सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
[१०]
को ही अपना एक मात्र सहारा मानते थे। वास्तविकता यह है कि महाकवि की
प्रारम्भिक जीवनी के प्रामाणिक विस्तार उपलब्ध नही है। उत्तरार्ध जीवनी से
सम्वद्ध चौरासी वार्ता के उल्लेखों को प्रामाणिक माना जा सकता है। किन्तु ये
जीवनी सम्बन्धी कोई विस्तार नही देते थे।
महाकवि सूरदास की रचनाओ मे सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध रचना 'सूरसागर'
है। अन्य समस्त रचनाएँ अत्यन्त गौण हैं। 'सूरसारावली' ११०७ पदों का खंडकाव्य
सा है, जिसमें भागवत् की कथा को ही संक्षिप्त वर्णनात्मक रूप मे दिया गया है।
इसमे कोई काव्य सम्बन्धी सौन्दर्य भी नही है। 'साहित्य लहरी' ११८ कूट पदों का
संग्रह है, जिसमे किसी अलंकार, नायिका या भाव का उल्लेख करके कूट शैली मे
उनके उदाहरण दिये गये है। अधिकांश आलोचक इन दोनों ग्रंथों को सूरकृत मानते
हैं, यद्यपि कुछ विद्वान् इस सम्वन्ध मे संदिग्ध भी हैं। नागरी प्रचारिणी सभा की खोज
रिपोर्ट मे सूरदास के नाम से लगभग १०, १२ अन्य ग्रन्थों के नाम मिलते हैं, जैसे
व्याहलो, पदसंग्रह, दशमस्कंध, टीका, नागलीला, भागवत, सूर-पचीसी, गोवर्द्धनलीला,
सूरसागर सार, रामजन्म, एकादशी माहात्म्य आदि; जिनमें कुछ प्रकाशित भी हो
चुके हैं। इन ग्रंथों मे कुछ तो कदाचित् महाकवि सूरदास की रचनाएँ नही हैं और
सूरसागर मे ही विशेष कथाओ अथवा लीलाओ से सम्वद्ध पदो के संग्रह मात्र हैं।
इस प्रकार महाकवि की एकमात्र प्रामाणिक और महत्वपूर्ण रचना सूरसागर ही
रह जाती है।
सूरदास की हस्तलिखित पोथियों की दो परम्पराएँ मिलती है। एक मे श्रीकृष्ण
के केवल ब्रजचरित सम्बन्धी पदों का लीला-क्रम के अनुसार संकलन है। सूरसागर की
यह परम्परा कदाचित् अधिक प्राचीन है। नवल किशोर प्रेस का सूरसागर इसी
परम्परा की पोथियो के आधार पर प्रकाशित किया गया था। सूरसागर की दूसरी
परम्परा मे पदो तथा खंडकाव्यो के रूप प्राप्त महाकवि की लगभग समस्त रचनाओं
को एकत्रित तथा श्रीमद्भागवत के द्वादशस्कंधी क्रम के अनुसार क्रमबद्ध किया गया
था। यह परम्परा वेंकटेश्वर प्रेस तथा नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करणों से मिलती
है। सूरसागर की इस परम्परा मे भी श्रीकृष्ण के ब्रजलीला सम्बन्धी पद ही प्रधान
हैं। भागवत् के अन्य स्कंधो से सम्बन्धित सामग्री अत्यन्त संक्षिप्त है तथा काव्य-स्तर
की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है द्वादशस्कंधी सूरसागर की निम्नलिखित विषय-सूची से
यह स्थिति स्पष्ट हो जायेगी :-
स्कंध विषय पद संख्या
१. व्यास अवतार (१), विनयपद (२२३) ३४३
२. चौबीस अवतारो की सूची ३८
३. सनकादि, (२) वाराह, (३) तथा कपिलदेव, (४) अवतार १३
[ ११ ]
४ दत्तात्रेय, (५) यज्ञपुरुष, (६) हरि अथवा ध्रुववरदेन,
(७) तथा पृथु (८) अवतार १३
५ ऋषभदेव (६) ४
६. अजामिल उद्धार अवतार (१०) ८
७. नृसिंह (११), नारद (१२) ५
८. गजमोचन (१३), कूर्म (१४), धन्वन्तरि (१५)
वामन (१६), तथा मत्स्य (१७), अवतार १७
६. राम (१८), परशुराम (१६) १७४
१०. कृष्ण अवतार (२०) ४१६०
पूर्वार्ध : ब्रजचरित
उत्तरार्ध : द्वारिका चरित - १४६
११. नारायण (२१), हंस (२२) ४
१२. बुद्ध (२३), कल्कि (२४) ५
४८३६
ऊपर चौबीस अवतारों की सूची में दस मुख्य अवतार मोटे टाइप में दिये गए
हैं। इस प्रकार सूरसागर की इस परम्परा के लगभग ५००० पदों मे ४००० से अधिक
पद श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओं से सम्बद्ध हैं, तथा शेष १००० पदों में श्रीकृष्ण का
द्वारिका चरित, विनय पद, राम अवतार सम्बन्धी पद तथा २२ अवतारो का अत्यन्त
संक्षिप्त वर्णन है। यहाँ इस बात का उल्लेख कर देना भी अनुचित न होगा कि सूरदास
ने लगभग सवा लाख पद लिखे थे, इस किंवदंती का कोई भी प्रामाणिक आधार नही
है। कवि की पद-रचना पांच छह हज़ार पदो के बीच ही रही होगी, जो लगभग प्राप्त
है। वास्तव मे यह संख्या भी कम नही है।
जैसा ऊपर की सूची से स्पष्ट है, द्वादशस्कंधी परम्परा के सूरसागर में दशम
स्कंध के पदसमूह के बाद अधिक संख्या मे प्रथम स्कंध के विनयपद तथा नवम-स्कंध
के राम-अवतार सम्बन्धी पद पाए जाते है। विनयपदों मे दास्य भक्ति तथा दैन्य
भावना प्रधान है। बहुत संभव है कि इस पद समूह में कवि की कुछ प्रारम्भिक
रचनाएँ हो, जब वे गऊघाट पर रहते थे और महाप्रभु वल्लभाचार्य के सम्पर्क में नही
आए थे, तथा कुछ की प्रौढ शैली को देखकर ऐसा मालूम होता है कि वे कवि की
वृद्धावस्था की रचनाएँ होनी चाहिए। रामावतार का विस्तृत वर्णन होना स्वाभाविक
है क्योंकि कृष्णावतार के अतिरिक्त भगवान् के अवतारों में यह मुख्य है। सूरदास ने
द्वारिकावासी श्रीकृष्ण का चरित भी बहुत संक्षेप मे ही दिया है। आकार तथा स्तर
दोनों ही दृष्टि-कोणो से यह स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की ब्रजलीलाओ के गान में ही कवि
की वास्तविक अभिरुचि थी।
इसमें संदेह नही कि सूरसागर मे वर्णित श्रीकृष्ण की लीलाओं का मूलाधार
[ १२ ]
