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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

स्पष्टाधिकार ७६

की स्पष्ट क्रान्ति जानने का नियम । ५६ श्लोक - ग्रहों की अहोरात्रि का मान जानने
का नियम । ६० श्लोक - द्युज्या जानने की रीति । ६१ - क्षितिज्या और चर ज्या
जानने की रीति । ६२-६३ श्लोक - चर ज्या के धनु से दिन और रात का परिमाण
जानने का नियम । ६४ श्लोक - नक्षत्र और तिथि के मान तथा यह जानने की रीति
कि ग्रह किस नक्षत्र में है । ६५ श्लोक - योग जानने की रीति । ६६ श्लोक - तिथि
जानने की रीति । ६७ श्लोक - चार स्थिर कारणों के नाम और उनके समय । ६८
श्लोक - सात चर करण महीने में कितने फेरे करते हैं । ६६ श्लोक - आधी तिथि एक
करण के समान होती है । ]
मध्यमाधिकार नामक पहले अध्याय में मध्यम गति के अनुसार ग्रहों के स्थान
जानने की रीति बतलायी गयी है। परन्तु इस रीति से ग्रह का जो स्थान मालूम
होता है वह उससे बहुत भिन्न होता है जहाँ ग्रह प्रत्यक्ष देख पड़ता है । इस भिन्नता
को मिटाने के लिए कुछ संस्कार करने की आवश्यकता पड़ती है । इस अध्याय में
यह बतलाया गया है कि यह संस्कार कैसे किये जाते हैं । इन संस्कारों से ग्रहों का
स्थान गणित से भी वही आता है जो स्पष्ट आकाश में देख पड़ता है। इसलिए इस
अध्याय का नाम स्पष्टाधिकार रखा गया ।
अदृश्यरूपाः कालस्य मूर्तयो भगणाश्रिताः ।
शीघ्रमन्दोच्चपाताख्या ग्रहाणां गतिहेतवः ॥१॥
तद्वातरश्मिभिर्बद्धास्तैस्सव्येतरपाणिभिः ।
प्राक्पश्चादपकृष्यन्ते यथासन्नं स्वदिङ्मुखम् ॥२॥
प्रवाहाख्यो मरुत्तांस्तु स्वोच्चाभिमुखमीरयेत् ।
पूर्वापरावकृष्टास्ते गतीर्यान्ति पृथग्विधाः ॥३॥
ग्रहात्प्राग्भगणार्धस्थः प्राङ्मुखं कर्षति ग्रहम् ।
उच्चसंज्ञोऽपरार्धस्थस्तद्वत्पश्चान्मुखं ग्रहम् ॥४॥
स्वोच्चापकृष्टा भगणात्प्राङ्मुखं यान्ति यद्ग्रहाः ।
तत्तॆषु धनमित्युक्तमृणं पश्चान्मुखेषु च ॥५॥
अनुवाद - (१) शीघ्रोच्च, मन्दोच्च और पात नामक काल की मूर्तियां जो
आंख से देखी नहीं जा सकतीं और जो स्वयम् क्रान्तिवृत्त पर चक्कर लगाती हैं
ग्रहों की गति के कारण हैं। (२) यह मूर्तियां अपने दाहिने और बायें हाथों से यदि
(ग्रहों से) पूरब हुईं तो पूरब की ओर और पच्छिम हुईं तो पच्छिम की ओर जैसी
दूरी हो उसके अनुसार ग्रहों को जो उन (मूर्तियों) से वायु रूपी रस्सियों से बंधे हुए
हैं अपनी ओर खींच लेती हैं । (३) प्रवह नामक वायु भी इन ग्रहों को इनके उच्चों
की ओर ढकेल देती है। इसी कारण पूरब या पच्छिम की ओर खिचे हुए ग्रहों की

८० सूर्य सिद्धान्त
गतियों में भिन्नता हो जाती है । (४) यदि ग्रह का उच्च ग्रह से पूरब हो और ६
राशि या १८०° से अधिक दूर न हो तो वह ग्रह को मध्यम स्थान से पूरब की
ओर खींच लेता है, परन्तु यदि १८०° से अधिक दूर हो तो (ग्रह से पच्छिम होने
के कारण) वह ग्रह को पच्छिम की ओर खींच लेता है । (५) अपने-अपने उच्चों से
खिंचे हुए ग्रह मध्यम स्थान से जितना पूरब की ओर बढ़े रहते हैं उतना (मध्यम
स्थान में) जोड़ने से तथा जितना पच्छिम की ओर पिछड़े रहते हैं उतना (मध्यम
स्थान में से) घटाने से स्पष्ट स्थान निकलता है । जोड़े जानेवाले संस्कारों को धन
संस्कार तथा घटाये जाने वाले संस्कार को ऋण संस्कार कहते हैं ॥१-५॥
विज्ञान भाष्य - इन पांच तथा अगले ६-११ श्लोकों में हमारे आचार्यों
की आकर्षण सम्बन्धी कल्पनाएँ हैं जिनसे सिद्ध होता है कि वह कितने सूक्ष्म निरूपण
से काम लेते थे । वह देखते थे कि चक्कर लगाता हुआ ग्रह किसी समय ऐसे स्थान पर
पहुँचता है जहाँ उसकी स्पष्ट गति अत्यन्त मंद पड़ जाती है । बस इसी को उन्होंने ग्रह
के मन्दोच्च१ का स्थान निश्चय किया था । मन्दोच्च का स्थान भी स्थिर नहीं है, वरन्
अत्यन्त मंद गति से चल रहा है, इसलिए इसको भगणाश्रित अर्थात् राशिचक्र पर चलता
हुआ माना है। राशिचक्र में ग्रहों की साधारण गति पच्छिम से पूर्व को होती
है । जब ग्रह अपने मन्दोच्च पर पहुँचता है तब उसकी गति अत्यन्त मंद
होने के कारण मध्यम गति से कम होती है । इसलिए जब ग्रह मन्दोच्च से आगे
बढ़ता है तब दिन भर में मध्यम गति से जहाँ पहुँचना चाहिये वहाँ न पहुँच कर पीछे
ही रह जाता है। इस प्रकार ग्रह के मध्यम तथा स्पष्ट स्थानों में अंतर पड़ जाता
है । यह अंतर प्रतिदिन बढ़ता जाता है और जब ग्रह मन्दोच्च से ६०° आगे (पूर्व की
ओर) बढ़ जाता है तब यह अंतर सबसे अधिक होता है । इसके बाद यह अंतर कम
होने लगता है, परन्तु ग्रह मध्यम स्थान से पीछे ही रहता है जब तक कि वह मन्दोच्च
से १८०° आगे नहीं बढ़ जाता । मन्दोच्च से १८०° पर ग्रह के मध्यम और स्पष्ट
स्थान एक हो जाते हैं। इससे यह कल्पना करना स्वाभाविक है कि जब ग्रह मन्दोच्च
से १८०° से कम अंतर पर पूर्व की ओर रहता है तब मन्दोच्च उसको मध्यम स्थान
से कुछ पच्छिम की ओर जिधर वह है खींच लेता है । इसलिए मध्यम स्थान में ऋण
संस्कार करने से ग्रह का स्पष्ट स्थान निकलता है। जैसे-जैसे ग्रह मन्दोच्च से दूर
होता जाता है तैसे-तैसे स्पष्ट गति अधिक होती जाती है; इसलिए यह समझा
गया कि आसन्नता के अनुसार मन्दोच्च का आकर्षण बढ़ता-घटता है ।
१. मन्दोच्च, शीघ्रोच्च और पात की कुछ चर्चा 'विज्ञान' भाग १६ पृष्ठ
१८७-१६१ में अथवा मध्यमाधिकार के २६-३३ श्लोकों के विज्ञान भाष्य में हैं ।

