सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० सूरसागर सार सटीक
काहू के कुल तनन विचारत ।
अविगत की गति कहि न परति है, व्याध अजामिल तारत ।
कौन जाति अरु पाँति बिदुर की, ताही कैँ पग धारत ।
भोजन करत माँगि घर उनकैँ, राज मान-मद टारत ।
ऐसे जनम-करम के ओछे, ओछिन हूँ व्यौहारत ।
यहै सुभाव सूर के प्रभु कौ, भक्त-बछल प्रन पारत ॥६॥
अर्थ— भगवान् [भक्तो का उद्धार करने मे] किसी के कुल की ओर ध्यान नही
देते । [उन] अविज्ञेय की लीला कही नही जाती (अकथनीय है) वे व्याध और अजामिल
[जैसे अधम पापियो] को भी तारते हैं । विदुर की जाति तथा श्रेणी कौन बड़ी ऊँची
थी, किन्तु उनके यहाँ (भगवान्) पधारे । उनके घर उन्होंने मांग कर भोजन किया
[और] (दुर्योधन के) राजमद पूर्ण सम्मान को अस्वीकार किया । इस प्रकार जो जन्म
तथा कर्म से हीन, (ओछे) हैं, उन छोटों (ओछनि) के साथ ही वे सम्बन्ध रखते हैं ।
सूर के प्रभु का यही स्वभाव है । [इस प्रकार] वे अपनी भक्त-वत्सलता के दृढ़ निश्चय
(प्रण) का पालन करते है ॥६॥
सरन गए को को न उवारचौ ।
जब जब भीर परी संतति कौँ, चक्र सुदरसन तहाँ सँभारचौ ।
भयौ प्रसाद जु अबरीष कौँ, दुरवासा कौ क्रोध निवारचौ ।
ग्वालनि हेत धरचौ गोवर्धन, प्रकट इद्र कौ गर्व प्रहारचौ ।
कृपा करी प्रहलाद भक्त पर, खंभ फारि हिरनाकुस मारचौ ।
नरहरि रूप धरचौ करुनाकर, छिनक माहिँ उर नखनि बिदारचौ ।
ग्राह ग्रसत गज कौँ जल बूडत, नाम लेत वाकौ दुख टारचौ ।
सूर स्याम विनु और करै को, रग भूमि मैँ कस पछारचौ ॥७॥
अर्थ—भगवान् ने [अपनी] शरण में आये हुए किसका-किसका उद्धार नही
किया ? जब-जब सन्तो [भक्तो] पर विपत्ति पंडी भगवान् ने तत्क्षण सुदर्शन चक्र
संभाला । भगवान् अंबरीष पर प्रसन्न हुए तथा दुर्वासा के क्रोध का निवारण किया ।
ग्वालों के (हित के लिए गोवर्धन) [पर्वत] को धारण किया तथा प्रकट रूप मे
(निस्संकोच) इन्द्र के गर्व को नष्ट किया । भक्त प्रह्लाद पर कृपा करते हुए (भगवान् ने)
खम्बे को फाडकर हिरण्यकश्यप का सहार किया । कृपालु स्वामी ने नृसिंह रूप धारण
कर क्षणमात्र मे ही उसके हृदय को नखो से विदीर्ण कर डाला । ग्राह द्वारा ग्रस्त
गजराज के [भगवान् का] नाम लेते ही भगवान् ने उसके कष्टो का निवारण किया ।
[उन्होने] रगभूमि (समारोह के स्थान) मे कस को मार डाला । (पछारयो) । सूर के
श्याम के बिना ऐसे कार्य और कौन कर सकता है ? ॥७॥
स्याम गरीवनि हूँ के ग्राहक ।
दीनानाथ हमारे ठाकुर, साँचे प्रीति-निवाहक ।