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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 111
  • सुन्दरकाण्ड * १११
    प्रभुके चरण-कमलोंका भ्रमर बन जा। अथवा रे दुष्ट! श्रीरामजीके
    बाणरूपी अग्निमें परिवारसहित पतंगा हो जा (दोनोंमेंसे जो
    अच्छा लगे सो कर)॥ ५६ (ख)॥
    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई।
    कहत दसानन सबहि सुनाई॥
    भूमि परा कर गहत अकासा।
    लघु तापस कर बाग बिलासा॥ १॥
    पत्रिका सुनते ही रावण मनमें भयभीत हो गया, परन्तु मुखसे
    (ऊपरसे) मुसकराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा—
    जैसे कोई पृथ्वीपर पड़ा हुआ हाथसे आकाशको पकड़नेकी चेष्टा
    करता हो, वैसे ही यह छोटा तपस्वी (लक्ष्मण) वाग्विलास
    करता है (डींग हाँकता है)॥ १॥
    कह सुक नाथ सत्य सब बानी।
    समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी॥
    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा।
    नाथ राम सन तजहु बिरोधा॥ २॥
    शुक (दूत)-ने कहा—हे नाथ! अभिमानी स्वभावको छोड़कर
    [इस पत्रमें लिखी] सब बातोंको सत्य समझिये। क्रोध छोड़कर
    मेरा वचन सुनिये। हे नाथ! श्रीरामजीसे वैर त्याग दीजिये॥ २॥
    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ।
    जद्यपि अखिल लोक कर राऊ॥
    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही।
    उर अपराध न एकउ धरिही॥ ३॥