स्पष्टाधिकार ८१
जिस समय ग्रह मन्दोच्च से १८०° पर पहुँचता है उस समय उसकी गति
अत्यन्त अधिक होती है । यही ग्रह का नीच स्थान है । इस विन्दु से जब ग्रह आगे
बढ़ता है तब उसकी दैनिक स्पष्ट गति मध्यम गति से अधिक रहती है, इसलिए
उसको मध्यम गति से जहाँ पहुँचना चाहिये उससे भी आगे बढ़ जाता है और प्रति
दिन आगे बढ़ता जाता है । इसलिए ग्रह के मध्यम स्थान में धन संस्कार करने से
स्पष्ट स्थान ज्ञात होता है । जब ग्रह मन्दोच्च से १८०° से आगे हो जाता है तब
मन्दोच्च ग्रह से १८०° के भीतर पूर्व की ओर होता है । इसलिए यहाँ भी ग्रह
मन्दोच्च की ओर खिंचा हुआ जान पड़ता है । इसी कारण यह कल्पना निश्चय हो
गयी कि ग्रह को मन्दोच्च अपनी ओर अर्थात् पूरब में हुआ तो पूरब की ओर और
पच्छिम में हुआ तो पच्छिम की ओर खींच लेता है ।
चित्र १५
दिये हुए चित्र १५ में उ म नी मी सूर्य का मार्ग है । प पृथ्वी का केन्द्र है जो
सूर्य मार्ग के केन्द्र पर नहीं है ।
सुविधा के लिए किसी ग्रह को हम दो नामों से पुकारेंगे मध्यम ग्रह और
स्पष्ट ग्रह, जिनका अंतर यह है—मध्यम ग्रह वह काल्पनिक ग्रह है जो मध्यम गति से
राशि चक्र पर पृथ्वी-की परिक्रमा करता हुआ माना गया है और स्पष्ट ग्रह वह
६

८२ सूर्य सिद्धांत
ग्रह है जो पृथ्वी की परिक्रमा करता हुआ प्रत्यक्ष देखा जाता है। मध्यम ग्रह की गति
सदैव समान होती है; परन्तु स्पष्ट ग्रह की गति घटती बढ़ती रहती है। प्रतिदिन की
स्पष्ट गतियों का औसत निकालने से जो कुछ आता है वही मध्यम गति है। इसलिए
यह स्पष्ट है कि स्पष्ट गति मध्यम गति से कभी कम होती है और कभी अधिक ।
जब ग्रह अपने मन्दोच्च पर रहता है तब उसकी स्पष्ट गति अत्यन्त मन्द होती है।
इस जगह मध्यम और स्पष्ट ग्रह एकसाथ होते हैं। परन्तु इसके आगे मध्यम ग्रह
स्पष्ट ग्रह से तीव्र होने के कारण आगे बढ़ जाता है और स्पष्ट ग्रह पीछे रह जाता
है। चित्र में म, मा मध्यम सूर्य के स्थान और स, सा स्पष्ट सूर्य के स्थान हैं।
इसलिए स या सा का स्थान जानने के लिए म या मा के स्थान में से घटाने की
आवश्यकता होती है। जब मध्यम सूर्य नी पर पहुँचता है अर्थात् मन्दोच्च से १८०°
आगे हो जाता है तब स्पष्ट सूर्य भी नी पर देख पड़ता है। इस जगह स्पष्ट सूर्य की
गति अत्यन्त अधिक होती है और वह मध्यम सूर्य से बहुत तीव्र होता है इसलिए नी
से आगे चलकर स्पष्ट सूर्य ही मध्यम सूर्य से आगे बढ़ा रहता है। सि, सी स्पष्ट
सूर्य के और मि, मी मध्यम सूर्य के स्थान हैं। यहाँ भी स्पष्ट सूर्य उच्च की ओर
हटा हुआ देख पड़ता है और मध्यम सूर्य से आगे है, इसलिए इसका स्थान जानने के
लिए मध्यम सूर्य के स्थान में जोड़ने की आवश्यकता होती है।
सूर्य और चन्द्रमा के मध्यम और स्पष्ट स्थानों की भिन्नता का कारण तो
इतनी ही कल्पना से समझाया जा सकता है परन्तु मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि
इन पाँच ग्रहों के मध्यम और स्पष्ट स्थानों में और भी भिन्नता होती है। इसलिए
मन्दोच्च की कल्पना के साथ शीघ्रोच्च की कल्पना भी की गयी । इसकी कल्पना कैसे
हुई इसका अनुमान भास्कराचार्य जी के अनुसार यों है१ :—
'जब शनि, गुरु और मंगल इन तीन ग्रहों से सूर्य आगे रहता है तब स्पष्ट ग्रह
मध्यम ग्रह से आगे होते हैं अर्थात् सूर्य की ओर बढ़े देख हुए पड़ते हैं। परन्तु जब
इनसे सूर्य पीछे रहता है तब स्पष्ट ग्रह मध्यम ग्रह से पीछे रहते हैं अर्थात् सूर्य की
ओर पिछड़े हुए देख पड़ते हैं।' इसलिए विद्वानों ने यह कल्पना की कि इन तीनों ग्रहों
के शीघ्रोच्च सूर्य के साथ रहते हैं। इसलिए यह अनुमान करना स्वाभाविक है कि
इन ग्रहों को इनके शीघ्रोच्च भी जो सूर्य के समान या साथ रहते हैं खींचते हैं। यदि
इस कल्पना को और बढ़ा दिया जाता तो सूर्य को ही शीघ्रोच्च अथवा इन ग्रहों का
आकर्षक मान लेने में न्यूटन का सिद्धान्त ज्ञात हो जाता ।
ऊपर मन्दोच्च और शीघ्रोच्च स्थानों की जो कल्पना की गयी है, उनकी ओर
ग्रह कुछ खिंच जाते हैं यह जानकर यह अनुमान होता ही है कि यह स्थान कुछ
१. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ २०

