सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ८७
हर उर सर सरोज पद जेई।
अहोभाग्य मैं देखिहउँ तेई॥४॥
जिन चरणोंको जानकीजीने हृदयमें धारण कर रखा है, जो
कपटमृगके साथ पृथ्वीपर [उसे पकड़नेको] दौड़े थे और जो
चरणकमल साक्षात् शिवजीके हृदयरूपी सरोवरमें विराजते हैं,
मेरा अहोभाग्य है कि उन्हींको आज मैं देखूँगा॥४॥
[दोहा ४२]
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ॥
जिन चरणोंकी पादुकाओंमें भरतजीने अपना मन लगा रखा
है, अहा! आज मैं उन्हीं चरणोंको अभी जाकर इन नेत्रोंसे
देखूँगा॥४२॥
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा।
आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा॥
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा।
जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा॥१॥
इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुद्रके
इस पार (जिधर श्रीरामचन्द्रजीकी सेना थी) आ गये। वानरोंने
विभीषणको आते देखा तो उन्होंने जाना कि शत्रुका कोई खास
दूत है॥१॥
ताहि राखि कपीस पहिं आए।
समाचार सब ताहि सुनाए॥
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।
आवा मिलन दसानन भाई॥२॥