सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ * श्रीरामचरितमानस *
[दोहा ३९ (क)]
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस॥
हे दशशीश! मैं बार-बार आपके चरणों लगता हूँ और
विनती करता हूँ कि मान, मोह और मदको त्यागकर आप
कोसलपति श्रीरामजीका भजन कीजिये॥ ३९ (क) ॥
[दोहा ३९ (ख)]
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात॥
मुनि पुलस्त्यजीने अपने शिष्यके हाथ यह बात कहला भेजी
है। हे तात! सुन्दर अवसर पाकर मैंने तुरंत ही वह बात प्रभु
(आप)-से कह दी॥ ३९ (ख) ॥
माल्यवंत अति सचिव सयाना।
तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तव नीति बिभूषन।
सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ॥ १ ॥
माल्यवान् नामका एक बहुत ही बुद्धिमान् मन्त्री था। उसने
उन (विभीषण)-के वचन सुनकर बहुत सुख माना [और
कहा—] हे तात! आपके छोटे भाई नीति-विभूषण (नीतिको
भूषणरूपमें धारण करनेवाले अर्थात् नीतिमान्) हैं। विभीषण जो
कुछ कह रहे हैं उसे हृदयमें धारण कर लीजिये॥ १ ॥
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ।
दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ॥