सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ देहात्म विछोह को अग ॥ [ ४३
अथ देहात्म विछोह को अग ॥४॥
इन्दव छन्द
वै श्रवना रसना मुख बैठे हि,
वैसे हि नासिका वैसे हि अखी ।
वै कर वै पग वै सब द्वार सु,
वै नख सीस हि रोम असखी ॥
वैसेहि देह परी पुनि दीसत,
एक बिना सब लागत खखी ।
सुन्दर कोऊ न जानि सकै यह,
बोलत हो सो कहा गयौ पखी ॥१॥
बोलत चलात पीवत खात सु,
सीचत है द्रुम कौ जैसे माली ।
लेतहु देतहु देखत रीझत,
तोरत तान बजावत ताली ॥
जा महि कर्म विकर्म किये सब,
है यह देह परी अब ठाली ।
सुन्दर सो कतहू नहिं दीसत,
खेल गयौ इक खेल सो ख्याली ॥२॥
(१) खखी-सूना ।
(२) ठाली-सूनी, बेकार । ख्याली-खिलाडी आत्मा ।