सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ देहात्म विछोह को अंग ॥ [ ४५
अजब अनूप रूप चमक दमक ऊप,
सुन्दर शोभित अति अधिक सुहावनौ ।
जाही छिन चेतना सकति जब लीन होइ,
ताही छिन लागत सबनिकौ अभावनी ॥५॥
मृत्तिका कौ पिंड देह ताही मै युगति भई,
नासिका नयन मुख श्रवन बनाये है ।
शीस हाथ पाव अरु अगुंली बिराजमान,
अगुंली कै आगै पुनि नखऊ लगाए है ॥
पेट पीठि छाती कठ चिबुक अधर गाल,
दशन रसन बहु वचन सुहाए है ।
सुन्दर कहत जब चेतना सकति गई,
वही देह जारि बारि छार करि आये है ॥६॥
देह तो प्रगट यह ज्यौ की त्यौ ही जानियत,
नैन के झरौखे माहि झाकत न देखिये ।
नाक के झरौखे माहि नैकु न सुबास लेत,
कान के झरौखे माहि सुनत न लेखिये ॥
(५) पावक-अग्नि । ऊप-सफाई । सकति-शक्ति ।
अभावनी-अरुचिकर, भद्दा ।
(६) चिबुक-ठोडी । अधर-होठ । दशन-दात ।