अथवा सरल करने पर
१२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ]
= कोज्या२ (न) [ १२२/२ + प२ ] - २ x १२ x अ x प x कोज्या (न)
प्रत्येक पक्ष को १२२/२ + प२ से भाग देने पर और आवश्यक पदों को एक पक्ष
से दूसरे पक्ष में ले जाने पर
कोज्या२ (न) - २ x १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) कोज्या (न)

  • १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] / (१२२/२ + प२) = ०
    तीसरे पद की जगह करणी और दूसरे पद के १२ x अ x प / (१२२/२ + प२)
    की जगह फल लिखने से इसका रूप होगा
    कोज्या२ (न) - २ x फल x कोज्या (न) - करणी = ०
    या कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) = करणी
    पहले पक्ष को पूर्ण वर्ग बनाने के लिए प्रत्येक पद में (फल)२ जोड़ने से
    कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) + फल२
    = करणी + फल२
    इस समीकरण का पहला पक्ष = [कोज्या (न) - फल]२
    ∴ कोज्या (न) - फल = √करणी + फल२
    अथवा कोज्या (न) = फल + √करणी + फल२
    परंतु कोज्या (न) = कोज्या (नतांश) = ज्या (उन्नतांश) = कोण शंकु
    ∴ कोण शंकु = √करणी + फल२ + फल
    इसलिए यह सिद्ध हुआ कि जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब फल के
    वर्ग को करणी में जोड़कर और योगफल का वर्गमूल निकालकर फल में जोड़ देने से
    कोण शंकु आ जाता है। यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो चित्र ५८ के अनुसार

त्रिप्रश्नाधिकार २८५
— ज्या (अग्रा) x ज्या (नतांश) x कोज्या (अक्षांश)
= — ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) x ज्या (अक्षांश)
जिसमें ज्या अग्रा, ज्या क्रान्ति इत्यादि के मान उत्थापन करने और सरल
करने से
— १/√२ x ज्या (न) x १२ = — १२ अ — प x कोज्या (न)
अथवा १/√२ x १२ x ज्या (न) = १२ अ + प x कोज्या (न)
दोनों पक्षों का वर्ग करने से
१२²/२ x ज्या² (न) = १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ
x प x कोज्या न
अथवा १२²/२ [ त्रिज्या² — कोज्या² (न) ]
= १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ x प x कोज्या (न)
∴ १२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ]
= कोज्या² (न) [ १२²/२ + प² ] + २ x १२ x अ x प x कोज्या न
∴ कोज्या² (न) + (२ x १२ x अ x प) / (१२²/२ + प²) कोज्या (न)
= (१२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ]) / (१२²/२ + प²)
अथवा कोज्या² (न) + २ x फल x कोज्या (न) = करणी
∴ [कोज्या (न) + फल]² = करणी + फल²
∴ कोज्या (न) + फल = √(करणी + फल²)
∴ कोज्या (न) = √(करणी + फल²) — फल
इसलिए यह सिद्ध होता है कि जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब फल
घटाना पड़ता है ।

२८६ सूर्य-सिद्धान्त
स्वशंकुना विभज्याप्ते दृक्त्रिज्ये द्वादशाहते ।
छायाकणौ तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ।।३३।।
अनुवाद—(३३) दृग्ज्या और त्रिज्या को १२ से गुणा करके कोण शंकु से
भाग दो । भागफल क्रमानुसार इष्ट स्थान के यथासमय छाया और कर्ण होंगे ।
विज्ञान भाष्य—२८-३२ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जब सूर्य
आग्नेयादि विदिशाओं में हो तब उस समय की उन्नतांश ज्या (कोण शंकु) और
नतांश ज्या (दृग्ज्या) कैसे निकालते हैं । ३३वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि
दृग्ज्या और कोण शंकु से उस समय की छाया या छायाकर्ण कैसे निकाला जाता है ।
इस नियम का सार यह है :—
(कोण) छाया = दृग्ज्या x १२ / कोण शंकु
(कोण) छायाकर्ण = त्रिज्या x १२ / कोण शंकु
यह २१वें श्लोक से मिलता-जुलता है । इसलिए इसकी उपपत्ति भी उसी
तरह है ।
उदाहरण—जब सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर या दक्षिण हो तो प्रयाग में
(अक्षांश २५° २५') कोण शंकु और दृग्ज्या क्या होंगे ?
प्रयाग का विषुवतकर्ण = १३.२८ अंगुल
,, की पलभा = ५.६८ अंगुल
इसलिए उस दिन की उदयकालिक अग्राज्या
= (ज्या १५° x १३.२८) / १२ [ देखो श्लोक २२ ]
= (८६० x १३.२८) / १२ = ६८५'
करणी = ((त्रिज्या² / २) - अग्राज्या²) x १४४ / (७२ + पलभा²)
= ((५६०६६२२ - ४७०२२५) १४४) / (७२ + ३२.२६)
= (४६३६६६७ x १४४) / १०४.२६
= ६८२२५२४