श्रीमद्भागवत दशम स्कंध पूर्वार्ध है, किन्तु इस आधार के कारण सूरसागर को श्रीमद्-
भागवत का उल्था अथवा स्वतन्त्र अनुवाद मानना भारी भूल होगी। महाकवि ने अपनी
असाधारण प्रतिभा के द्वारा परिचित लीलाओं के वर्णनों में अनेक मौलिक कल्पनाओं
का समावेश किया है, इसके अतिरिक्त अनेक नई लीलाओं तथा चरित्रों को भी बढ़ाया
है जो भागवत में नहीं मिलते। उदाहरण के लिए श्रीमद्भागवत में राधा के नाम तक
का उल्लेख नहीं है, जब कि सूरसागर में राधा-कृष्ण प्रेम का प्रारम्भ, विकास तथा
परिणति का बहुत ही सजीव, आकर्षक और महत्त्वपूर्ण चित्रण है। इसी प्रकार 'भ्रमर
गीत' अथवा 'उद्धव गोपी' संवाद वाले अंश में श्रीमद्भागवत में उद्धव श्रीकृष्ण का
संदेश गोपियों को सुनाते हैं और वे उसे शिरोधार्य कर लेती हैं। सूरसागर का भ्रमर-
गीत सगुण-निर्गुण वादों और कर्म, ज्ञान तथा भक्ति मार्गों के सिद्धांतों के शास्त्रार्थ के
साथ-साथ प्रौढ ध्वनि काव्य का एक अत्यन्त उत्कृष्ट उदाहरण है।
रस की दृष्टि से सूरसागर में प्रधान रूप में केवल शृङ्गार रस के संयोग और
वियोग पक्षों का चित्रण है, किन्तु इस रस की जिस बारीकी और गहराई में कवि की
पैठ है वह उसकी असाधारण प्रतिभा का परिचायक है। मुख्य रस के चित्रण के साथ-साथ
अनुभावों तथा व्यभिचारी अथवा संचारी भावों के भी सैकड़ो सजीव उदाहरण सूरसागर
में बिखरे पड़े हैं। सब मिलाकर कवि की रचना का क्षेत्र प्रत्येक दृष्टि से सीमित कहा
जा सकता है — श्रीकृष्ण की व्रज-लीला, शृङ्गार रस तथा पदशैली, किन्तु इस सीमित
क्षेत्र में महाकवि के समकक्ष क्या निकट भी तो कोई अन्य कवि नहीं पहुँच सका है।
सूरसागर की भाषा व्रजभाषा है, यद्यपि एक संग्रह ग्रंथ होने के कारण उसमें
इस भाषा के अनेक स्तर मिलते हैं। किन्तु सूरसागर के मुख्य भाग की भाषा-शैली
अत्यन्त प्रौढ तथा साहित्यिक है। सूरदास जी के लगभग एक शताब्दी पहले से व्रज-
भाषा में साहित्य रचना होने लगी थी, किन्तु व्रजभाषा को साहित्यिक भाषा के
उच्च सिंहासन पर आसीन करने का श्रेय इस महाकवि को ही प्राप्त है।
वल्लभ-सम्प्रदाय में सूरसागर एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथ माना जाता है।
किन्तु कवि की रचना में संकुचित साम्प्रदायिकता का पूर्ण अभाव है। वल्लभ-सम्प्रदाय
के शुद्धाद्वैतवाद दर्शन के विस्तार भी 'सूरसागर' में नहीं मिलते। धर्म अथवा दर्शन
के कुछ मूल सिद्धान्तों को कवि ने अवश्य माना है, जैसे श्रीकृष्ण को साक्षात् परब्रह्म
अथवा उनका अवतार मानना, राधा को परब्रह्म की शक्ति के रूप में समझना,
गोपियों को आत्मा का प्रतीक मानना, श्रीकृष्ण अथवा परब्रह्म की प्राप्ति के उपायों
में प्रेमभक्ति के मार्ग को सर्वश्रेष्ठ समझना इत्यादि। किन्तु इन मूल सिद्धान्तों की
अभिव्यक्ति कवि ने उत्कृष्टतम काव्य के रूप में की है। यही कारण है कि भावुक
कृष्णभक्तों तथा सहृदय काव्य-रसिकों, दोनों ही की पूर्ण तुष्टि करने में महाकवि की
यह असाधारण कृति समान रूप से पूर्णतया सफल हुई है।
विषय-सूची
विनय तथा भक्ति १७
मंगलाचरण १७, सगुणोपासना १७, भक्त-वत्सलता १८, अविद्या
माया २२, गुरु महिमा २३, नाम महिमा २४, विनती २५, भगवदाश्रय २६,
भावी ३१, वैराग्य ३३, मन प्रबोध ३६, चित्तबुद्धि-संवाद ४१, हरिविमुख-
निन्दा ४२, सत्संग महिमा ४३, स्थितप्रज्ञ ४३, आत्मज्ञान ४४।
गोकुल-लीला ४७
कृष्ण जन्म ४७, शैशवचरित ५०, वालगोपाल ५५, माखन-चोरी ६५।
वृन्दावन-लीला ८०
वृन्दावन प्रस्थान ८०, गोदोहन ८०, गो-चारण ८०, काली दमन ८७,
मुरली ९४, कमरी १००, चीर-हरन १०१, गोवर्द्धन धारण १०४,
रासलीला ११०, पनघट लीला १२०, दमन लीला १२३, गोपिका अनु-
राग १३३, रूप वर्णन १३६, नेत्र अनुराग १४१।
राधा-कृष्ण १४६
प्रथम मिलन १४६, गाढ़ी कृष्ण १५०, सम्बन्ध रहस्य १५३,
राधा सखी संवाद १५६, माता की सीख १६०, कृष्ण दर्शन १६१, राधा
का अनुराग १६४, उपहास १७१, सहसा भेट १७२, व्याज मिलन १७६,
भ्रम १८१, एकनिष्ठा १८२, लघुमान लीला १८४, कृष्ण-गोपिका १८६,
मानलीला १९३, खंडिता प्रकरण १९६, मध्यम मान १९८, बड़ी मान-
लीला २०३, वसंतोत्सव २०७।
मथुरा गमन २११
अक्रूर ब्रज आगमन २११, मथुरा प्रयाण २१४, मथुरा प्रवेश तथा
कंस वध २१६, नन्द का ब्रज प्रत्यागमन २२५, गोपी-वचन तथा
ब्रजदशा २३०, गोपी विरह २३६।
उद्धव संदेश २६०
उद्धव को ब्रज भेजना २६०, तीन पाती तथा संदेश २६५, उद्धव ब्रज
आगमन २६६, उद्धव का गोपियों को पाती देना २७४, भ्रमरगीत २७८,
[ १४ ]
उद्धव-गोपी संवाद २७६, उद्धव हृदय-परिवर्तन तथा गोपी संदेश ३१६,
पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेश ३२५, उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा
कृष्ण-उद्धव संवाद ३२७, श्रीकृष्ण वचन ३३६।
द्वारिका चरित ३३८
द्वारिका प्रयाण ३३८, रुक्मिणी परिणय ३३८, बलभद्र ब्रज यात्रा ३४२,
सुदामा चरित ३४४, ब्रजनारी पथिक संवाद ३४६, रुक्मिणी-कृष्ण
संवाद ३५४, कुरुक्षेत्र मे कृष्ण-ब्रजवासी भेट ३५५, राधाकृष्ण
मिलन ३५६ ।
परिशिष्ट -
(क) राम चरित ३६४
