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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 84

८४ * श्रीरामचरितमानस *
हे तात! मैं चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ (विनती
करता हूँ) कि आप मेरा दुलार रखिये (मुझ बालकके आग्रहको
स्नेहपूर्वक स्वीकार कीजिये)। श्रीरामजीको सीताजी दे दीजिये,
जिसमें आपका अहित न हो॥ ४०॥
बुध पुरान श्रुति संमत बानी।
कही बिभीषन नीति बखानी॥
सुनत दसानन उठा रिसाई।
खल तोहि निकट मृत्यु अब आई॥ १॥
विभीषणने पण्डितों, पुराणों और वेदोंद्वारा सम्मत (अनुमोदित)
वाणीसे नीति बखानकर कही। पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित
होकर उठा और बोला कि रे दुष्ट! अब मृत्यु तेरे निकट आ
गयी है!॥ १॥
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा॥
कहसि न खल अस को जग माहीं।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥ २॥
अरे मूर्ख! तू जीता तो है सदा मेरा जिलाया हुआ (अर्थात्
मेरे ही अन्नसे पल रहा है), पर हे मूढ़! पक्ष तुझे शत्रु का ही
अच्छा लगता है। अरे दुष्ट! बता न, जगत्में ऐसा कौन है जिसे
मैंने अपनी भुजाओंके बलसे न जीता हो?॥ २॥
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा।
अनुज गहे पद बारहिं बारा॥ ३॥