त्रिप्रश्नाधिकार २८७
फल = १२ × पलभा × अग्राज्या / ७२ + पलभा २
= १२ × ५.६८ × ६८५ / १०४.२६
= ६४४
∴ कोण शंकु = √करणी + फल २ ± फल
= √६८२२५२४ + ४१४७३६ ± ६४४
= √७२३७२६० ± ६४४
= २६६० ± ६४४
= ३३३४' या २०४६'
इसलिए जब क्रान्ति उत्तर होगी तब कोण शंकु ३३३४' और जब क्रान्ति
दक्षिण होगी तब कोण शंकु २०४६' होगी ।
यह बतलाया गया है कि कोण शंकु नतांश की कोटिज्या अथवा उन्नतांश
की ज्या को कहते हैं इसलिए यदि नतांश या उन्नतांश जानना हो तो कोण शंकु का
धनु बनाना होगा ।
यहाँ, कोण शंकु = उन्नतांश की ज्या = ३३३४'
∴ उन्नतांश = ७५° ५७'
∴ नतांश = ९०° - ७५° ५७' = १४° ३'
जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब
उन्नतांश की ज्या = २०४६'
∴ उन्नतांश = ३६° ३२'
और नतांश = ९०° - ३६° ३२' = ५३° २८'
जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होगी तब,
दृग्ज्या = √त्रिज्या २ - कोण शंकु २
= √३४३८ २ - ३३३४ २
= √(३४३८ + ३३३४) (३४३८ - ३३३४)
= √६७७२ × १०४
= ८३६ कला
परन्तु दृग्ज्या = नतांश की ज्या
= ८३६'
∴ नतांश = १३° ५६'

३. चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहणाधिकार (ग्रहण गणित)

२८८ सूर्य-सिद्धान्त
दोनों उत्तरों में ४ कला का अंतर है क्योंकि वर्गमूल निकालने में दशमलव के
अंक छोड़ दिये गये हैं।
यदि यह जानना हो कि कोणों (विदिशाओं) पर शंकु की छाया या छाया-
कर्ण क्या होंगे तो ३३वें श्लोक से काम लेना होगा। जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर
होगी तब
छाया = दृग्ज्या × १२ / कोण शंकु
= ८३६ × १२ / ३३३४
= ३.०२ अंगुल
छायाकर्ण = त्रिज्या × १२ / कोण शंकु
= ३४३८ × १२ / ३३३४
= १२.३७ अंगुल
नवीन रीति से कोण शंकु का मान जानने में कोई विशेष सुविधा नहीं है
फिर भी उदाहरण दे देना अच्छा होगा। यह पहले सिद्ध हो चुका है कि जब सूर्य
ईशान या वायव्य कोण में होगा तब अग्रा की ज्या + १/√२ और जब अग्नि या
नैऋत्य कोण में होगा तब अग्रा की ज्या - १/√२ होगी (देखो चित्र ५७, ५८) इसलिए
२२–२४ श्लोकों के समीकरण (ग) के अनुसार,
± १/√२ = (±ज्या १५° — कोज्या (न) × ज्या २५°२५') / (ज्या (न) × कोज्या २५°२५') †
या ±·७०७१ = (±·२५८८ — कोज्या (न) × ·४२६२) / (ज्या (न) × ·६०३२)
∴ ±·७०७१ × ·६०३२ × ज्या (न)
= ±·२५८८ — ·४२६२ × कोज्या (न)
† १५° क्रान्ति की ज्या धनात्मक तब होगी जब क्रान्ति उत्तर होगी अर्थात् जब
सूर्य उत्तर गोल में होगा। परंतु जब क्रान्ति दक्षिण होगी तब इसकी ज्या ऋणात्मक
होगी।

