सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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८२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कै बर तू मन रक भयौ शठ,
मागत भीख दसौँ दिस डूल्यौ ।
कै वर तै मन छत्र धर्यौ सिर,
कामिनि सग हिडोरनि भूल्यौ ॥
कै वर तू मन छीन भयौ अति,
कै बर तू सुख पाइक फूल्यौ ।
सुन्दर कै बर तोहि कह्यौ मन,
कौन गली किहि मारग भूल्यौ ॥१२॥
इन्द्रिनि के मुख चाहत है मन,
लालच लागि भ्रमै शठ यौ ही ।
देखि मरीचि भर्यौ जल पूरन,
धावत है मृग मूरिख ज्यौ ही ॥
प्रेत पिशाच निशाचर डोलत,
भूख मरै नहि धापत क्यौ ही ।
वायु बघूर हि कौन गहै कर,
सुन्दर दौरत है मन त्यौ ही ॥१३॥
कौन सुभाव पर्यो उठि दौरत,
अमृत छाडि च्चोरत हाडै ।
ज्यौ भ्रम की हथिनि दृग देखत,
आतुर होइ परै गज खाडै ॥
(१४) चचोरत हाडै-हड्डी चूसता है। भ्रम की-नकली,
बनावटी । राडै-रडवे की तरह । भ्रमवो-भटकता है ।