सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० * श्रीरामचरितमानस *
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी।
समय बिचारि पत्रिका काढ़ी॥४॥
जिसके विभीषण-जैसा डरपोक मन्त्री हो, उसे जगत्में विजय
और विभूति (ऐश्वर्य) कहाँ ? दुष्ट रावणके वचन सुनकर दूतको
क्रोध बढ़ आया। उसने मौका समझकर पत्रिका निकाली ॥ ४ ॥
रामानुज दीन्ही यह पाती।
नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती॥
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन।
सचिव बोलि सठ लाग बचावन॥५॥
[और कहा—] श्रीरामजीके छोटे भाई लक्ष्मणने यह पत्रिका
दी है। हे नाथ! इसे बचवाकर छाती ठंडी कीजिये। रावणने
हँसकर उसे बायें हाथसे लिया और मन्त्रीको बुलवाकर वह मूर्ख
उसे बँचाने लगा॥ ५॥
[दोहा ५६ (क)]
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस॥
[पत्रिकामें लिखा था—] अरे मूर्ख! केवल बातोंसे ही
मनको रिझाकर अपने कुलको नष्ट-भ्रष्ट न कर! श्रीरामजीसे
विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेशकी शरण जानेपर भी
नहीं बचेगा॥ ५६ (क)॥
[दोहा ५६ (ख)]
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग॥
या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषणकी भाँति