(ख) अंतर्कथाएँ ३७४
पदानुक्रमणी ३८५
सूरसागर सार
सटीक
इस छवि में कोई पाठ (text) दिखाई नहीं दे रहा है; छवि पूरी तरह से रिक्त (blank) है।
विनय तथा भक्ति
मंगलाचरण
चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अँधे कौं सब कछु दरसाइ ।
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ ॥१॥
अर्थ—मैं भगवान् के कमलवत् चरणों की वन्दना करता हूँ, जिनकी कृपा से
लंगड़ा पर्वत लांघ जाता है [तथा] अन्धे को सब कुछ दिखाई पड़ने लगता है, बहरा
सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है तथा अत्यन्त निर्धन भी छत्रधर (सम्राट्) बन
जाता है। सूरदास कहते है कि ऐसे कृपालु स्वामी के उन चरणों की मैं बार-बार
वन्दना करता हूँ ॥१॥
सगुणोपासना
अबिगत-गति कछु कहत न आवै ।
ज्यौँ गूँगैं मीठे फल कौ रस अंतरगत हीँ भावै ।
परम स्वाद सबही सु निरंतर अमित तोष उपजावै ।
मन-बानी कौं अगम-अगोचर, सो जाने जो पावै ।
रूप-रेख-गुन-जाति जुगति-बिनु निरालंब कित धावै ।
सब विधि अगम बिचारहिं तातैं सूर सगुन-पद गावै ॥२॥
अर्थ—[भगवान् के] अव्यक्त (निर्गुणस्वरूप) की कुछ रीति कही नही जा
सकती । जैसे गूंगे को मीठे फल का स्वाद मन-ही-मन अच्छा लगता है, वैसे ही निर्गुण
ब्रह्म की प्राप्ति का आनन्द भी अत्यन्त उच्चकोटि का है तथा निरन्तर असीम सन्तोष
प्रदान करने वाला है। [निर्गुण ब्रह्म] मन वाणी के द्वारा दुर्बोध एव अग्राह्य है तथा
इन्द्रियातीत है, जो उसे प्राप्त कर लेता है वही उसे जान पाता है (उससे उत्पन्न आनन्द
तथा ज्ञान की अनुभूति मनुष्य अभिव्यक्त नही कर सकता ।) [निर्गुण ब्रह्म] रूप,
आकार, गुण, जाति तथा तर्क से रहित (अव्यपदेश्य) है। इस प्रकार निरवलम्ब होकर
[मन निर्गुण ब्रह्म के ध्यान मे] कहाँ दौड़े ? अतः (निर्गुण ब्रह्म को) विचार की दृष्टि
से सब प्रकार से पहुँच के बाहर (अगम) जानकर सूर अपने पदो मे (ब्रह्म के) सगुण
रूप का गायन कर रहा है ॥२॥
२
१५ सूरसागर सार सटीक
भक्तवत्सलता
बासुदेव की बड़ी बड़ाई ।
जगत पिता, जगदीस, जगत-गुरु, निज भक्तनि की सहत ढिठाई ।
भृगु कौ चरन राखि उर ऊपर, बोले बचन सकल-सुखदाई ।
सिव-विरंचि मारन कौँ धाए, यह गति काहू देव न पाई ।
बिनु-बदलैँ उपकार करत हैं, स्वारथ बिना करत मित्राई ।
रावन अरि कौ अनुज विभीषन, ताकौँ मिले भरत की नाई ।
बकी कपट करि मारन आई, सो हरि जू बैकुंठ पठाई ।
बिनु दीन्हेँ ही देत सूर प्रभु, ऐसे हैंँ जदुनाथ गुसाईं ॥३॥
अर्थ—वासुदेव (श्रीकृष्ण) की महत्ता अवर्णनीय है । वे सम्पूर्ण संसार के पिता,
स्वामी तथा गुरु हैं और अपने भक्तो की धृष्टता सहन कर लेते हैं । भृगु के चरणों
[के आघात] को अपने हृदय पर सहन कर उन्होने सबको आनन्दित करने वाले वचनों
का प्रयोग किया । [इस प्रकार की सहनशीलता के अभाव मे] शिव और ब्रह्मा [अपना
अपमान करने वाले भृगु को] मारने दौडे । इस प्रकार की गति कोई भी देवता नही
प्राप्त कर सका । [जैसी विष्णु भगवान् ने दिखलाई] प्रतिफल की इच्छा के बिना वे
उपकार करते है । [तथा] स्वार्थ रहित सोहार्द्र का भाव रखते है । [उनकी इस उदारता
का एक अन्य प्रमाण यह है कि] शत्रु रावण के छोटे भाई विभीषण से वे भरत की
भाँति [अर्थात् भाई के समान निश्छल रूप से] मिले । बकी कपट [रूप धारण] करके
भगवान् को मारने आयी थी, उसे उन्होने [कृपा करके] स्वर्ग भेज दिया । सूर के प्रभु
भक्तो से बिना कुछ प्राप्त किये ही [बहुत कुछ] दे डालते है । यदुवंशियों मे श्रेष्ठ (श्री-
कृष्ण) इस प्रकार के [उदार तथा महान्] स्वामी हैं ॥३॥
प्रभु कौ देखौ एक सुभाइ ।
अति-गंभीर-उदार-उदधि हरि, जान-सिरोमनि राइ ।
तिनका सौँ अपने जनकौ गुन मानत मेरु-समान ।
सकुचि गनत अपराध-समुद्रहिँ बूंद-तुल्य भगवान ।
बदन-प्रसन्न कमल सनमुख ह्वैँ देखत हौँ हरि जैसेँ ।
विमुख भए अकृपा न निमिषहूँ, फिरि चितयौँ तो तैसेँ ।
भक्त-विरह कातर करुनामय, डोलत पाछैँ लागे ।
सूरदास ऐसे स्वामी कौँ देहिँ पीठि सो अभागे ॥४॥
अर्थ—प्रभु (भगवान् श्रीकृष्ण) का एक स्वभाव [विशेष रूप मे] दिखाई पडता
है । भगवान् सागर की भाँति गंभीर तथा उदार है । ज्ञानियों मे सर्वश्रेष्ठो के राजा
है । अपने भक्त के तृणवत् (अल्प) गुणो को वे सुमेरु पर्वत के समान (महान्) हैं तथा
समुद्र तुल्य [बडे-बडे] अपराधो को बूंद के समान छोटा मानते है । [भक्त के] भगवान्
के समक्ष (शरण में) जाने पर जिस प्रकार वे कमल की भाँति प्रसन्नमुख दिखाई पड़ते
है, (भक्त के) विमुख हो जाने पर भी वे [वैसे ही प्रसन्नमुख तथा कृपालु रहते हैं और]
उसके ऊपर एक क्षण के लिये भी क्रोध नही करते । भक्त जब फिर उनकी ओर झुकता
है तो वे पूर्ववत् ही [कृपालु] हो जाते हैं। भक्त के विरह में व्याकुल भगवान् उसके
पीछे लगे घूमते रहते हैं। सूरदास कहते हैं कि ऐसे कृपालु स्वामी से मुख मोड़ने वाले
बड़े ही अभागे हैं ॥४॥
राम भक्तवत्सल निज बानौँ ।
जाति, गोत, कुल नाम, गनत नहिँ, रंक होइ कै रानौँ ।
सिब-ब्रह्मादिक कौन जाति प्रभु, हौं अजान नहिँ जानौँ ।
हमता जहाँ तहाँ प्रभु नाहीँ, सो हमता क्योँ मानौँ ?