त्रिप्रश्नाधिकार २८६
दोनों पक्षों का वर्ग करने पर,
·४०७६ ज्या² (न) = ·०६७० ∓ ·२२२२ कोज्या (न)

  • ·१८४२ कोज्या² (न)
    या ·४०७६ (१ - कोज्या² न)
    = ·०६७० ± ·२२२२ कोज्या न + ·१८४२ कोज्या² न
    ∴ ·५६२१ कोज्या² न ∓ ·२२२२ कोज्या न - ·३४०६ = ०
    ∴ कोज्या न = ± ·२२२२ ± √(·२२२२)² + ४ × ·५६२१ × ·३४०६ / २ × ·५६२१
    = ± ·२२२२ ± ·६२५६ / १·१८४२
    = ·१०४७८ / १·१८४२ या ·७०३४ / १·१८४२
    ∴ उन्नतांशकी ज्या = ·९६६३ या ·५६४०
    ∴ उन्नतांश = ७५° ४६' या ३६° २७'
    इससे दृग्ज्या, छाया, इत्यादि भी जानी जा सकती हैं ।
    इष्टकाल, अक्षांश और क्रान्ति जान कर उन्नतांश, छाया इत्यादि
    जानने की रीति—
    त्रिज्वोदक्चरजायुक्ता याम्यायां तु विवर्जिता ।
    अन्त्या नतोत्क्रमज्योना स्वाहोरात्रार्धताडिता ॥३४॥
    त्रिज्याभक्ता भवेच्छे दो लम्बज्याघ्नोऽथ भाजितः ।।
    त्रिभज्यया भवेच्छङ्कस्तद्वर्गं प्रविशोधयेत् ।
    त्रिज्यावर्गात्पदं दृग्ज्या छायाकणौ तु पूर्ववत् ॥ ३५॥
    अनुवाद—(३४) यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो चरज्या को त्रिज्या में जोड़ने
    और यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो तो घटाने से अन्त्या आती है। इससे नत काल की
    उत्क्रमज्या को घटाकर शेष को द्युज्या से गुणां कर दो (३५) और त्रिज्या से भाग दे
    दो तो छेद आता है । इसको लम्ब ज्या से गुणा करके त्रिज्या के भाग दे देने पर शंकु
    (इष्टकाल की उन्नतांश की ज्या) आता है। शंकु के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से
    घटाकर शेष का वर्गमूल निकालने पर जो आता है वह दृग्ज्या (इष्टकाल की नतांश
    ज्या) है जिनसे छाया और छायाकर्ण पहले की तरह जान लेना चाहिए ।
    विज्ञान भाष्य —इन दो श्लोकों का सार यह है :—
    (१) अन्त्या = त्रिज्या ± चरज्या
    १६

२६० सूर्य-सिद्धान्त
(२) छेद = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या
त्रिज्या
(३) शंकु = छेद ✕ लम्बज्या
त्रिज्या
(४) दृग्ज्या = √त्रिज्या² — शंकु ²
समीकरण (३) में समीकरण (२) और (१) के मान उत्थापन करने से,
शंकु = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या
त्रिज्या त्रिज्या
= (त्रिज्या ± चर ज्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या
त्रिज्या त्रिज्या
= (त्रिज्या - नतोत्क्रमज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या
त्रिज्या²
= (नतकोटिज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या †
त्रिज्या²
= (नतकोटिज्या ± चरज्या) ✕ क्रान्तिकोटिज्या
त्रिज्या²
✕ अक्षांश कोटिज्या................(क)*
यह बात गोलीय त्रिकोणमिति से सहज ही सिद्ध हो सकती है । यहाँ कुछ
नये शब्द आये हैं इसलिए पहले उनका समझाना आवश्यक है:—
अन्त्या—चित्र ४२ में चरज्या चा श और च श है और वि श त्रिज्या है ।
इसलिए चा वि और च वि क्रम से अन्त्या हुए ।
नत काल—किसी समय से जितनी देर में कोई ग्रह या तारा याम्योत्तर वृत्त
पर आता है उसको उस ग्रह या तारे का पूर्व नत काल कहते हैं और उस तारे या
ग्रह के याम्योत्तर वृत्त लांघने के बाद जितना समय बीता रहता है उसको उस तारे या
ग्रह का पच्छिम नत काल कहते हैं । किसी ग्रह या तारे का नत काल (hour angle)
और क्रान्ति दी हुई हो तो उसका स्थान सहज ही निश्चय किया जा सकता है ।
नत काल का परिमाण उस कोण से जाना जाता है जो ग्रह या तारे के ध्रुवप्रात
वृत्त और याम्योत्तर वृत्त के बीच में होता है । ध्रुवप्रातवृत्त विषुवद्वृत्त से समकोण
बनाता है, इसलिए नत काल विषुवद्वृत्त के उस धनु से भी जो तारे या ग्रह के ध्रुव
†देखो चित्र २४ और पृष्ठ ११६, ११८-११६

