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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
घेरिये तौ घेर्यौ हू न आवत है मेरौ पूत, '
जोई परमौधिये मु कान न धरतु है ।
नीति न अनीति देखै शुभ न अशुभ पेखै,
पल ही मैं होती अनहोती हु करतु है ॥
गुरुकी न साधू की न लोक वेद हू की शक,
काहू की न मानै न तौ काहू तै डरतु है ।
सुन्दर कहत ताहि धीजिये सु कौन भांति,
मन कौ सुभाव कछु कह्यौ न परतु है ॥३॥
काम जब जागै तब गनत न कोऊ साख,
जानै सब जेई करि देखत न माधी है ।
क्रोध जब जागै तब नेकु न सभारि सकै,
ऐसी बिधि मूल की अविद्या जिन साधी है ॥
लोभ जब जागै तब त्रिपत न क्यौही होइ,
सुन्दर कहत इति ऐसे ही मै खाधी है ।
मोह मतवारौ निश-दिन हि फिरत रहै,
मन सौ न कोऊ हम देख्यौ अपराधी है ॥४॥
देखिवे कौ दौरै तौ अटकि जाइ वाही ओर,
सुनिवे कौ दौरै तौ रसिक सिरताज है ।
सूँघवे कौ दौरै तौ अघाइ न सुगध करि,
खाइवे कौ दौरै तौ न धाप महाराज है ॥
(४) साख-रिश्ता, सबन्ध । माधी-पाप बुद्धि ।