सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * ८५
मेरे नगरमें रहकर प्रेम करता है तपस्वियोंपर। मूर्ख! उन्हींसे
जा मिल और उन्हींको नीति बता। ऐसा कहकर रावणने उन्हें
लात मारी। परन्तु छोटे भाई विभीषणने (मारनेपर भी) बार-बार
उसके चरण ही पकड़े॥ ३॥
उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥ ४॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! संतकी यही बड़ाई
(महिमा) है कि वे बुराई करनेपर भी [बुराई करनेवालेकी]
भलाई ही करते हैं। [विभीषणजीने कहा—] आप मेरे पिताके
समान हैं, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया; परन्तु हे नाथ!
आपका भला श्रीरामजीको भजनेमें ही है॥ ४॥
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ॥ ५॥
[इतना कहकर] विभीषण अपने मन्त्रियोंको साथ लेकर
आकाशमार्गमें गये और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे— ॥ ५॥
[दोहा ४१]
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥
श्रीरामजी सत्यसंकल्प एवं [सर्वसमर्थ] प्रभु हैं और [हे
रावण!] तुम्हारी सभा कालके वश है। अतः मैं अब श्रीरघुवीरकी
शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना॥ ४१॥
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं।
आयू हीन भए सब तबहीं॥