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सर्वकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 838 में से

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पृष्ठ 109

८६ सूर्य सिद्धान्त
∵ स/क = १६' १७.६" या स = क × १६' १७.६"
इसी प्रकार सूर्य का बिम्ब ३१' ३०.७" अथवा बिम्बार्द्ध १५' ४५.४" होता
है तब यदि सूर्य की अत्यन्त अधिक दूरी 'का' हो तो
स/का = १५' ४५.४" या स = का × १५' ४५.४"
∴ क × १६' १७.६" = का × १५' ४५.४"
अथवा क/का = (१५' ४५.४") / (१६' १७.६") (१)
जिस स्थान पर सूर्य सबसे बड़ा देख पड़ता है उससे जब १८०° आगे जाता
है तब सबसे छोटा देख पड़ता है। इसलिए ऊपर निकाली हुई क, का दूरियाँ एक
रेखा में होती हैं। इसलिए यदि दिये हुए चित्र १७ में प पृथ्वी का स्थान हो तो स
और सा सूर्य के स्थान होंगे जब कि सूर्य क्रमानुसार सबसे बड़ा और सबसे छोटा
देख पड़ता है अर्थात् जब प स = क और प सा = का
स ───────────── प ─ म ───────────── सा
चित्र १७
समीकरण (१) का प्रत्येक पक्ष यदि १ में से घटा दिया जाय तो,
१ − क/का = १ − (१५' ४५.४") / (१६' १७.६")
या (का − क)/का = ३२.२" / १६' १७.६" (२)
और यदि समीकरण (१) के प्रत्येक पक्ष में १ जोड़ दिया जाय तो,
(का + क)/का = ३२' ३" / १६' १७.६" (३)
अब यदि समीकरण (२) को समीकरण (३) के समपक्षों से भाग देदें तो,
(का − क)/(का + क) = ३२.२" / ३२' ३" = ३२.२" / १९२३" = १/६० के लगभग
इस सम्बन्ध से प्रकट होता है कि प उस दीर्घवृत्त की नाभि है जिसका
दीर्घ अक्ष स सा, केन्द्र स सा का मध्यविन्दु म और च्युति (eccentricity) १/६० है;
क्योंकि किसी दीर्घवृत्त के केन्द्र से उसकी नाभि तक जो दूरी होती है उसको दीर्घ