स्पष्टाधिकार ८३

विशेष शक्ति रखते हैं और अदृश्य भी हैं; इसलिए इनको विशेष शक्तिमान समझने के
कारण अदृश्य देवमूर्तियाँ कहा गया है जो अदृश्य वायु रूपी रस्सी से ग्रहों को अपनी
ओर खींचे रहते हैं और इनको प्रवह नामक वायु भी सहायता पहुँचाती है ।
पात के बारे में पहले लिखा जा चुका है। वहाँ चन्द्रमा के पात के सम्बन्ध
में जो कुछ लिखा गया है वही अन्य ग्रहों के पातों के लिए भी लागू है । जब ग्रह
उत्तर पात पर आता है तब क्रान्ति वृत्ति पर देख पड़ता है । जब यहाँ से आगे बढ़ता
है तब क्रान्तिवृत्ति से उत्तर हो जाता है। जब तक वह दक्खिन पात पर अर्थात् उत्तर
पात से १८०° आगे नहीं पहुँच जाता तब तक क्रान्तिवृत्त से उत्तर ही रहता है ।
ऐसी दशा में उत्तर पात ग्रह से पच्छिम रहता है । इसीलिए आगे के ७वें श्लोक में
यह बतलाया गया है कि ग्रह से १८०° तक पच्छिम में स्थित पात (उत्तर पात) ग्रह
को उत्तर की ओर ढकेलता है और १८०° तक पूर्व में स्थिति पात उसको दक्खिन
की ओर ढकेलता है । यह भी अदृश्य है और क्रान्ति वृत्त से ग्रह को उत्तर या दक्खिन की
ओर ढकेलते हुए जान पड़ता है । इसलिए इसमें भी दैवीशक्ति मानी गयी है । परन्तु
यथार्थ कारण यह है कि सूर्य और ग्रहों की कक्षाएं एक ही तल में नहीं हैं, जिससे
प्रत्येक ग्रह की कक्षा सूर्य की कक्षा को दो विन्दुओं पर काटती हुई जान पड़ती है ।
आगे के ८-११ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जिन ग्रहों का आकार
बड़ा है वह भारी होने के कारण अपने मन्दोच्चों, शीघ्रोच्चों इत्यादि के द्वारा कम
खिंचते हैं और जो हल्के हैं वह बहुत खिंचते हैं। यह अनुमान सूक्ष्म निरूपण का फल
है और आकर्षण सिद्धान्त के बिल्कुल अनुकूल है ।
सूर्य सिद्धान्त के इन्हीं आठ श्लोकों के आधार पर कुछ विद्वान यह कहते हैं
कि आकर्षण सिद्धान्त के आविष्कारक न्यूटन नहीं कहे जा सकते वरन् हमारे ही प्राचीन
ज्योतिषाचार्य हैं। निष्पक्ष भाव से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि हमारे
पूज्य आचार्यों ने प्रत्यक्ष देखकर अपनी कल्पना और तर्क शक्ति से जितने अनुमान
किये थे वह उस समय की दशा को देखते हुए परम सराहनीय हैं । उन्होंने यह
अवश्य समझा था कि ग्रहों की गति की भिन्नता का कारण कोई शक्ति है, परन्तु
यह नहीं ज्ञात हो सका था कि यह शक्ति किस प्रकार काम करती है, केवल पृथ्वी
तथा ग्रहों के शीघ्रोच्चों, मन्दोच्चों और पातों में ही है अथवा जगत के सब पदार्थों में,
और गणित की किस क्रिया द्वारा उपपत्ति बतलायी जा सकती है। आकर्षण सिद्धान्त के
इस व्यापक नियम का आविष्कारक न्यूटन है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि ज्योतिष
का अध्ययन-अध्यापन भारतवर्ष में उसी प्रकार चला आता जैसा भास्कराचार्य, गणेश
दैवज्ञ इत्यादि के समय में था या जैसा यूरोप के फ्रांस, जर्मनी और इंगलैंड में कोपर-
निकस, टाइकोब्राही, केपलर, न्यूटन इत्यादि के समय में १६वीं, १७वीं शताब्दी में

: ८४ सूर्य सिद्धान्त
था तो संभव है कि आकर्षण सिद्धान्त हमारे आचार्यों को पहले ही उस रूप में प्रकट
हो जाता जिस रूप में न्यूटन ने स्थिर किया है। हमारे यहाँ आकर्षण सम्बन्धी कल्पना
कल्पना (hypothesis) के रूप में ही रह गयी और न्यूटन ने इसे सिद्धान्त (theory)
के रूप में परिणत कर दिया।
इस जगह ग्रहों की भिन्न गतियों के कारण पर विचार करते हुए आकर्षण
सम्बन्धी कल्पना की गई है इसलिए यह असंगत न होगा यदि ग्रहों की गति संबंधी
कोपरनिकस, केपलर और न्यूटन के सिद्धान्त संक्षेप में बतला दिये जायें ।
कोपरनिकस की कल्पना
१५८७ वि० ( १५३० ई०) में कोपरनिकस ने जो ग्रन्थ लिखा उसमें
दिखलाया कि यदि पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए मान लिये जायें
तो ग्रहों की प्रत्यक्ष टेढ़ी, सीधी गतियाँ सहज ही समझायी जा सकती हैं। इसी को
कोपरनिकस की रीति कहते हैं ।
केपलर के नियम
(१) जिस कक्षा में यह सूर्य की परिक्रमा करता है वह दीर्घवृत्त के आकार
की होती है, जिसकी एक नाभि पर सूर्य का केन्द्र होता है।
(२) सूर्य और किसी ग्रह के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा समान काल में
समान क्षेत्रफल बनाती है ।
(३) दो ग्रहो के भगणकालों के वर्गों का परस्पर सम्बन्ध वही होता है जो
सम्बन्ध सूर्य से उनकी मध्यम दूरियों के घनों का होता है।
अब संक्षेप में यह बतलाया जाता है कि केपलर ने किस गणना से यह नियम
निकाले थे ।
यह सब को अनुभव होगा कि जैसे-जैसे कोई वस्तु दूर होती जाती है वैसे-वैसे
देख पड़ता है कि वह छोटी होती जाती है क्योंकि दूर हो जाने से उस वस्तु से जो कोण
नेत्र पर बनता है वह छोटा होता जाता है। मान लो न नेत्र का स्थान है और क ख
एक वस्तु है जो दूर होती जा रही है। जब वह क ख स्थान पर होगी तब न पर
उससे क न ख कोण बनेगा और जब वह का खा स्थान पर पहुँच जायगी तब न पर
उससे कान खा कोण बनेगा जो क न ख कोण से छोटा है । इसी कारण का खा
स्थान पर वही वस्तु छोटी देख पड़ेगी, यद्यपि वस्तुतः उसके आकार में कोई भेद नहीं
पड़ा। (देखो चित्र १६) ।

