सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
पृष्ठ 55, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 55
४६ ] ।। सुन्दर विलास ।।
मुख के झरोखे मै वचन न उचार होत,
जीभ हू कौ खटरस स्वाद न विसेखिये ।
सुन्दर कहत कोउ कौन बिधि जानै ताहि,
कारौ पीरौ काहू द्वार जानौ हू न पेखिये ॥७॥
माई तौ पुकारि छाती कूटि कूटि रोवत है,
बाप हू कहत मेरौ नन्दन कहा गयौ ।
भाइया कहत मेरी बाह आज दूरि भई,
बहन कहत मेरै बीर दुख है दयौ ॥
कामिनी कहत मेरौ सीस सिरताज कहा,
उनि ततकाल हाथ मै सिधौरा है लयौ ।
सुन्दर कहत ताहि कोऊ नहि जानि सकै,
बोलत हुतौ सु यह छिन मैं कहा भयौ ॥८॥
रज अरु बीरज कौ प्रथम सयोग भयौ,
चेतना सकति तब कौन भाति आई है ।
कोऊ तौ कहत बीज मध्य ही कियौ प्रवेस,
किनहु क पंच मास पीछै कै सुनाई है ॥
(८) सिधोरा-सिंदूर नारियल आदि सती होने का
सामान । बोलत हुतो-बोलने वाला ।