प्रगट खंभ तैँ दए दिखाई, जद्यपि कुल कौ दानौ ।
रघुकुल राघव कृष्ण सदा ही, गोकुल कीन्हौँ थानौ ।
बरनि न जाइ भक्त की महिमा, बारंबार बखानौँ ।
ध्रुव राजपूत, बिदुर दासी-सुत कौन कौन अरगानौ ।
जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भक्तनि हाथ बिकानौ ।
राजसूय मैँ चरन पखारे स्याम लिए कर पानीँ ।
रसना एक, अनेक स्याम-गुन, कहँ लगि करौँ बखानौ ।
सूरदास-प्रभु की महिमा अति, साखी बेद पुरानौ ॥५॥
अर्थ—भक्तवत्सलता ही भगवान् का निजी स्वरूप, बिरद (बाना) है। [भक्त
के प्रति वात्सल्य भाव रखने मे] वे जाति, गोत्र, कुल तथा नाम (आदि) की गणना
(भेद) नही करते, न इस बात का कि वह रंक है या राजा । हे प्रभु, शिव ब्रह्मा आदि
की कौन जाति है - मैं अज्ञानी कुछ नहीं जानता । अहंकार की भावना जहाँ होती है
वहाँ प्रभु [का सान्निध्य] प्राप्त नही हो सकता, तो ऐसे अहंकार की भावना को हम
प्रश्रय क्यो दे ? यद्यपि [प्रह्लाद] दैत्यवंश मे उत्पन्न हुआ था [तथापि उसकी रक्षा के
लिये] स्तम्भ से प्रकट हुये । [भगवान्] [रघुवंश मे रामचन्द्रजी के रूप मे प्रकट हुए
तथा] श्रीकृष्ण के रूप मे गोकुल को [उन्होने] अपना स्थान बनाया । भक्त की महिमा
का [आसानी से] वर्णन नही हो सकता [इस कारण मैं] बार-बार उनका बखान कर
रहा हूँ। ध्रुव राजपुत्र थे किन्तु विदुर दासी पुत्र थे तथा और भी किसका किसका भेद
करूँ (तफ़सील दूँ) [जिनके उद्धार मे भगवान् ने भेद-भाव नही रखा] युगो से भगवान्
का यह गुण या सुयश (बिरद) प्रसिद्ध है कि वे भक्तो के हाथ बिक चुके है । [महाराज
युधिष्ठिर के] राजसूय में भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने हाथ मे जल लेकर [अपनी महत्ता
का विचार न करके राजाओ के] चरण धोये । जिह्वा एक है किन्तु श्याम के गुण अनेक
हैं उनका बखान कहाँ तक करूँ ? सूरदास के प्रभु की महिमा असीम है, वेद तथा पुराण
इसके साक्षी (समर्थक) है ॥५॥
२० सूरसागर सार सटीक
काहू के कुल तनन विचारत ।
अविगत की गति कहि न परति है, व्याध अजामिल तारत ।
कौन जाति अरु पाँति बिदुर की, ताही कैँ पग धारत ।
भोजन करत माँगि घर उनकैँ, राज मान-मद टारत ।
ऐसे जनम-करम के ओछे, ओछिन हूँ व्यौहारत ।
यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ, भक्त-बछल प्रन पारत ॥६॥
अर्थ— भगवान् [भक्तो का उद्धार करने मे] किसी के कुल की ओर ध्यान नही
देते । [उन] अविज्ञेय की लीला कही नही जाती (अकथनीय है) वे व्याध और अजामिल
[जैसे अधम पापियो] को भी तारते हैं । विदुर की जाति तथा श्रेणी कौन बड़ी ऊँची
थी, किन्तु उनके यहाँ (भगवान्) पधारे । उनके घर उन्होंने मांग कर भोजन किया
[और] (दुर्योधन के) राजमद पूर्ण सम्मान को अस्वीकार किया । इस प्रकार जो जन्म
तथा कर्म से हीन, (ओछे) हैं, उन छोटों (ओछनि) के साथ ही वे सम्बन्ध रखते हैं ।
सूर के प्रभु का यही स्वभाव है । [इस प्रकार] वे अपनी भक्त-वत्सलता के दृढ़ निश्चय
(प्रण) का पालन करते है ॥६॥
सरन गए को को न उवारचौ ।
जब जब भीर परी संतति कौँ, चक्र सुदरसन तहाँ सँभारचौ ।
भयौ प्रसाद जु अबरीष कौँ, दुरवासा कौ क्रोध निवारचौ ।
ग्वालनि हेत धरचौ गोवर्धन, प्रकट इद्र कौ गर्व प्रहारचौ ।
कृपा करी प्रहलाद भक्त पर, खंभ फारि हिरनाकुस मारचौ ।
नरहरि रूप धरचौ करुनाकर, छिनक माहिँ उर नखनि बिदारचौ ।
ग्राह ग्रसत गज कौँ जल बूडत, नाम लेत वाकौ दुख टारचौ ।
सूर स्याम विनु और करै को, रग भूमि मैँ कस पछारचौ ॥७॥
अर्थ—भगवान् ने [अपनी] शरण में आये हुए किसका-किसका उद्धार नही
किया ? जब-जब सन्तो [भक्तो] पर विपत्ति पंडी भगवान् ने तत्क्षण सुदर्शन चक्र
संभाला । भगवान् अंबरीष पर प्रसन्न हुए तथा दुर्वासा के क्रोध का निवारण किया ।
ग्वालों के (हित के लिए गोवर्धन) [पर्वत] को धारण किया तथा प्रकट रूप मे
(निस्संकोच) इन्द्र के गर्व को नष्ट किया । भक्त प्रह्लाद पर कृपा करते हुए (भगवान् ने)
खम्बे को फाडकर हिरण्यकश्यप का सहार किया । कृपालु स्वामी ने नृसिंह रूप धारण
कर क्षणमात्र मे ही उसके हृदय को नखो से विदीर्ण कर डाला । ग्राह द्वारा ग्रस्त
गजराज के [भगवान् का] नाम लेते ही भगवान् ने उसके कष्टो का निवारण किया ।
[उन्होने] रगभूमि (समारोह के स्थान) मे कस को मार डाला । (पछारयो) । सूर के
श्याम के बिना ऐसे कार्य और कौन कर सकता है ? ॥७॥
स्याम गरीवनि हूँ के ग्राहक ।
दीनानाथ हमारे ठाकुर, साँचे प्रीति-निवाहक ।
विनय तथा भक्ति २१
कहा बिदुर की जाति-पाँति, कुल, प्रेम-प्रीति के लाहक ।
कह पांडव कैं घर ठकुराई ? अरजुन के रथ-बाहक ।
कहा सुदामा कैं धन हौ ? तौ सत्य-प्रीति के चाहक ।
सूरदास सठ, तातैं हरि भजि आरत के दुख-दाहक ॥८॥
अर्थ- श्याम (श्रीकृष्ण) निर्धनों के ही चाहने वाले हैं । हमारे प्रभु दीन-हीनों
के स्वामी तथा सच्चे प्रेम का निर्वाह करने वाले हैं। बिदुर की जाति, श्रेणी, तथा कुल
किस गिनती के थे किन्तु भगवान् ने उन्हे ग्रहण किया, [क्योंकि वे] प्रेम तथा भक्ति
को [ही] ग्रहण करने वाले (लाहक) है। पाण्डवो के पास स्वामित्व कहाँ था ? किन्तु
वे अर्जुन के रथ के सारथी बने । सुदामा के पास धन कहाँ था (होतौ) ? [जिससे वे
भगवान् मे मित्रता स्थापित कर पाते] किन्तु भगवान् तो सच्चे प्रेम के ही चाहने वाले
है। सूरदास कहते हैं कि इस बात को समझते हुए इस कारण (तातैं) हे शठ [मन] तुम
भगवान् का भजन करो, [क्योंकि] वे आर्तों के दुख को दूर करने वाले है ॥८॥
जैसें तुम गज कौ पाउँ छुड़ायौ ।
अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ ।
जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं तहँ तहँ आपु जनायौ ।
