सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ * श्रीरामचरितमानस *
साधु अवज्ञा तुरत भवानी।
कर कल्यान अखिल कै हानी॥ १ ॥
ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस
आयुहीन हो गये (उनकी मृत्यु निश्चित हो गयी)। [शिवजी
कहते हैं—] हे भवानी! साधुका अपमान तुरंत ही सम्पूर्ण
कल्याणकी हानि (नाश) कर देता है॥ १ ॥
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा।
भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं।
करत मनोरथ बहु मन माहीं॥ २ ॥
रावणने जिस क्षण विभीषणको त्यागा, उसी क्षण वह अभागा
वैभव (ऐश्वर्य)-से हीन हो गया। विभीषणजी हर्षित होकर मनमें
अनेकों मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथजीके पास चले॥ २ ॥
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता।
अरुन मृदुल सेवक सुखदाता॥
जे पद परसि तरी रिषिनारी।
दंडक कानन पावनकारी॥ ३ ॥
[वे सोचते जाते थे—] मैं जाकर भगवान्के कोमल और
लाल वर्णके सुन्दर चरणकमलोंके दर्शन करूँगा, जो सेवकोंको
सुख देनेवाले हैं, जिन चरणोंका स्पर्श पाकर ऋषिपत्नी अहल्या
तर गयीं और जो दण्डकवनको पवित्र करनेवाले हैं॥ ३ ॥
जे पद जनकसुताँ उर लाए।
कपट कुरंग संग धर धाए॥