स्पष्टाधिकार ८५
चित्र १६
यदि सूर्य बिम्ब प्रतिदिन बेध करके देखा जाय ता प्रतिदिन वह एक ही
आकार का नहीं देख पड़ता । जब सूर्य धनु राशि के कोई १६° पर होता है
(३ जनवरी को) तब उसका बिम्ब सबसे बड़ा देख पड़ता है। इस दिन इसके बिम्ब
का मान ३२′३५.२″ होता है। इसी दिन इसकी दैनिक स्पष्ट गति भी तीव्रतम
अर्थात् ६१′६.६″ होती है । इसके बाद शनैः-शनैः सूर्य बिम्ब छोटा होता जाता है
और गति मंद होती जाती है । जब सूर्य मिथुन राशि के कोई १६° पर होता है
अर्थात् पहले स्थान से १८०° बढ़ जाता है तब बिम्ब सबसे छोटा अर्थात् ३१′३०.७″
का होता है और दैनिक स्पष्ट गति मन्दतम अर्थात् ५७′११.५″ हो जाती है ।
बिम्ब के छोटा-बड़ा देख पड़ने का कारण यह तो नहीं है कि सूर्य का आकार ही
वास्तव में छोटा-बड़ा हो जाता है वरन् यह है कि सूर्य की दूरी ही घटती-बढ़ती रहती
है । यह मत हमारे सिद्धान्तों का भी है। १
यदि सूर्य बिम्ब के अर्द्धव्यास का मान स हो और पृथ्वी से सूर्य की निकटतम
दूरी क हो तो सूर्य के अर्द्ध बिम्ब से जो कोण पृथ्वी पर बनेगा उसकी ज्या = स/क
परन्तु इस दिन सूर्य का बिम्ब ३२′३५.२″ होता है, इसलिए अर्द्धबिम्ब
१६′१७.६″ होगा,
इसलिए ज्या १६′१७.६″ = स / क
परन्तु जब कोण बहुत छोटा होता है तब कोण और कोण की ज्या के मानों
में कोई अन्तर नहीं होता जब कि कोण का मान Circular measure में हो या
ज्या क मान भारतीय रीति से लिखा जाता हो ! २
१. सूर्यसिद्धान्त चन्द्र ग्रहणाधिकार श्लोक १ - ३
२. मध्यमाधिकार के ६० - ६१ श्लोकों का विज्ञान भाष्य देखो ।

८६ सूर्य सिद्धान्त
∵ स/क = १६' १७.६" या स = क × १६' १७.६"
इसी प्रकार सूर्य का बिम्ब ३१' ३०.७" अथवा बिम्बार्द्ध १५' ४५.४" होता
है तब यदि सूर्य की अत्यन्त अधिक दूरी 'का' हो तो
स/का = १५' ४५.४" या स = का × १५' ४५.४"
∴ क × १६' १७.६" = का × १५' ४५.४"
अथवा क/का = (१५' ४५.४") / (१६' १७.६") (१)
जिस स्थान पर सूर्य सबसे बड़ा देख पड़ता है उससे जब १८०° आगे जाता
है तब सबसे छोटा देख पड़ता है। इसलिए ऊपर निकाली हुई क, का दूरियाँ एक
रेखा में होती हैं। इसलिए यदि दिये हुए चित्र १७ में प पृथ्वी का स्थान हो तो स
और सा सूर्य के स्थान होंगे जब कि सूर्य क्रमानुसार सबसे बड़ा और सबसे छोटा
देख पड़ता है अर्थात् जब प स = क और प सा = का
स ───────────── प ─ म ───────────── सा
चित्र १७
समीकरण (१) का प्रत्येक पक्ष यदि १ में से घटा दिया जाय तो,
१ − क/का = १ − (१५' ४५.४") / (१६' १७.६")
या (का − क)/का = ३२.२" / १६' १७.६" (२)
और यदि समीकरण (१) के प्रत्येक पक्ष में १ जोड़ दिया जाय तो,
(का + क)/का = ३२' ३" / १६' १७.६" (३)
अब यदि समीकरण (२) को समीकरण (३) के समपक्षों से भाग देदें तो,
(का − क)/(का + क) = ३२.२" / ३२' ३" = ३२.२" / १९२३" = १/६० के लगभग
इस सम्बन्ध से प्रकट होता है कि प उस दीर्घवृत्त की नाभि है जिसका
दीर्घ अक्ष स सा, केन्द्र स सा का मध्यविन्दु म और च्युति (eccentricity) १/६० है;
क्योंकि किसी दीर्घवृत्त के केन्द्र से उसकी नाभि तक जो दूरी होती है उसको दीर्घ

स्पष्टाधिकार ८७
अक्ष के आधे से भाग देने पर च्युति का मान निकल आता है १ । वहां का क केन्द्र से
नाभि की दूरी का दूना और का + क दीर्घ अक्ष की लम्बाई है ।
इस प्रकार यदि स सा दूरी को दीर्घ अक्ष, प को उसकी एक नाभि तथा १/६०
को च्युति मानकर दीर्घवृत्त खींचा जाय तो किसी कर्ण (Radius vector) प सि
की दूरी जो स प रेखा के साथ इ कोण बनाता है इस गुर २ से जाना जा सकता है—

[चित्र: दीर्घवृत्त में स, सि, इ, प, म, सा दर्शाये गये हैं]

चित्र १८
प सि = म स (१--च²) / (१ + च × कोज्या इ)
जब कि च = १/६० = ·०१६७ और म स सूर्य और पृथ्वी का मध्यम अंतर
स्थिर है ।
इसलिए १/प सि का मान १ + च × कोज्या इ के मानानुसार बदलता है
जिसको संक्षेप में यों लिखते हैं :-
१/क ∝ १ + च कोज्या इ
जहाँ क सूर्य का पृथ्वी से अंतर (कर्ण या Radius vector) है । यह
सम्बन्ध वेध से ठीक उतरता है । इसलिए यह सिद्ध हुआ कि सूर्य दीर्घवृत्त में चक्कर


१. आशुतोष मुखोपाध्याय की Geometry of Conics, Chapter, II. proposition III.
proposition III.
२. Loney's Elements of Coordinate Geometry, pp. 307 and
229 (1910 edition.)

८८ सूर्य सिद्धान्त
लगाता है और पृथ्वी इस दीर्घवृत्त की नाभि पर है । इसकी जगह यह कहना अधिक
शुद्ध है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती हुई दीर्घवृत्त के आकार की कक्षा बनाती
है और सूर्य केन्द्र इस कक्षा की नाभि पर रहता है ।
इसका प्रमाण 'विज्ञान' भाग १२ पृष्ठ ७५-७६, १८८-१८६, २०३ से २०७
में दिया गया है । यही केपलर का पहला नियम है ।
ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य की तीव्रतम गति ६१' १०" और इसी समय
इसका महत्तम बिम्ब ३२' ३५" होता है तथा मंदतम गति ५७' १२" और इसी
समय न्यूनतम बिम्ब ३१' ३१" होता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि तीव्रतम और
मन्दतम गतियों में जो अंतर होता है वह मध्यम गति का ३'५८" / ५६'११" अथवा स्वल्पा-
न्तर से १/१५ के समान है और स्पष्ट बिम्ब के महत्तम और न्यूनतम आकारों में जो अंतर
होता है वह मध्यम बिम्ब का १'४" / ३२'३", अथवा स्वल्पान्तर से १/३० के समान है । इसलिए
स्पष्ट बिम्ब के परिवर्तन का सम्बन्ध १ : १ + १/३० और स्पष्ट गति के परिवर्तन का
सम्बन्ध १ : १ + १/१५ है ।
परन्तु १ + १/१५ = (१ + १/३०)² स्वल्पान्तर से
∴ गति के परिवर्तन का सम्बन्ध १ : (१ + १/३०)² है ।
चाहे जिस समय देखा जाय यही पाया जायगा कि किसी ग्रह का कोणीय
वेग स्पष्ट व्यास के वर्ग के अनुसार बदलता है । परन्तु सूर्य की का स्पष्ट व्यास सूर्य
दूरी के प्रतिलोम के अनुसार बदलता है, जैसा कि पिछले पृष्ठों में बतलाया
जा चुका है। इसलिए कोणीय वेग स्पष्ट व्यास के वर्ग के अनुसार अथवा कर्ण के
वर्ग के प्रतिलोम के अनुसार बदलता है । संक्षेप में
कोणीय वेग ∝ (स्पष्ट व्यास)²
या ∝ ( १ / कर्ण )²
चित्र १६ में प पृथ्वी का स्थान है, स सूर्य का स्थान है और स प सि वह
कोण है जो सूर्य १ दिन में चलता है । इसी प्रकार सा सूर्य का दूसरा स्थान है और
सा प सी वह कोण है जो सूर्य १ दिन में चलता है । स, सि या सा, सी परस्पर
बहुत पास हैं इसलिए प स और प सि के मानों में इतना कम अंतर है कि दोनों
समान समझे जा सकते हैं । इसी तरह प सा और प सी समान समझे जा सकते
हैं । ऐसी दशा में प स सि त्रिभुज उस वृत्त का एक खंड समझा जा सकता है, जिसका
केन्द्र प है और त्रिज्या प स या प सि है । इसलिए