भक्ति हेत प्रहलाद उवार्यौ, द्रौपदि-चीर बढ़ायौ ।
प्रीति जानि हरि गए विदुर कैं, नामदेव-घर छायौ ।
सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ ॥६॥
अर्थ-[हे प्रभु,] जैसे तुमने गज के पैर को [ग्राह्य से] छुड़ाया, [तथा उस
अवसर पर] अपने भक्त को दुःखी जान कर पैदल ही दौड़ पड़े, [वैसे ही] जहाँ-जहाँ
भक्तो पर विपत्ति पड़ी वहाँ-वहां आप प्रकट हुए। भक्ति के ही कारण [भगवान् ने]
प्रह्लाद की रक्षा की तथा द्रौपदी का चीर बढ़ाया । [अपने प्रति निश्छल] प्रेम को जान
कर ही भगवान् विदुर के घर गये तथा उन्होने नामदेव का घर छाया । सूरदास कहते हैं
सुदामा निर्धन ब्राह्मण था, उसका भी दारिद्रय उन्होने विनष्ट किया ॥६॥
जापर दीनानाथ ढरै ।
सोइ कुलीन, बड़ी सुंदर सोइ, जिहिं पर कृपा करै ।
कौन विभीषन रंक-निसाचर, हरि हँसि छत्र धरै ।
राजा कौन बड़ौ रावन तैं, गर्वहिं-गर्व गरै ।
रकव कौन सुदामाहूँ तैं, आप समान करै ।
अंधम कौन है अजामील तैं, जम तहँ जात डरै ।
कोन विरक्त अधिक नारद तैं, निसि-दिन भ्रमत फिरै ।
जोगी कौन कड़ौ संकर तैं, ताकौँ काम छरै ।
२२ सूरसागर सार सटीक
अधिक कुरूप कौन कुविजा तैं, हरि पति पाइ तरै ।
अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम वियोग भरै ।
यह गति-मति जानै नहि कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै ।
सूरदास भगवंत-भजन बिनु, फिरि फिरि जठर जरै ॥११०॥
अर्थ-जिस पर दीनानाथ द्रवित होते हैं तथा कृपा करते हैं वही [वास्तव मे]
अच्छे कुलवाला तथा बडे सुन्दररूप वाला है। विभीषण कौन [बडा सुन्दर तथा कुलीन]
था, निर्धन राक्षस मात्र ही तो था, किन्तु भगवान् ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर छत्र
रखा (उसे सम्राट् बना दिया)। रावण से बडा राजा कौन था किन्तु वह गर्व ही गर्व
मे गल गया। सुदामा से अधिक निर्धन कौन हो सकता है जिसे उन्होने अपने समान
[ऐश्वर्य सम्पन्न] बना दिया। अजामिल से अधिक अधम कौन हो सकता है किन्तु [भगवान्
की कृपा से] यमदूत उसके पास जाने से डरने लगे। नारद से अधिक विरक्त कौन हो
सकता है किन्तु वे रात-दिन भ्रमण-शील रहते हैं। शंकर से बडा योगी कौन है किंतु
उन्हे भी काम ने छला (वे कामासक्त हो गये) कुब्जा से अधिक कुरुपा कौन (हो सकती)
है किन्तु वह भगवान् जैसे पति को प्राप्त करके तर गयी। सीता से अधिक रूपवती
कौन है किन्तु उन्हे वियोग मे जीवन बिताना पडा। भगवान् की वह प्रवृत्ति तथा
स्वभाव (गति-मति) कोई नही जानता कि किस रस में वे रसिक ढल जायेगे। (अर्थात्
: भक्त की किस विशेषता पर वे रीझ जाते है) सूरदास जी कहते है कि भगवान् के भजन
के बिना बार-बार जठराग्नि [पेट की ज्वाला] मे जलना पड़ता है। (गर्भ-वास की सांसत
मे पड़ना होता है, अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा नही मिलता) ॥११०॥
अविद्या माया
विनती सुनौ दीन की चित्त दै, कैसेँ तुव गुन गावै ?
माया नटी लकुटी कर लीन्हें, कोटिक नाच नचावै ।
दर-दर लोभ लागि लिए डोलति, नाना स्वाँग बनावै ।
तुम सौँ कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै ।
मन अभिलाष-तरंगनि करि करि, मिथ्या निसा जगावै ।
सोवत सपने मैं ज्यौ संपत्ति, त्यौँ दिखाइ बौरावै ।
महा मोहिनी मोहि आतमा, अपमारगहि लगावै ।
ज्यौँ दूती पर-वधू भोरि कै, ले पर-पुरुष दिखावै ।
मेरे तो तुम पति, तुमहीँ गति, तुम समान को पावै ?
सूरदास प्रभु तुम्हरी कृपा बिनु, को मो दुख बिसरावै ॥१११॥
अर्थ-हे प्रभु, आप [मुझ] दीन [भक्त] की विनय ध्यान से सुनें [कठिनाई
यह है कि] मैं आपका गुणगान कैसे करूँ ? [क्योकि] नटी माया [लोभ रूपी] लकुटी
हाथ मे लेकर मुझ [कपि] को करोडों प्रकार से नाच नचाती रहती है। मुझ लोभ-
ग्रस्त को द्वार-द्वार फिराती है और [मुझ से] नाना प्रकार के तमाशे (स्वांग)
विनय तथा भक्ति २३
कराती है, हे प्रभु यह आपके साथ कपट [पूर्ण व्यवहार] करने के लिये प्रेरित करती है,
तथा मेरी बुद्धि को भ्रमित कर देती है । मन मे अनेक [प्रकार की] अभिलाषा रूपी
तरंगें उत्पन्न करके भ्रम रूपी रात्रि में जगाती है सोते समय स्वप्न मे प्राप्त सम्पत्ति की
भांति [अनेक प्रकार की सम्पत्तियों का] प्रलोभन देकर मुझे बावला (अर्थात् विवेकहीन)
बना देती है। [मोह (अज्ञान) मे डालने की अत्यन्त प्रबल शक्ति वाली यह] महा मोहिनी
[माया] [जीव रूपी] आत्मा को मोहित कर अनेक कुमार्गों की ओर (उसी प्रकार)
प्रवृत्त करती है जिस प्रकार दूती दूसरे की वधू को भुलावा देकर पर पुरुष से मिलाती
है । सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, आप ही मेरे पति हैं, आप ही मेरे प्राप्य (आत्म-निवेदन
के पात्र हैं)। आपके समान मै और किसे प्राप्त कर सकता हूँ ? [जिसको निवेदन करूँ]
आपकी कृपा के बिना कौन मेरे इस दुख को (संकट को) दूर कर सकता है ? तात्पर्य
यह है कि आप की कृपा से ही मैं उपर्युक्त माया-जनित सकट से मुक्त होकर आपके
प्रति वास्तविक आत्म-समर्पण करके सच्चे भक्ति-भाव से आपका गुणगान करने का
अधिकारी बन सकता हूँ ॥११॥
हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ ।
कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ ।
जबै आवौं, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ ।
ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ ।
वेष धरि धरि हर्यौ पर-धन, साधू-साधु कहाइ ।
जैसे नटवा लोभ-कारन करत स्वाँग बनाइ ।
करौं जतन, न भजौं, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ ।
सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ ॥१२॥
अर्थ—हे भगवान्, तुम्हारा भजन किया ही नही जाता । क्या करूँ ?
