सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति २६
[प्राणियों के] रूप धारण कर (बहुरूपिये के समान कितनी) कलाएं दिखाई है। हे
नन्दलाल, [इस कौशल-प्रदर्शन पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप] सूरदास की सारी
अविद्या को दूर कर दीजिए अर्थात् उसे माया-मुक्त कर दीजिये ॥२३॥
हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ।
समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ।
इक लोहा पूजा मैँ राखत, इक घर बधिक परौ।
सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ।
एक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ।
जब मिल गए तब एक बरन ह्वै, गङ्गा नाम परौ।
तन माया, ज्यौ ब्रह्म कहावत, सूर सु मिल बिगरौ।
कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥२४॥
अर्थ—हे प्रभु, हमारे दोषो पर आप ध्यान न दे। आपका नाम समदर्शी है,
इसलिए [अपनी इस विशेषता का ध्यान रखते हुए हमे भवसागर से] पार कर
दीजिए। (जिस प्रकार) एक लोहा पूजा [गृह] मे रखा जाता है [तथा] दूसरा बधिक
के घर मे पड़ा रहता है [जिससे वह पशु-वध करता है] किन्तु पारस उनमें भेद-भाव
नही रखता, उन्हे शुद्ध सोना (समान रूप से) बना देता है। [अच्छे जल से भरी] एक
नदी तथा मैले जल से भरा एक नाला दोनो मिल कर [गंगा जी मे] एकाकार
[एकरग के] हो जाते है तो उनका नाम [अभिन्न रूप से] गंगा पड़ जाता है। सूर-
दास कहते हैं कि शरीर माया तथा जीव ब्रह्म कहा जाता है, वह [उससे] मिल कर
[उसके बाहरी दोष से] बिगड़ गया है। हे प्रभु, उपर्युक्त न्याय के अनुसार या इनका
[शरीर और जीव का] न्याय कीजिए [और इन्हे शुद्ध कीजिए] या नही तो [आपका
समदर्शिता तथा पतित पावनता का] प्रण टला जाता ॥२४॥
भगवदाश्रय
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसेँ उड़ि जहाज को पछी, फिर जहाज पर आवै।
कमल-नैन कौं छांड़ि महातम, और देव कौँ ध्यावै।
परम गंग कौं छांड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै।
जिहिँ मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्योँ करील-फल भावै।
सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥२५॥
अर्थ—मेरा मन (भगवान् को छोडकर) अन्यत्र कहां सुख प्राप्त करे? जैसे
[बीच समुद्र मे फंसे हुए] जहाज पर से उडाया हुआ कौआ (अन्यत्र आश्रय न प्राप्त
कर सकने के कारण) उड़कर पुनः उसी जहाज पर वापस आ जाता है वैसे ही कमल-
नेत्र भगवान् श्रीकृष्ण का माहात्म्य छोड़कर अन्य देवताओं का ध्यान कौन करे?