स्पष्टाधिकार ८६

[Diagram: चित्र १६]

इस वृत्त खंड का क्षेत्रफल = < स प सि × (पस)² / २
= स स्थान का कोणीय वेग × (पस)² / २
और सा प सी का क्षेत्रफल = < सा प सी × (पसा)² / २
= सा स्थान का कोणीय वेग × (पसा)² / २
परन्तु ऊपर बतलाया जा चुका है कि
कोणीय वेग ∝ १ / (कर्ण)² = अ × १ / (कर्ण)² जब कि अ कोई अचल राशि है
है ।
∴ स प सि वृत्त खंड का क्षेत्रफल / सा प सी वृत्त खंड का क्षेत्रफल
= {स का कोणीय वेग × (पस)² / २} / {सा का कोणीय वेग × (पसा)² / २}
= स का कोणीय वेग × (पस)² / सा का कोणीय वेग × (पसा)²

६० सूर्य सिद्धान्त
= स का कोणीय वेग × (स का कर्ण)² / सा का कोणीय वेग × (सा का कर्ण)²
= [ अ × {१ / (स का कर्ण)²} × (स का कर्ण)² ] / [ अ × {१ / (सा का कर्ण)²} × (सा का कर्ण)² ]
= १
इससे सिद्ध हुआ कि स पा स और सा प सी दोनों वृत्त खंड समान हैं। यही
केपलर का दूसरा नियम है।
केपलर के तीसरे नियम से सूर्य से सब ग्रहों की दूरियों का सम्बन्ध जाना जा
सकता है। जैसे शुक्र और पृथ्वी के भगण काल क्रमशः २२४·७ दिन और ३६५·३
दिन हैं, इसलिए इनके भगण कालों के वर्गों का सम्बन्ध = (३६५.३)² / (२२४.७)² = २.६४५
परन्तु केपलर के तीसरे नियम के अनुसार
(सूर्य से पृथ्वी की दूरी)³ / (सूर्य से शुक्र की दूरी)³ = (३६५.३)² / (२२४.७)² = २.६४५
यदि सूर्य से पृथ्वी की दूरी १ मान ली जाय तो
सूर्य से शुक्र की दूरी = ( १ / २.६४५ )^(१/३)
= (•३७८)^(१/३)
= ( ३७८ / १००० )^(१/३) = १/१० (३७८)^(१/३)
= १/१० × (७³ + ३५)^(१/३) = १/१० × ७ ( १ + ५ / ७² )^(१/३)
= ७/१० (१ + •१०२)^(१/३)
= ७/१० {१ + १/३ × (•१०२) + १/२ × १/३ (१/३ - १) (•१०२)²

  • १/६ × १/३ × (१/३ - १) (१/३ - २) (•१०२)³ + ⋯ }
    = ७/१० (१ + .०३४ - .००११६ + .००००६६
  • एक बहुत सूक्ष्म संख्या)
    = ७/१० × १.०३२६ = ७.२३०३ / १० = .७२३

स्पष्टाधिकार ६१
केपलर ने यह तीनों नियम ग्रहों के सूक्ष्म निरूपणों से सं० १६६४-१६७४
वि० (१६०६-१६१६ ई०) में बनाये थे । उसको इस बात का पता नहीं था कि किन
शक्तियों से ग्रहों में इन नियमों के अनुसार गतियाँ होती हैं। कोई ७५ वर्ष तक इन
नियमों की उपपत्ति नहीं बतलायी जा सकी । इसके पश्चात् न्यूटन ने यह सिद्ध किया
कि विश्वव्यापी गुरुत्वाकर्षण ही इन सब का कारण है। न्यूटन ने जिन तीन नियमों
के आधार पर यह सिद्ध किया है वह गति के नियम कहलाते हैं, उसी के नाम से
प्रसिद्ध हैं और यह हैं :-
पहला नियम—यदि कोई बाहरी शक्ति न लगायी जाय तो प्रत्येक वस्तु यां
तो अपनी अचल दशा में, या सीधी रेखा में समान गति से चलती हुई दशा में, रहना
चाहती है ।
दूसरा नियम—गति का परिवर्तन लगायी जाने वाली शक्ति के मानानुसार
होता है और यह परिवर्तन उस सीधी रेखा की दिशा में होता है जिस दिशा में शक्ति
लगायी जा रही हो ।
तीसरा नियम - प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, जो परिमाण में सदैव
समान, परन्तु दिशा में विरुद्ध होती है अर्थात् प्रत्येक क्रिया के समान परन्तु उसके
विरुद्ध दिशा में प्रतिक्रिया होती है ।
यह नियम स्वयम्प्रसिद्ध हैं। विशेष जानकारी के लिए गतिविज्ञान
(Dynamics) के किसी ग्रन्थ को पढ़ना चाहिये ।
केपलर के पहले और दूसरे नियमों से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि प्रत्येक
ग्रह एक ऐसी शक्ति के कारण चल रहा है, जिसकी दिशा सूर्य की ओर है और
जिसका परिमाण सूर्य से ग्रह की दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार होता है। केपलर
के तीसरे नियम से न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि एक ग्रह की गति की वृद्धि दूसरे
ग्रह की गति की वृद्धि से क्या सम्बन्ध रखती है और इसीसे उसने विश्वव्यापी
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त निकाला, जो यह है :-
द्रव्य (matter) का प्रत्येक कण दूसरे कण को उस शक्ति से आकर्षित करता
है, जो उन कणों की मात्राओं के गुणनफल के अनुसार तथा उन दोनों के बीच की
दूरी के वर्ग के विलोम मानानुसार बदलती है ।
अब यह सिद्ध करना है कि यदि किसी स्थिर बिन्दु से किसी गतिमान कण
तक रेखा खींची जाय और वह समान काल में समान क्षेत्रफल बनावे तो वह कण
जिस शक्ति से चल रहा है उसकी दिशा उसी स्थिर बिन्दु की ओर है। यह बात
चलनकलन (Differential Calculus) तथा गतिविज्ञान के आधार पर संक्षेप में