तुम्हारी प्रबल माया मन को भ्रमित कर देती है । जब मैं सत्संग मे आता हूँ तो मन
कुछ स्थिर होता है । किन्तु उसका फिर वही [चंचलता वाला पहला] स्वभाव हो जाता
है, जैसे गजेन्द्र नदी मे स्नान करता है [किन्तु फिर] अपने अंगों पर सूंड से धूल डालने
का पुराना स्वभाव ग्रहण कर लेता है । साधु-सन्तो के वेश धारण कर-करके तथा सन्त
कहला-कहला कर मैं दूसरों का धन [उसी प्रकार] लूटता रहा जिस प्रकार नट [केवल]
धन-प्राप्ति के लिए (लोभ-कारन) सजकर [अनेक प्रकार के] स्वांग रचता है (अभिनय
करता है) । मै [तुम्हारे भजन के लिए] तत्पर तो होता हूँ, किन्तु तुम्हारा भजन कर
नही पाता, [वैसा करने की चेष्टा करते हुए] मन में [सांसारिक मोह के] कुछ और ही
भाव उत्पन्न हो जाते है । सूरदास कहते है कि प्रभु की माया [बड़ी] बलवती है, मुझे
भुलावे में डाल देती है ॥१२॥
गुरु महिमा
गुरु बिनु ऐसी कौन करै ?
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै ।
२४ सूरसागर सार सटीक
भवसागर तैं बूड़त राखै, दीपक हाथ धरै।
सूर स्याम गुरु ऐसी समरथ, छिन मैँ ले उघरै ॥१३॥
अर्थ-गुरु के बिना ऐसी [कृपा] कौन कर सकता है ? [वे] माला और तिलक
से युक्त मनोहर रूप धारण कर शिर पर छत्र धारण करते है। संसार-सागर मे डूबने
से बचाने के लिए [वे] (ज्ञान रूपी) दीपक [शिष्य के] हाथ मे देते हैं। सूरदास कहते
हैं कि हे श्रीकृष्ण, गुरु इतने समर्थ हैं कि एक क्षण मे ही सहारा देकर [इस संसार-
सागर से] उबार लेते हैं ॥१३॥
नाम महिमा
हमारे निर्धन के धन राम।
चोर न लेत, घटत, नहि कबहुँ, आवत गाढैँ काम।
जल नहिं बूड़त, अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम।
बैकुंठनाम सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥१४॥
अर्थ-निर्धनों के धन राम ही हमारे धन हैं। [यह धन ऐसा है कि] इसे चोर
नही ले सकते, यह कभी घट नही सकता तथा कठिन परिस्थितियों में काम आता है।
वह जल में नही डूबता, आग में नही जलता। भगवान् का नाम ऐसा [धन] है।
वैकुण्ठधाम के स्वामी [विष्णु भगवान्] सब सुखो के देने वाले तथा सूरदास के सुखो के
भण्डार हैं ॥१४॥
बड़ी है राम नाम की ओट ।
सरन गएँ प्रभु काढ़ि देत नहिं करत कृपा कैँ कोट।
बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट ?
सूरदास पारस के परसैँ मिटति लोह की खोट ॥१५॥
अर्थ-राम नाम की आड़ (शरण) बहुत बड़ी है। शरण मे जाने से भगवान्
भगा नही देते वरन् [शरणागत की] कृपा रूपी गढ़ मे सुरक्षा करते है। भगवान् की
सभा में सभी [समान रूप से] बैठते (आश्रय पाते) हैं [वहां के लिए] कौन बड़ा, कौन
छोटा ? सूरदास कहते हैं कि पारस के स्पर्श से लोहे का दोष (कुधातुत्व) मिट जाता
है, [वह सोना बन जाता है]; अर्थात् राम नाम में मन लगाने या भगवच्छरणागति
से बड़ा-से-बड़ा पापी भी साधु या भक्त बन जाता है ॥१५॥
जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ।
सो सुख होत न जप-तप कीन्हें, कोटिक तीरथ नहाऐँ।
दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाएँ।
तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नँद-नंदन उर आएँ।
बंसीबट, वृन्दावन, जमुना, तजि बैकुण्ठ न जावै।
सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल आवै ॥१६॥
१. विनय तथा गुरु महिमा
विनय तथा भक्ति २५
अर्थ—जैसा सुख गोपाल (श्रीकृष्ण) के गुण गाने से [प्राप्त] होता है, वैसा
सुख जप, तपस्या तथा करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नही [प्राप्त] होता। भगवान्
के कमलवत् चरणों में मन लग जाने पर चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) को कोई
देने से भी नही लेता। नन्द-नन्दन श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करने लगने पर भक्त
तीनों लोकों [की अखण्ड सम्पत्ति] को तृणवत् समझने लगता है। वंशी-वट (वह बरगद
का पेड़ जिसके नीचे श्री कृष्ण बंशी बजाते थे), वृन्दावन तथा यमुना को छोड़ कर वह
विष्णु-लोक भी नही जाना चाहता। सूरदास कहते है कि भगवान् का स्मरण करते
रहने पर फिर [इस] संसार सागर मे नही आना पड़ता (जन्म-मरण के चक्र से छुट-
कारा मिल जाता है) ॥१६॥
बिनती
बंदौँ चरन-सरोज तिहारे।
सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे।
जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैँ नहिं टारे।
जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मन-बच-क्रम प्रहलाद सँभारे।
जे पद-पदुम-परस-जल-पावन, सुरसरि-दरस कटत अघ भारे।
जे पद-पदुम-परस-ऋषि-पतिनी बलि, नृग, व्याध, पतित बहु तारे।
जे पद-पदुम रमत वृन्दावन, अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे।
जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि, सरबस दै, सुत-सदन बिसारे।
जे पद-पदुम रमत पांडव-दल, दूत भए, सब काज सँवारे।
सूरदास तेई पद-पंकज, त्रिविधि-ताप-दुख-हरन हमारे ॥१७॥
अर्थ—हे कमल के दलों के समान नेत्रों वाले श्याम सुन्दर [वंशी-वादन के
समय] रमणीय त्रिभंगी (गरदन, कमर और दाहिने पाँव मे तीन जगह बल वाली) मुद्रा
वाले प्राण-प्यारे आपके कमलवत् चरणो की वन्दना करता हूँ। जो कमलवत् चरण
शिव की शाश्वत सम्पत्ति है तथा जिन चरणों को लक्ष्मी जी अपने हृदय से नही हटाती
जिन कमलवत् चरणो ने पिता के क्रोध से मन वचन कर्म से संत्रस्त प्रह्लाद की रक्षा
की। जिन कमलवत् चरणो के स्पर्श से पवित्र जल वाली गङ्गा जी के दर्शन [मात्र] से
बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। जिन कमलवत् चरणों के स्पर्श ने [गौतम] ऋषी की पत्नी
(अहिल्या), बलि, नृग, व्याध आदि बहुत से पतितों को तार दिया। जिन कमलवत्
चरणों से [भगवान् ने] वृन्दावन में विचरण किया और जिन चरणो को कालिय नाग
के शिर पर रखकर असंख्य शत्रुओं का विनाश किया। जिन कमलवत् चरणों का स्पर्श
कर व्रजांगनाओं ने [भगवान् को अपना] सर्वस्व देकर अपने परिजन तथा घर को भुला
दिया, [तथा] जिन चरण कमलो से घूमते हुए [भगवान् ने] पाण्डवों के दूत बन कर
[उनके] सभी कार्य सम्पन्न किये। सूरदास कहते हैं कि भगवान् के ऐसे जो चरण-
कमल हैं वे हमारे त्रिविध (दैहिक, दैविक और भौतिक) तापो तथा दुखों का हरण
करने वाले हैं ॥१७॥
२६ सूरसागर सार सटीक
अब कैं राखि लेहु भगवान ।
हौं अनाथ बैठ्यो द्रुम-डरिया, पारधि साधे वान !
ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान ।
दुहुँ भाँति दुख भयो आनि यह, कौन उबारै प्रान ?
सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान ।
सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥१८॥
अर्थ—घोर संकट मे पड़ा हुआ पक्षी प्रार्थना करता है कि हे भगवान् इस वार
(इस संकट से) बचा लीजिये । मैं अनाथ वृक्ष की शाखा पर बैठा हूँ, वधिक ने मेरे ऊपर
वाण का सन्धान किया है। उसके भय से मै भागना चाहता हूँ [किन्तु] ऊपर वाज
[मेरे लिए] ताक लगाए हुए है। दोनो ओर से यह [प्राणो का] संकट आ पड़ा है, कौन
[इससे] प्राणो की रक्षा करे ? [इस प्रकार भगवान् का] स्मरण करते ही व्याध को
सांप ने डस लिया और [पक्षी को मारने के लिए चढ़ा वाण छूट गया] [और] सूरदास
कहते हैं कि [वह] बाण वाज को जा लगा। ऐसे कृपालु [भगवान्] की जय हो,
जय हो ॥१८॥
आछौ गात अकार गारचौ ।
करी न प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हारचौ ।
निसि-दिन विषय-विलासनि बिलसत, फूटि गई तब चारचौ ।
अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन, दई कौ मारचौ ।
कामी, कृपन, कुचील, कुदरसन, को न कृपा करि तारचौ ।
तातैं कहत दयाल देव-मनि, काहैं सूर बिसारचौ ॥१९॥
अर्थ—[मैने यह] सुन्दर [मानव] शरीर व्यर्थ मे ही नष्ट कर दिया। कमल
नेत्र [भगवान् श्रीकृष्ण] से प्रेम नही किया [तथा इस दुर्लभ मानव] जीवन को जुए [के
दाँव] की भांति हार गया (जीवन व्यर्थ मे ही समाप्त कर दिया) रात-दिन [सासारिक]
विषय-सुखो की आसक्ति मे लीन रहा। उस समय [मेरी] चारो आँखे फूट गई थी (मेरी
बाहरी दोनो आँखे तो फूटी है ही, विषयान्ध होने के कारण भीतरी-ज्ञान की-दोनों आँखे
भी फूटी थी) । [परिणाम-स्वरूप] अब दीन-हीन बन कर भाग्य (दई) का मारा हुआ
दुःखी होकर पश्चात्ताप करने लगा हूँ। कामासक्त कृपण मैले-कुचैले वस्त्रो वाले (गये-
बीते) तथा अपवित्र दर्शन वाले [पापियो] मे भगवान् ने कृपा करके किसे नही (संसार
सागर से) तारा ? इसीलिये हे दयालु, देव-देव [भगवन्] आप से फरियाद करता हूँ कि
[इस] सूर को क्यों भुला दिया ? (मुझे भी कृपा करके तारिये) ॥१९॥
तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत ।
लालच लागि कोटि देवन के, फिरत कपटनि खोलत ।
जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहीं लगि यह प्रीति ।
विनय तथा भक्ति २७
फल मांगत फिरि जात मुकर ह्वै, यह देवन की रीति।
एकनि कौँ जिय-बलि दै पूजे, पूजत नैँकु न तूठे।
तब पहिचानि-सबनि कौँ छाँड़े नख-सिख लौँ सब झूठे।
कंचन मनि तजि काँचहिँ सैंतत, या माया के लीन्हे।
चारि पदारथ हूँ को दाता, सु तौ विसर्जन कीन्हे।
तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक।
सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ॥२०॥
अर्थ—हे प्रभु, प्राणी जब तक आपकी शरण में नही आता [तुम बिनु] वह
निरंतर भ्रम मे पड़ा हुआ [विभिन्न योनियों मे या इधर-उधर] भटकता रहता है, लोभ-
वश करोड़ों देवताओ के दरवाजे खटखटाता फिरता है। जब तक उन्हें (देवताओ को)
सर्वस्व देते रहे तभी तक उनका प्रेम रहता है किन्तु फल की याचना करने पर वे मुकर
जाते हैं (देने को तैयार नही होते) यही देवताओं का नियम है (अर्थात् वे लेना जानते
है, देना नही)। कुछ देवताओं की जीवों की वलि देकर पूजा की गई, किन्तु पूजा करने
से वे बिल्कुल सन्तुष्ट नही हुए। इस प्रकार सभी देवों को पहचान कर मैंने छोड़ दिया
[समझ लिया कि] वे नख से शिख तक झूठे है। इस माया के वश मे होकर मैं [भगवान्
रूप] स्वर्ण तथा मणि का त्याग करके [देव-रूप] कांच को समेटता रहा, चारों पदार्थों
(अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) के दाता भगवान् का परित्याग कर दिया। हे केशव, आप कृतज्ञ
(भक्तो का उपकार मानने वाले या मनसा, वाचा, कर्मणा की हुई बातो के जानने वाले)
कृपालु तथा सम्पूर्ण लोक के स्वामी हैं। सूरदास कहते हैं कि हमने भगवान् के चरणों
को दृढ़तापूर्वक पकड़ा है, अब ये ही मेरे सहारे (सहायक) हैं ॥२०॥
आजु हौँ एक-एक करि टरिहौँ।
कै तुमहीँ, कै हमहीँ माधौ, अपने भरोसैँ लरिहौँ।
हौँ तो पतित सात पीड़िनि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौँ।
अब हौँ उघरि नच्यौ चाहत हौँ, बिरद बिन करिहौँ।
कत अपनी परतीति नसावत, मैँ पायौ हरि हीरा।
सूर पतित तबहीँ उठिहै प्रभु, जब हँसि दैहौ बीरा ॥२१॥
अर्थ—[हे प्रभु] आज मैं यह निपटारा करके ही मानूंगा कि [हम दोनों मे]
किसकी जीत होती है। मैं अपने [पातित्य के] भरोसे मुकाबला करूँगा, [और] हे माधव
या तो मैं ही [पतित] रह जाऊंगा, या तुम ही [पतित-पावन] रह जाओगे। मैं तो सात
पीढ़ियों का (खानदानी) पतित हूँ [और] पतित रहकर ही [आप द्वारा भव-सागर से]
उद्धार पाऊंगा (निस्तरि हौँ) अब मैं निरावरण होकर (निर्लज्ज होकर) नाचना चाहता
हूँ, [जिससे] तुम्हे विरुद्ध, अर्थात् पतित-पावनता की कीर्ति, से विहीन, कर दूँगा। हे
हरि, [मेरा उद्धार न करके भक्त-समाज में व्याप्त] अपना विश्वास क्यों नष्ट कर रहे
