सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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८० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
रक कौ नचावै अभिलाषा धन पाइवै की
निस दिन सौचि करि ऐसैं ही पचतु है ।
राजा ही नचावै सब भूमि हू कौ राज लेव,
और ऊ नचावै जोई देह सौ रचतु है ॥
देवता असुर सिद्ध पन्ग सकल लोक,
कीट पसु पखी कहु कैसैं कै वचतु है ।
सुन्दर कहत काहु सत की कह्यो न जाइ,
मन कै नचाये सब जगत नचतु है ॥८॥
इन्दव छंद
केतक द्यौस भये समुझावत,
नैकु न मानत है मन भोदू ।
भूलि रह्यौ विषिया सुख मैं,
कछु और न जानत है शठ दौदू ॥
आंखि न कान न नाक बिना सिर,
हाथ न पाव नही मुख पौदू ।
सुन्दर ताहि गहै कोऊ क्यौ करि,
नीकसि जाइ बडौ मन लोदू ॥६॥
प्राविशत्" बद-दाव रेंच । रिंद-जिद शैतान ।
(८) अभिलाषा-इच्छा, लोभ लालच । पनग-पन्नग,
सर्प ।
(९) भोदू-मूर्ख । दोदू-काम । पोदू पीठ । लोदू-वेढगा ।