६२ सूर्य-सिद्धान्त
सिद्ध हो सकती है, जो पीछे दी जायगी। इस जगह साधारण गणित के ही आधार
पर कुछ विस्तार के साथ सिद्ध की जाती है । १
मान लो कि 'स' एक स्थिर बिन्दु है और किसी वस्तु का कोई कण स के
चारों ओर घूमता हुआ क ख ग घ च बहुभुज क्षेत्र बना रहा है और क ख, ग घ,
या घ च भुज समान काल में अथवा १ पल में चलता है । यह भी मान लो कि इन
भुजों के मान भिन्न-भिन्न हैं और और जब तक कण किसी एक भुज पर रहता है
तब तक उसकी गति एकरूप (uniform) रहती है । स क ख, स ख ग, स ग घ,
स घ च त्रिभुजों के क्षेत्रफल भी समान समझ लेने चाहिये ।
अब यह प्रत्यक्ष है कि समान काल में वह कण स के चारों ओर घूमता हुआ
समान क्षेत्रफल बनाता है । गति के पहले नियम के अनुसार जब तक कण बहुभुज
चित्र २०
१. यह युक्ति Heroes of Science : Astronomers के पृष्ठ १७३—
१७५ के आधार पर है ।

स्पष्टाधिकार ६३
क्षेत्र की कोई सीधी भुज बना रहा है तब तक उस पर कोई शक्ति काम नहीं कर
रही है और वह अपनी प्राप्त शक्ति से सीधी रेखा में जा रहा है, परन्तु एक भुज से
दूसरी भुज पर जैसे ही मुड़ने लगता है वैसे ही क्षण भर के लिए कुछ न कुछ शक्ति
उस पर अवश्य लगनी चाहिये, जिससे वह अपनी पहले की सीधी चाल को बदल कर
दूसरी सीधी चाल पर आ जाय ।
जिस समय कण ख पर है उस समय की दशा पर ध्यान दो । यदि इस समय
कोई शक्ति न लगे तो दूसरे पल में वह क ख की ही सीध में ख प राह पर जायगा
और क ख प रेखा सीधी रेखा होगी तथा ख प और क ख समान होंगे क्योंकि गति
में कोई अन्तर नहीं होगा । प को ग और स से मिला दो । स ख प त्रिभुज का
आधार ख प है जो क ख के समान है और क ख की ही सीधी रेखा में है, इसलिए
रेखा-गणित के अनुसार दोनों त्रिभुज स क ख और स ख प के क्षेत्रफल समान हैं।
यह आरम्भ में ही मान लिया गया है कि स क ख, स ख ग इत्यादि त्रिभुजों के
क्षेत्रफल समान हैं। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि स ख प और स ख ग त्रिभुज भी
परस्पर समान हैं जो एक ही आधार स ख पर हैं इसलिए रेखागणित के अनुसार
यह दोनों त्रिभुज स ख और ग प समानान्तर रेखाओं के बीच में हैं अर्थात् ग प रेखा
स ख के समानान्तर है। ख प के समानान्तर ग र रेखा खींचो जो स ख रेखा से र
बिन्दु पर मिले । तब ख प ग र समानान्तर चतुर्भुज क्षेत्र होगा। जिस समय कण ख
पर था उस समय यदि कोई शक्ति न लगी होती तो वह बिन्दु प पर पहुँचता; परन्तु
शक्ति लगने से वह ग पर पहुँचा, इसलिए प्रकट है कि ख पर कण की प्रथम गति ख
प थी और शक्ति लगने के कारण वह ख ग में बदल गयी । इसलिए गतिविज्ञान के
‘गति के समानान्तर चतुर्भुज-नियम’ (parallelogram of velocities) के अनुसार
लगी हुई शक्ति के कारण कण में ख प की गति के साथ ख र गति का संयोग हो
गया, अर्थात् ख बिन्दु पर कण में जो गति ख प दिशा की ओर थी उसमें ख र की
दिशा में ख र के समान ही दूसरी गति मिल गयी, जिससे वह कण ग बिन्दु पर
पहुँचा । इसलिए इस मिलने वाली शक्ति के कारण वह वस्तु स की ओर मुड़ी । इसी
प्रकार यह सिद्ध हो सकता है कि बहुभुज क्षेत्र के कोण बिन्दुओं ग, घ, च पर भी जो
शक्ति लगती है वह स की दिशा में ही लगती है ।
अब कल्पना करो कि यह बहुभुज क्षेत्र करोड़ों अत्यन्त छोटी-छोटी भुजों से
बना है और स के चारों ओर घूमने वाला कण प्रत्येक छोटी-छोटी भुज को पल के
करोड़वें भाग में चल कर पूरा करता है तो यह प्रकट है कि उस कण पर स की
दिशा में करोड़ों बार शक्ति लगेगी। इसलिए यह सिद्ध है कि कण ने प्रायः वक्र
(curved) मार्ग को स की ओर ले जाने वाली एक अनवच्छिन्न (continuon

शक्ति के कारण पूरा किया । यदि कल्पना को और बढ़ा दिया जाय और बहुभुज
क्षेत्र की भुज इतनी छोटी हो जायँ कि उनकी कोई सीमा ही न बँध सके और उनकी
संख्या असंख्य हो तब भी यह तर्क लागू हो सकता है । इसलिए यह सिद्ध होता है कि
यदि कोई कण किसी स्थिर विन्दु के चारों ओर ऐसे मार्ग पर चले कि उससे समान
काल में समान क्षेत्रफल बने तो इस कण पर जो शक्ति निरन्तर लगी हुई है वह उस
स्थिर बिन्दु की दिशा में है अर्थात् वह स्थिर बिन्दु उस कण को निरन्तर आकर्षित
किये हुए है ।
यदि स को सूर्य का केन्द्र मान लिया जाय और क, ख, ग इत्यादि को किसी
ग्रह के स्थान, तो केपलर के दूसरे नियम से सिद्ध होता है कि सूर्य के चारों ओर
घूमने वाले ग्रहों को उनकी थामने के लिए जो शक्ति काम कर रही है वह सूर्य की
ही आकर्षण शक्ति है । इसी प्रकार ग्रह भी अपने उपग्रहों को खींच रहे हैं ।
दक्षिणोत्तरयोरेवं पातो राहु स्वरंहसा ।
विक्षिप्त्येष विक्षेपं चन्द्रादीनामपक्रमात् ॥६॥
उत्तराभिमुखं पातो विक्षिप्त्यपरार्द्धगः ।
ग्रहं प्राग्भगणार्द्धस्थो याम्यायामपकर्षति ॥७॥
अनुवाद—(६) चन्द्रमा आदि ग्रहों को इनके पात या राहु क्रान्तिवृत्त से विक्षेप
के समान उत्तर या दक्षिण भी अपने वेग से हटा देते हैं । (७) जब पात ग्रह से पच्छिम
परन्तु ६ राशि या १८०° से कम दूरी पर रहता है तब उसको क्रान्तिवृत्त से उत्तर
हटा देता है और जब वह ग्रह से पूरब परन्तु ६ राशि से कम दूरी पर रहता है तब
उसको क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा देता है ।
विज्ञान भाष्य—इन दोनों श्लोकों का साधारण अर्थ यह है कि ग्रह और उसके
पात के स्थानों को देखकर समझना चाहिये कि ग्रह ठीक क्रान्तिवृत्त पर है अथवा
उससे कुछ उत्तर या दक्खिन हटा हुआ है । यदि ग्रह और पात दोनों एक ही जगह
हों तो समझना चाहिये. कि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर है। यदि ग्रह पात से आगे अर्थात्
पूरब हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर हटा हुआ होगा
और यदि ग्रह पात से पीछे अर्थात् पच्छिम हो परन्तु १८०° से अधिक दूर न हो तो
वह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण हटा हुआ होगा । इसका कारण राहु का आकर्षण या
अपकर्षण नहीं है वरन् यह है कि किसी ग्रह की कक्षा क्रान्तिवृत्त के समतल में नहीं
है इसलिए ग्रह सदैव क्रान्तिवृत्त पर नहीं रहता । ग्रह की कक्षा और क्रान्तिवृत्त जिन
दो विन्दुओं पर मिलते हुए जान पड़ते हैं उन्हीं को पात कहते हैं । जब ग्रह अपनी कक्षा
इन दो विन्दुओं पर रहता है तब क्रान्तिवृत्त पर देख पड़ता है अन्यथा क्रान्तिवृत्त

