सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
झूठ सौ बध्यौ है लाल ताहि तें ग्रसत काल,
काल बिकराल ब्याल सबही कौ खात है ।
नदी कौ प्रवाह जैसे जात है समुद्र माहि,
तैसे जग काल हि कै मुख मैं समात है ॥
देह सौ ममत्व तातैं काल कौ भै मानत है,
ज्ञान उपजैं तें वह कालहू विलात है ।
सुन्दर कहत परब्रह्म है सदा अखंड,
आदि मधि अन्त एक सोई ठहरात है ॥२६॥
इन्दव छंद
काल उपावत काल खपावत,
काल मिलावत है गहि माटी ।
काल हलावत काल चलावत,
काल सिखावत है सब आटी ॥
काल बुलावत काल भुलावत,
काल डुलावत है वन घाटी ।
सुन्दर काल मिटै तबही पुनि,
ब्रह्म विचार पढै जब पाटी ॥२७॥
इति काल चेतावनी कौ अंग
सम्पूर्ण
(२६) लाल-प्यारे ।
(२७) आटी-दाव पेंच । पाटी-पाठ ।