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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 92

॥ मन कौ अगँ ॥ [ ८३
सुन्दर तोहि सदा समुझावत,
एक हु सीख लगै नहि राडै ।
बादि वृथा भटकै निस वासर,
रे मन ! तूं भ्रमबौ किन छाडै ॥१४॥
व्है सब कौ सिरमौर ततक्षिन,
जौ अभि अन्तरि ज्ञान विचारै ।
जौ कछु और विषै सुख वंछत,
तौ यह देह अमोलिक हारै ॥
छाडि कुबुद्धि भजै भगवत हि,
आपु तिरै पुनि और हि तारै ।
सुन्दर तोहि कह्यौ कितनी वर,
तू मन क्यौ नहि आपु सभारै ॥१५॥
जौ मन नारि की ओर निहारत,
तौ मन होत है ताहि कौ रूपा ।
जौ मन काहु सौं क्रोध करै जब,
क्रोधमई हो जाइ तद्रूपा ॥
जौ मन माया ही माया रटै नित,
तौं मन डूबत माया के कूपा ।
सुन्दर जौ मन ब्रह्म विचारत,
तौ मन होत है ब्रह्मस्वरूपा ॥१६॥