स्पष्टाधिकार ६५
से उत्तर या दखिन ऊपर कहे हुए के अनुसार होता है। क्रान्तिवृत्त से उत्तर या
दखिन ग्रह की जो दूरी होती है उसी को विक्षेप कहते हैं। यह उस वृत्त पर होता है
जो क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाता हुआ कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) से होकर जाता है।
बुधभार्गवयोः शीघ्रात्तद्गत्पातो यदास्थितः ।
तच्छीघ्राकर्षणात्तौ तु विक्षेप्येते यथोक्तवत् ॥८॥
अनुवाद—(८) बुध और शुक्र के पात जब इनके शीघ्रोच्चों से उपर्युक्त (६,
७ श्लोकों में लिखे हुए) नियम के अनुसार होते हैं तब शीघ्रोच्चों में आकर्षण करके
ग्रहों को क्रान्तिवृत्त से उत्तर या दखिन उसी प्रकार हटा देते हैं ।
विज्ञान भाष्य—६, ७ श्लोकों में जो नियम बतलाया गया है वह केवल
सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, गुरु और शनि के लिए लागू है । बुध और शुक्र दो ग्रहों के स्थान
जानने के लिए यह देखना चाहिये कि इनके शीघ्रोच्च पातों से किधर और कितनी
दूर है। यदि शीघ्रोच्च पात से पूरब परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से
उत्तर होगा और पच्छिम परन्तु १८०° से कम दूर हो तो ग्रह क्रान्तिवृत्त से दक्षिण
होगा।
महत्वान्मण्डलस्याऽर्कः स्वल्पमेवाऽपकृष्यते ।
मण्डलाल्पतया चन्द्रस्ततो बहुपकृष्यते ॥६॥
भौमादयोल्पमूर्तित्वाच्छीघ्रमन्दोच्चसंज्ञितैः ।
दैवतैरपकृष्यन्ते सुदूरमतिवेगिताः ॥१०॥
अतो धनर्णं सुमहत्तेषां गतिवशाद्भवेत् ।
आकृष्यमाणास्तैरैवं व्योम्नि यान्त्यनिलाहताः ॥११॥
अनुवाद—(६) सूर्य का मण्डल बहुत बड़ा है इसलिए वह अपने उच्च द्वारा
बहुत कम खिंचता है। चन्द्रमा का मण्डल छोटा है इसलिए यह बहुत खिंचता है।
(१०) मंगल आदि ग्रहों के मण्डल बहुत छोटे हैं इसलिए इनके शीघ्रोच्च मन्दोच्च
देवता इनको बहुत दूर तक बड़े वेग से खींच ले जाते हैं। (११) इसलिए इनमें धन
और ऋण संस्कार इनकी गति के कारण बहुत करना पड़ता है। इस प्रकार यह ग्रह
अपने शीघ्रोच्च मन्दोच्च देवताओं से खिंचे हुए और प्रवह वायु का धक्का खाते हुए
आकाश में चलते हैं।
विज्ञान भाष्य — हमारे आचार्यों ने यह देखा कि सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा
अपने मध्यम स्थान से पूरब या पच्छिम अधिक रहता है और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र,
शनि इत्यादि तो अपने मध्यम स्थान से कहीं अधिक पूरब या पच्छिम देख पड़ते

८६
सूर्य सिद्धान्त
{|l|l|l|l|l|l|l|}
\hline
ग्रहों के नाम & \multicolumn{3}{c|}{विषुवद्वृत्तीय X अर्द्धव्यास} & मात्रा (mass) जब कि पृथ्वी का १ माना जाय & मध्यम घनत्व जब पानी का १ माना जाय & गुरुत्वाकर्षण पृष्ठ पर जब कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण १ माना जाय

& कोणात्मक † & मीलों में & जब कि पृथ्वी का १ माना जाय & & &

\hline
सूर्य & १६' १".१९ & ४,३२,८६० & १०६.२ & ३,२६,३६० & १.४० & २७.६१

बुध & ३".३४ & १,५०४ & ०.३८० & ०.०५५? & ५.५६? & ०.३८

शुक्र & ८".४० & ३,७८३ & ०.६५५ & ०.८०७ & ५.१४ & ०.८६

पृथ्वी & ८".८० & ३,९६३ & १.००० & १.००० & ५.५६ & १.००

मंगल & ४".६८ & २,१०८ & ०.५३२ & ०.१०८ & ३.६२ & ०.३८

गुरु & १' ३७".३६ & ४३,८५० & ११.०६ & ३१४.५० & १.३७ & २.५७

शनि & १' २४".७५ & ३८,१७० & ६.६३ & ६४.०७ & ०.६४ & १.०१

वरुण* & ३४".२८ & १५,४४० & ३.६० & १४.४० & १.३५ & ०.६५

& & & & & &

इन्द्र * & ३६".५६ & १६,४७० & ४.१५ & १६.७२ & १.२८ & ०.६७

\hline

† कोणात्मक. अर्द्ध व्यास ग्रह के बिम्बार्ध का कोणात्मक मान है जब कि द्रष्टा ग्रह से उतनी दूरी पर हो जो सूर्य से पृथ्वी की मध्यम दूरी है ।

  • यह नामकरण केतकरकी ज्योतिर्गणित के अनुसार है ।
    ? जिस संख्या के सामने यह चिन्ह है उसका ठीक ठीक निश्चय अभी तक नहीं हो सका है ।
    X ग्रहों के आकार भी पूर्ण गोल नहीं हैं उनमें भी ध्रुवों पर कुछ चपटा है जैसी हमारी पृथ्वी है इसलिए उनमें भी विषुववृत्त होते हैं ।

