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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२२ सूरसागर सार सटीक
अधिक कुरूप कौन कुविजा तैं, हरि पति पाइ तरै ।
अधिक सुरूप कौन सीता तैं, जनम वियोग भरै ।
यह गति-मति जानै नहि कोऊ, किहिं रस रसिक ढरै ।
सूरदास भगवंत-भजन बिनु, फिरि फिरि जठर जरै ॥११०॥
अर्थ-जिस पर दीनानाथ द्रवित होते हैं तथा कृपा करते हैं वही [वास्तव मे]
अच्छे कुलवाला तथा बडे सुन्दररूप वाला है। विभीषण कौन [बडा सुन्दर तथा कुलीन]
था, निर्धन राक्षस मात्र ही तो था, किन्तु भगवान् ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर छत्र
रखा (उसे सम्राट् बना दिया)। रावण से बडा राजा कौन था किन्तु वह गर्व ही गर्व
मे गल गया। सुदामा से अधिक निर्धन कौन हो सकता है जिसे उन्होने अपने समान
[ऐश्वर्य सम्पन्न] बना दिया। अजामिल से अधिक अधम कौन हो सकता है किन्तु [भगवान्
की कृपा से] यमदूत उसके पास जाने से डरने लगे। नारद से अधिक विरक्त कौन हो
सकता है किन्तु वे रात-दिन भ्रमण-शील रहते हैं। शंकर से बडा योगी कौन है किंतु
उन्हे भी काम ने छला (वे कामासक्त हो गये) कुब्जा से अधिक कुरुपा कौन (हो सकती)
है किन्तु वह भगवान् जैसे पति को प्राप्त करके तर गयी। सीता से अधिक रूपवती
कौन है किन्तु उन्हे वियोग मे जीवन बिताना पडा। भगवान् की वह प्रवृत्ति तथा
स्वभाव (गति-मति) कोई नही जानता कि किस रस में वे रसिक ढल जायेगे। (अर्थात्
: भक्त की किस विशेषता पर वे रीझ जाते है) सूरदास जी कहते है कि भगवान् के भजन
के बिना बार-बार जठराग्नि [पेट की ज्वाला] मे जलना पड़ता है। (गर्भ-वास की सांसत
मे पड़ना होता है, अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा नही मिलता) ॥११०॥
अविद्या माया
विनती सुनौ दीन की चित्त दै, कैसेँ तुव गुन गावै ?
माया नटी लकुटी कर लीन्हें, कोटिक नाच नचावै ।
दर-दर लोभ लागि लिए डोलति, नाना स्वाँग बनावै ।
तुम सौँ कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै ।
मन अभिलाष-तरंगनि करि करि, मिथ्या निसा जगावै ।
सोवत सपने मैं ज्यौ संपत्ति, त्यौँ दिखाइ बौरावै ।
महा मोहिनी मोहि आतमा, अपमारगहि लगावै ।
ज्यौँ दूती पर-वधू भोरि कै, ले पर-पुरुष दिखावै ।
मेरे तो तुम पति, तुमहीँ गति, तुम समान को पावै ?
सूरदास प्रभु तुम्हरी कृपा बिनु, को मो दुख बिसरावै ॥१११॥
अर्थ-हे प्रभु, आप [मुझ] दीन [भक्त] की विनय ध्यान से सुनें [कठिनाई
यह है कि] मैं आपका गुणगान कैसे करूँ ? [क्योकि] नटी माया [लोभ रूपी] लकुटी
हाथ मे लेकर मुझ [कपि] को करोडों प्रकार से नाच नचाती रहती है। मुझ लोभ-
ग्रस्त को द्वार-द्वार फिराती है और [मुझ से] नाना प्रकार के तमाशे (स्वांग)