सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति २३
कराती है, हे प्रभु यह आपके साथ कपट [पूर्ण व्यवहार] करने के लिये प्रेरित करती है,
तथा मेरी बुद्धि को भ्रमित कर देती है । मन मे अनेक [प्रकार की] अभिलाषा रूपी
तरंगें उत्पन्न करके भ्रम रूपी रात्रि में जगाती है सोते समय स्वप्न मे प्राप्त सम्पत्ति की
भांति [अनेक प्रकार की सम्पत्तियों का] प्रलोभन देकर मुझे बावला (अर्थात् विवेकहीन)
बना देती है। [मोह (अज्ञान) मे डालने की अत्यन्त प्रबल शक्ति वाली यह] महा मोहिनी
[माया] [जीव रूपी] आत्मा को मोहित कर अनेक कुमार्गों की ओर (उसी प्रकार)
प्रवृत्त करती है जिस प्रकार दूती दूसरे की वधू को भुलावा देकर पर पुरुष से मिलाती
है । सूरदास कहते हैं कि हे प्रभु, आप ही मेरे पति हैं, आप ही मेरे प्राप्य (आत्म-निवेदन
के पात्र हैं)। आपके समान मै और किसे प्राप्त कर सकता हूँ ? [जिसको निवेदन करूँ]
आपकी कृपा के बिना कौन मेरे इस दुख को (संकट को) दूर कर सकता है ? तात्पर्य
यह है कि आप की कृपा से ही मैं उपर्युक्त माया-जनित सकट से मुक्त होकर आपके
प्रति वास्तविक आत्म-समर्पण करके सच्चे भक्ति-भाव से आपका गुणगान करने का
अधिकारी बन सकता हूँ ॥११॥
हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ ।
कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ ।
जबै आवौं, साधु-संगति कछुक मन ठहराइ ।
ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ ।
वेष धरि धरि हर्यौ पर-धन, साधू-साधु कहाइ ।
जैसे नटवा लोभ-कारन करत स्वाँग बनाइ ।
करौं जतन, न भजौं, तुमकौं, कछुक मन उपजाइ ।
सूर प्रभु की सबल माया, देति मोहि भुलाइ ॥१२॥
अर्थ—हे भगवान्, तुम्हारा भजन किया ही नही जाता । क्या करूँ ?
तुम्हारी प्रबल माया मन को भ्रमित कर देती है । जब मैं सत्संग मे आता हूँ तो मन
कुछ स्थिर होता है । किन्तु उसका फिर वही [चंचलता वाला पहला] स्वभाव हो जाता
है, जैसे गजेन्द्र नदी मे स्नान करता है [किन्तु फिर] अपने अंगों पर सूंड से धूल डालने
का पुराना स्वभाव ग्रहण कर लेता है । साधु-सन्तो के वेश धारण कर-करके तथा सन्त
कहला-कहला कर मैं दूसरों का धन [उसी प्रकार] लूटता रहा जिस प्रकार नट [केवल]
धन-प्राप्ति के लिए (लोभ-कारन) सजकर [अनेक प्रकार के] स्वांग रचता है (अभिनय
करता है) । मै [तुम्हारे भजन के लिए] तत्पर तो होता हूँ, किन्तु तुम्हारा भजन कर
नही पाता, [वैसा करने की चेष्टा करते हुए] मन में [सांसारिक मोह के] कुछ और ही
भाव उत्पन्न हो जाते है । सूरदास कहते है कि प्रभु की माया [बड़ी] बलवती है, मुझे
भुलावे में डाल देती है ॥१२॥
गुरु महिमा
गुरु बिनु ऐसी कौन करै ?
माला-तिलक मनोहर बाना, लै सिर छत्र धरै ।