स्पष्टाधिकार ६७
इसलिए उन्होंने इन ग्रहों के मण्डलों को चन्द्रमा से भी छोटा समझा जैसा कि यह
प्रत्यक्ष देख पड़ते हैं, और यह निश्चय किया कि इनके मण्डल बहुत छोटे हैं इसी-
लिए इनमें शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के आकर्षण का प्रभाव बहुत पड़ता है ।
परन्तु ग्रहों के मध्यम स्थान से कुछ पूरब या पच्छिम देख पड़ने के यथार्थ
कारण हैं ग्रहों की कक्षाओं के आकार । ग्रहों की कक्षाएँ दीर्घवृत्त के आकार की हैं
जिनकी च्युति (eccentricity) के परिमाण एक से नहीं हैं; इसीलिए मध्यम और
स्पष्ट स्थानों में मुख्यतः अन्तर पड़ता है, ग्रहों के मण्डलों के आकार के कारण नहीं ।
इनके आकारों का ज्ञान पिछले पृष्ठ की सारिणी से स्पष्ट होगा जो राबर्ट बाल की
'स्फेरिकल एस्ट्रानोमी' पृष्ठ ४६२ से ली गयी है । चन्द्रमा का अर्द्धव्यास १०७६
मील है ।
वक्रानुवक्रा कुटिला मन्दा मन्दतरा समा ।
तथा शीघ्रतरा शीघ्रा ग्रहाणामष्टधा गति : ॥१२॥
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा ।
ऋज्वीति पञ्चधाज्ञेया या वक्रा सानुवक्रगा ॥१३॥
अनुवाद—(१२) वक्र, अनुवक्र, कुटिल, मन्द मन्दर, सम, शीघ्रतर और शीघ्र
नामक आठ प्रकार की गतियां ग्रहों में होती हैं । (१३) इनमें से अति शीघ्र शीघ्र,
मन्द, मन्दतर और सम गतियां सीधी होती हैं अर्थात् जब ग्रह में यह गतियां
होती हैं तब वह राशि-चक्र में पच्छिम से पूरब को जाता हुआ देख पड़ता है और वक्र
के साथ जो अनुवक्र और कुटिल गतियां हैं वह वक्र गति कहलाती हैं क्योकि जब ग्रह
में ऐसी गतियां होती हैं तब वह राशि-चक्र में पूरब से पच्छिम को उलटा जाता हुआ
देख पड़ता है । जब ग्रह में सीधी गतियां होती हैं तब वह मार्गी और जब वक्र गतियाँ
होती हैं तब वक्री कहलाता है ।
विज्ञान भाष्य—यह भिन्न-भिन्न गतियां ग्रह में कैसे हो जाती हैं इसका
कारण हमारे सिद्धान्तों में कहीं नहीं बतलाया गया है, क्योंकि जब तक पृथ्वी अचल
समझी जायगी तब तक इसका कारण अच्छी तरह नहीं समझाया जा सकता । हाँ यदि
पृथ्वी को भी अन्य ग्रहों की भाँति सूर्य की परिक्रमा करती हुई मान लिया जाय जो
कई प्रयोगों से सिद्ध भी हो गया है तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि किसी
ग्रहों में यह आठ गतियां कैसे देख पड़ती हैं; यद्यपि यथार्थ में ग्रह निरंतर पच्छिम से
पूरब को जाता हुआ सूर्य की परिक्रमा कर रहा है । इस सम्बन्ध में मैंने 'विज्ञान'
भाग १३ पृष्ठ २६४-२६६ पर जो लिखा था वही यहाँ उद्धृत करता हूँ ।
७

६८ सूर्य सिद्धान्त
यदि आप मैदान में एक झंडा गाड़ दें और झंडे से ४,७,१०,१५,५२,९५,
१९२, और ३०० फर्लांग के अन्तर पर एक एक घेरा दो तीन फुट ऊँचा करवा दें;
प्रत्येक घेरे के पास एक एक घुड़सवार नियुक्त कर दें; आप स्वयं झंडे के पास खड़े हो
जायें और घुड़सवारों को आज्ञा दे दें कि प्रत्येक घुड़सवार अपने अपने घेरे के पास इस
तरह खड़ा हो जाय कि सब एक ही सीध में दिखाई पड़ें और तदनन्तर सब सवार एक
साथ ही घेरे का इस वेग से चक्कर लगाने लगें कि सबसे पास वाला एक चक्कर ८८
सेकंड में, इससे कुछ दूरवाला २२५ सेकंड में, तीसरा ३६५ सेकंड मे, चौथा ६८७
सेकंड में, पांचवां ४३३२ सेकंड में, छठा १०७५६ सेकंड में, सातवां ५१० मिनट में
और आठवां १००३ मिनट में, चक्कर पूरा करने लगे, तो जिस प्रकार यह घुड़सवार
सेकंडों में आपकी परिक्रमा करते हुए जान पड़ेंगे वैसे ही सौर-मंडल में ग्रह दिनों में
सूर्य की परिक्रमा करते हुये दिखाई पड़ते हैं। अंतर केवल इतना होगा कि सवार एक
धरातल में चक्कर लगावेंगे पर ग्रह कुछ उत्तर दखिन हट भी जाते हैं।
यदि आप झंडे के पास न खड़े होकर स्वयं झंडे से तीसरे घोड़े पर सवार
होकर पहले कहे हुये वेग से चक्कर लगाने लगें तो आपको झंडे और घुड़सवार जैसे
दिखाई पड़ेंगे वही दृश्य हम पृथ्वी निवासियों को ग्रहों के सूर्य का चक्कर लगाने में
दिखाई पड़ता है। कभी यह जान पड़ता है कि ग्रह आगे बढ़ते जा रहे हैं और कभी
जान पड़ता है कि कोई पीछे हो रहे हैं और कभी ठहरे हुये भी दिखाई पड़ते हैं।
ऊपर सवारों के उदाहरण से आपको विदित हो गया होगा कि यदि सवार
तीसरे घोड़े पर बैठ कर झंडे की परिक्रमा करे तो बाहर और भीतर दोनों ओर वाले
घोड़ों की गतियों में वही 'वक्रानुवक्रा कुटिला' तथा 'शीघ्रा शीघ्रतरा' गतियों की
विलक्षणता दिखाई देती है, जैसे पृथिवी रूपी घोड़े पर सवार पृथिवी निवासियों को
अन्य ग्रहों की गतियों में विलक्षणता दिखाई देती है। समझाने के लिये हमको दो
उदाहरण लेने होंगे—एक ऐसे ग्रह का जो पृथ्वी और सूर्य के बीच में है और दूसरा
ऐसे ग्रह का जो सूर्य और पृथ्वी के बाहर है। पहले के लिये बुध और दूसरे के लिये
मंगल २१ तथा २३ चित्रों में लिये गये हैं।
चित्र २१ में सबसे बड़ा वृत्त राशि-चक्र है, जिस पर घूमता हुआ सूर्य एक
वर्ष में एक चक्कर लगाता हुआ जान पड़ता है। जहाँ वसंत-विषुव लिखा हुआ है वहाँ
जब सूर्य दिखलाई पड़ता है तब वसंत ऋतु का आरम्भ होता है और इस दिन
दिन रात समान होते हैं। यहीं से आरम्भ करके राशिचक्र बारह भागों में बांटा
गया है। इसलिये जिस-जिस भाग पर मेष वृष इत्यादि लिखा हुआ है उसे सायन
मेष, सायन वृष समझना चाहिये । सायन मेष का आरम्भ २१, २२ मार्च को होता