सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ सूरातन को अंग ॥ [ १२६
महामत्त हाथी मन राख्यो है पकरि जिन,
अति ही प्रचंड जामैं बहुत गुमान है ।
काम क्रोध लोभ मोह बाधे चारौ पांव पुनि,
छूटनै न पावै नैक प्रान पीलवान है ॥
कबहू जो करै जोर सावधान साझ भोर,
सदा एक हाथ मैं अकुश गुरु ज्ञान है ।
सुन्दर कहत और काहू कै न बसि होइ,
ऐसे कौन शूरबीर साधू के समान हैं ॥१३॥
॥ इति सूरातन को अंग सम्पूर्ण ॥