सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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सुन्दर कहत ऐसो साधु कोऊ शूरबीर,
ताकि ताकि सबहि पिगुन दल मार्यौ है ॥१०॥
मारे काम क्रोध जिन, लोभ मोह पीसि डारे,
इन्द्रिय कतल करि कीयौ रजपूतौ है ।
मार्यौ मदमत्त मन, मार्यौ अहंकार मीर,
मारे मद मछर ऊ ऐसौ रन रूतौ है ॥
मारि आशा तृष्णा जिन पापनी सापनी दोऊ,
सबकौ प्रहारि निज पद ई पहूतौ है ।
सुन्दर कहत ऐसैं साधु कोऊ शूरवीर,
वैरी सब मारि कैं निश्चित होई सूतौ है ॥११॥
कियौ जिन मन हाथ इन्द्रिनि कौ सब साथ,
घेरि घेरि आपने ई नाथ सौं लगाये हैं ।
और हू अनेक वैरी मारे सब युद्ध करि,
काम क्रोध लोभ मोह खोदिकै बहाये हैं ॥
किये हैं संग्राम जिन दिये हैं भगाइ दल,
ऐसैं महा सुभट सुग्रन्थनि मैं गाये हैं ।
सुन्दर कहत और शूर याँ ही खपि गये,
साधू शूरवीर वै ई जगत मैं आये हैं ॥१२॥