२८ सूरसागर सार सटीक
हो ? मैंने तो [तुम्हारी पतित-पावनता मे वज्रवत् सुदृढ, न टूटने वाला, विश्वास रूपी]
हीरा पा लिया है। हे प्रभु, यह पतित सूर तभी उठेगा जब आप हंसकर उसे वीडा
देगे अर्थात् प्रसन्न होकर उसे अपनी सेवा मे ले लेगे ॥२१॥
प्रभु, हौँ सब पतितनि कौ टीकौ ।
और पतित सब दिवस चारि के, हौँ तौ जनमत ही कौ ।
वधिक अजामिल, गनिका, तारी और पूतना ही कौ ।
मोहिं छांड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यों जी कौ ।
कोउ न समरथ अघ करिबे कौँ, खैँचि कहत हौँ लीकौ।
मरियत लाज सूर पतितनि मे, मौहूँ तैँ को नीकौ ॥२२॥
अर्थ-हे प्रभु मैं सब पापियो से बढकर हूँ । और सभी चार दिन (थोडे दिनो)
के ही पापी है [किन्तु] मै तो जन्म भर का पापी हूँ । आपने बधिक अजामिल, गणिका
को और पूतना को भी तारा। मुझे छोड कर आपने जो अन्य पापियो का उद्धार किया
मेरे हृदय की यह कसक कैसे मिटे ? मैं लकीर खीच कर कह रहा हूँ कि [मेरे बराबर]
पाप करने की सामर्थ्य किसी मे नही है। सूरदास कहते है कि मैं इस लज्जा के मारे
मरा जा रहा हूँ कि क्या पापियो मे कोई मुझसे भी बढकर है (जो पातित्य के आधार
पर मुझसे पहले तारे जाने का अधिकारी हो गया) ? ॥२२॥
अब मैँ नाच्यौ बहुत गुपाल ।
काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कठ विषय की माल ।
महामोह के नूपुर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल ।
भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल ।
तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना विधि दै ताल ।
माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल ।
कोटिक कला काछि दिखराई, जल-थल सुधि नहिं काल ।
सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल ॥२३॥
अर्थ-हे गोपाल [माया के वश मे होकर] मैं बहुत नाच चुका । [नृत्य के साज
के रूप मे] मैंने काम तथा क्रोध का जामा तथा कठ मे विषय वासनाओ की माला पहन
रखी है। [मेरी इस गति से] महामोह के नूपूर बजते है, [जिनसे] निन्दा का रसीला
शब्द निकलता है (जो माया से भ्रमित होने के कारण आनन्दप्रद जान पडते है) । भ्रम
रूपी भोयन (आटा जो पखावज पर ध्वनि मे ठनक उत्पन्न करने के लिए लगाया जाता
है) से युक्त मन रूपी पखावज (मृदंग) से शरीर के अन्दर तृष्णा रूपी नाद उत्पन्न होता
है, जिसके विविध प्रकार के तालो पर बेमेल (विसंगत) गति से नाचता रहा हूँ। मैंने
कमर मे माया रूपी फेंट बाँध लिया है तथा मरतक पर लोभ का तिलक दे रखा है।
[इस प्रकार माया के वशीभूत होकर] मैंने जल तथा स्थल मे स्मरणातीत काल से करोडो
विनय तथा भक्ति २६
[प्राणियों के] रूप धारण कर (बहुरूपिये के समान कितनी) कलाएं दिखाई है। हे
नन्दलाल, [इस कौशल-प्रदर्शन पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप] सूरदास की सारी
अविद्या को दूर कर दीजिए अर्थात् उसे माया-मुक्त कर दीजिये ॥२३॥
हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ।
इक लोहा पूजा मैँ राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ।
एक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिल गए तब एक बरन ह्वै, गङ्गा नाम परौ।
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिल बिगरौ।
कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥२४॥
अर्थ—हे प्रभु, हमारे दोषो पर आप ध्यान न दे। आपका नाम समदर्शी है,
इसलिए [अपनी इस विशेषता का ध्यान रखते हुए हमे भवसागर से] पार कर
दीजिए। (जिस प्रकार) एक लोहा पूजा [गृह] मे रखा जाता है [तथा] दूसरा बधिक
के घर मे पड़ा रहता है [जिससे वह पशु-वध करता है] किन्तु पारस उनमें भेद-भाव
नही रखता, उन्हे शुद्ध सोना (समान रूप से) बना देता है। [अच्छे जल से भरी] एक
नदी तथा मैले जल से भरा एक नाला दोनो मिल कर [गंगा जी मे] एकाकार
[एकरग के] हो जाते है तो उनका नाम [अभिन्न रूप से] गंगा पड़ जाता है। सूर-
दास कहते हैं कि शरीर माया तथा जीव ब्रह्म कहा जाता है, वह [उससे] मिल कर
[उसके बाहरी दोष से] बिगड़ गया है। हे प्रभु, उपर्युक्त न्याय के अनुसार या इनका
[शरीर और जीव का] न्याय कीजिए [और इन्हे शुद्ध कीजिए] या नही तो [आपका
समदर्शिता तथा पतित पावनता का] प्रण टला जाता ॥२४॥
भगवदाश्रय
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसेँ उड़ि जहाज को पछी, फिर जहाज पर आवै।
कमल-नैन कौं छांड़ि महातम, और देव कौँ ध्यावै।
परम गंग कौं छांड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै।
जिहिँ मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्योँ करील-फल भावै।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥२५॥
अर्थ—मेरा मन (भगवान् को छोडकर) अन्यत्र कहां सुख प्राप्त करे? जैसे
[बीच समुद्र मे फंसे हुए] जहाज पर से उडाया हुआ कौआ (अन्यत्र आश्रय न प्राप्त
कर सकने के कारण) उड़कर पुनः उसी जहाज पर वापस आ जाता है वैसे ही कमल-
नेत्र भगवान् श्रीकृष्ण का माहात्म्य छोड़कर अन्य देवताओं का ध्यान कौन करे?