सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ * श्रीरामचरितमानस *
यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोकोंके स्वामी हैं, पर उनका
स्वभाव अत्यन्त ही कोमल है। मिलते ही प्रभु आपपर कृपा
करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदयमें नहीं रखेंगे॥ ३॥
जनकसुता रघुनाथहि दीजे।
इतना कहा मोर प्रभु कीजे॥
जब तेहिं कहा देन बैदेही।
चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही॥ ४॥
जानकीजी श्रीरघुनाथजीको दे दीजिये। हे प्रभु! इतना कहना
मेरा कीजिये। जब उस (दूत)-ने जानकीजीको देनेके लिये
कहा, तब दुष्ट रावणने उसको लात मारी॥ ४॥
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ।
कृपासिंधु रघुनायक जहाँ॥
करि प्रनामु निज कथा सुनाई।
राम कृपाँ आपनि गति पाई॥ ५॥
वह भी [विभीषणकी भाँति] चरणोंमें सिर नवाकर वहीं
चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे। प्रणाम करके उसने
अपनी कथा सुनायी और श्रीरामजीकी कृपासे अपनी गति
(मुनिका स्वरूप) पायी॥ ५॥
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी।
राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी॥
बंदि राम पद बारहिं बारा।
मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा॥ ६॥