सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 109
- सुन्दरकाण्ड * १०९
सक सर एक सोषि सत सागर।
तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर॥ १॥
श्रीरामचन्द्रजीके तेज (सामर्थ्य), बल और बुद्धिकी अधिकताको
लाखों शेष भी नहीं गा सकते। वे एक ही बाणसे सैकड़ों
समुद्रोंको सोख सकते हैं, परन्तु नीतिनिपुण श्रीरामजीने [नीतिकी
रक्षाके लिये] आपके भाईसे उपाय पूछा॥ १॥
तासु बचन सुनि सागर पाहीं।
मागत पंथ कृपा मन माहीं॥
सुनत बचन बिहसा दससीसा।
जौं असि मति सहाय कृत कीसा॥ २॥
उनके (आपके भाईके) वचन सुनकर वे (श्रीरामजी) समुद्रसे
राह माँग रहे हैं, उनके मनमें कृपा भरी है [इसलिये वे उसे सोखते
नहीं]। दूतके ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा [और बोला—]
जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरोंको सहायक बनाया है॥ २॥
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई।
सागर सन ठानी मचलाई॥
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई।
रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई॥ ३॥
स्वाभाविक ही डरपोक विभीषणके वचनको प्रमाण करके
उन्होंने समुद्रसे मचलना (बालहठ) ठाना है। अरे मूर्ख! झूठी
बड़ाई क्या करता है! बस, मैंने शत्रु (राम)-के बल और
बुद्धिकी थाह पा ली॥ ३॥
सचिव सभीत बिभीषन जाकें।
बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें॥