सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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१३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ साधु को अंग ॥२०॥
इन्दव छंद
प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्म हि,
और सबै कछु लागत फीको ।
शुद्ध हृदै मति होइ सु निर्मल,
द्वैत प्रभाव मिटै सब जी कौ ॥
गोष्ठि रु ज्ञान अनत चलै जह,
सुन्दर जैसे प्रवाह नदी कौ ।
ताहि तं जानि करौ निसवासर,
साधु कौ सग सदा अति नीकौ ॥१॥
जौ कोऊ जाइ मिलै उनसौ नर,
होत पवित्र लगै हरि रंगा ।
दोष कलंक सबै मिटि जात सु,
नीचहू आइकैं होत उतगा ॥
ज्यौं जल और मलीन महा अति,
गंग मिले होइ जात है गंगा ।
सुन्दर शुद्ध करै ततकाल सु,
है जग मांहि बडी सतसंगा ॥२॥
(१) द्वैत-भेदभाव ।
(२) उतगा-उत्तम, ऊचा ।