सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ मन को अंग ॥ [ ८१
दौरत है दस हू दिसि कौ शठ,
वायु लगो तब तै भयौ बैंडा ।
लाज न काज कछू नहिं राखत,
सील सुभाव की फोरत मेडा ॥
सुन्दर सीख कहा कहि देइ,
भिदै नहिं बान छिदै नहि गैडा ।
लालच लागि गयौ मन बीखरि,
बारह वाट अठारह पेंडा ॥१०॥
श्वान कहू कि शृगाल कहू कि,
विडाल कहू मन की मति तैसी ।
ढेढ कहू किधौ डूम कहूं किधौ,
भाड कहू कि भडाइ दे जैसी ।
चौर कहू, वट मार कहू,
ठग जाइ कहूं, उपमा कहू कैसी ।
सुन्दर और कहा कहिये अव,
या मन की गति दीसत ऐसी ॥११॥
(१०-११) वैडा-वाका टेढा। मैडा-कार, सीमा,
मर्यादा । गैडा-मेंडे की तरह । श्वान-कुत्ता । शृगाल-गीदड ।
विडाल-बिलाव ।