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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

: ८४ सूर्य सिद्धान्त
था तो संभव है कि आकर्षण सिद्धान्त हमारे आचार्यों को पहले ही उस रूप में प्रकट
हो जाता जिस रूप में न्यूटन ने स्थिर किया है। हमारे यहाँ आकर्षण सम्बन्धी कल्पना
कल्पना (hypothesis) के रूप में ही रह गयी और न्यूटन ने इसे सिद्धान्त (theory)
के रूप में परिणत कर दिया।
इस जगह ग्रहों की भिन्न गतियों के कारण पर विचार करते हुए आकर्षण
सम्बन्धी कल्पना की गई है इसलिए यह असंगत न होगा यदि ग्रहों की गति संबंधी
कोपरनिकस, केपलर और न्यूटन के सिद्धान्त संक्षेप में बतला दिये जायें ।
कोपरनिकस की कल्पना
१५८७ वि० ( १५३० ई०) में कोपरनिकस ने जो ग्रन्थ लिखा उसमें
दिखलाया कि यदि पृथ्वी तथा अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए मान लिये जायें
तो ग्रहों की प्रत्यक्ष टेढ़ी, सीधी गतियाँ सहज ही समझायी जा सकती हैं। इसी को
कोपरनिकस की रीति कहते हैं ।
केपलर के नियम
(१) जिस कक्षा में यह सूर्य की परिक्रमा करता है वह दीर्घवृत्त के आकार
की होती है, जिसकी एक नाभि पर सूर्य का केन्द्र होता है।
(२) सूर्य और किसी ग्रह के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा समान काल में
समान क्षेत्रफल बनाती है ।
(३) दो ग्रहो के भगणकालों के वर्गों का परस्पर सम्बन्ध वही होता है जो
सम्बन्ध सूर्य से उनकी मध्यम दूरियों के घनों का होता है।
अब संक्षेप में यह बतलाया जाता है कि केपलर ने किस गणना से यह नियम
निकाले थे ।
यह सब को अनुभव होगा कि जैसे-जैसे कोई वस्तु दूर होती जाती है वैसे-वैसे
देख पड़ता है कि वह छोटी होती जाती है क्योंकि दूर हो जाने से उस वस्तु से जो कोण
नेत्र पर बनता है वह छोटा होता जाता है। मान लो न नेत्र का स्थान है और क ख
एक वस्तु है जो दूर होती जा रही है। जब वह क ख स्थान पर होगी तब न पर
उससे क न ख कोण बनेगा और जब वह का खा स्थान पर पहुँच जायगी तब न पर
उससे कान खा कोण बनेगा जो क न ख कोण से छोटा है । इसी कारण का खा
स्थान पर वही वस्तु छोटी देख पड़ेगी, यद्यपि वस्तुतः उसके आकार में कोई भेद नहीं
पड़ा। (देखो चित्र १६) ।