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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 83
  • सुन्दरकाण्ड * ८३
    माल्यवंत गृह गयउ बहोरी।
    कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी॥२॥
    [रावणने कहा—] ये दोनों मूर्ख शत्रुकि महिमा बखान रहे
    हैं। यहाँ कोई है? इन्हें दूर करो न! तब माल्यवान् तो घर लौट
    गया और विभीषणजी हाथ जोड़कर फिर कहने लगे—॥२॥
    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं।
    नाथ पुरान निगम अस कहहीं॥
    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
    जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥३॥
    हे नाथ! पुराण और वेद ऐसा कहते हैं कि सुबुद्धि (अच्छी
    बुद्धि) और कुबुद्धि (खोटी बुद्धि) सबके हृदयमें रहती हैं, जहाँ
    सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकारकी सम्पदाएँ (सुखकी स्थिति) रहती हैं
    और जहाँ कुबुद्धि है, वहाँ परिणाममें विपत्ति (दुःख) रहती है॥३॥
    तव उर कुमति बसी बिपरीता।
    हित अनहित मानहु रिपु प्रीता॥
    कालराति निसिचर कुल केरी।
    तेहि सीता पर प्रीति घनेरी॥४॥
    आपके हृदयमें उलटी बुद्धि आ बसी है। इसीसे आप हितको
    अहित और शत्रुको मित्र मान रहे हैं। जो राक्षसकुलके लिये
    कालरात्रि [ -के समान] हैं, उन सीतापर आपकी बड़ी प्रीति
    है॥४॥
    [दोहा ४०]
    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
    सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार॥