सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 88, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 88॥ मन को अंग ॥ [ ७६
॥ मन को अंग ॥ [ ७६
भोग हू कौ दोरै तौ तृपत नही क्यौ ही होइ,
सुन्दर कहत याहि नैक हु न लाज है ।
काहू को कह्यौ न करै आपुनि ही टेक परै,
मन सौ न कोऊ हम जान्यौ दगाबाज है ॥५॥
देखै न कुठौर ठौर कहत और की और,
लीन जाइ होत हाड मास हू रकत मैं ।
करत बुराई सर औसर न जानै कछु,
धका आइ देत राम नाम सौ लगत मैं ॥
बाहे सुर असुर बहाये सब भेष जिन,
सुन्दर कहत दिन घालत भगति मै ।
और ऊ अनेक अन्तराय ही करत रहै,
मन सौ न कोऊ है अधम या जगत मै ॥६॥
जिन ठगे शकर बिधाता इन्द्र देव मुनि,
आपनौ ऊ अधिपति ठग्यौ जिनि चन्द है ।
और योगी जगम सन्यासी सेख कौन गिनै,
सबही कौ ठगत, ठगावै न सुछद है ॥
तापस ऋषीश्वर सकल पचि पचि गये,
काहू कै न आवै हाथ ऐसी या पै बद है ।
सुन्दर कहत बस कौन विधि कीजै ताहि,
मन सौ न कोऊ या जगत माहि रिन्द है ॥७॥
(६) अंतराय-विघ्न बाधा । लीन-मगन ।
(७) अधिपति-स्वामी, यथा "चन्द्रमा मनो भूत्वा