  • देखो पृष्ठ २०८

त्रिप्रश्नाधिकार २६१
प्रोत वृत्त और यामोत्तर वृत्त के बीच में होता है, जाना जा सकता है। चित्र ५७ में ख
ध र, ख ध स और ख ध रा कोण सूर्य के नत काल हैं जबकि सूर्य क्रम से र, स
और रा बिन्दुओं पर रहता है। यह स्थान यामोत्तर वृत्त के पूर्व हैं इसलिए यह सूर्य
के पूर्व नत काल हैं। जब ग्रह या तारा यामोत्तर वृत्त पर होता है तब उसका नत
काल शून्य होता है। नत काल साधारणतः अंश में लिखा जाता है। यदि किसी तारे
या ग्रह का पूर्व नत काल १५° हो तो समझना चाहिए कि वह १५ x ४ मिनट
अथवा १ घंटे (नाक्षत्र) में यामोत्तर वृत्त पर आवेगा।
उन्नत काल—दिनमान के आधे से नत काल घटाने पर जो आता है वह
उन्नत काल कहलाता है। पूर्व उन्नत काल ग्रह या तारे के उदयकाल से इष्ट काल तक
के समय को कहते हैं और पच्छिम उन्नत काल इष्ट काल से अस्त होने तक के समय
को कहते हैं। पच्छिम उन्नत काल उस समय होता है जब ग्रह या तारा यामोत्तर वृत्त
के पच्छिम होता है। उन्नत काल या इसके संक्षिप्त रूप उन्नत को उन्नतांश से भिन्न
समझना चाहिए जैसे नत को नतांश से।
३४-३५ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि यदि किसी ग्रह या तारे
का नत काल, अक्षांश और क्रान्ति ज्ञात हो तो उसका उन्नतांश, नतांश इत्यादि
कैसे जान सकते हैं। इसकी उपपत्ति गोलीय त्रिकोण-मिति के आधार पर यह है।
(देखो चित्र ५७)
मान लो सूर्य र पर है। गोलीय त्रिभुज ध ख र में कोज्या ∠ ख ध र
कोज्या (ख र) – कोज्या (ध ख) x कोज्या (ध र)
= -----------------------------------------
ज्या (ध ख) x ज्या (ध र)
˙ कोज्या (नत काल)
कोज्या (नतांश) – कोज्या (लम्बांश) x कोज्या (ध्रुवांतर)
= ----------------------------------------------------
ज्या (लम्बांश) x ज्या (ध्रुवांतर)
कोज्या (नतांश) – ज्या (अक्षांश) x ज्या (क्रान्ति)
= ----------------------------------------------- (१)
कोज्या (अक्षांश) x कोज्या (क्रान्ति)
कोज्या (नतांश)
= -----------------------------------
कोज्या अक्षांश x कोज्या क्रान्ति
ज्या (अक्षांश) ज्या (क्रान्ति)
– --------------- x ------------------
कोज्या (अक्षांश) कोज्या क्रान्ति)
कोज्या (नतांश)
= ---------------------------------- स्परे (अक्षांश)
कोज्या (अक्षांश) x कोज्या (क्रान्ति)
x स्परे (क्रान्ति) (२)