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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 284 में से

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पृष्ठ 136

॥ सूरतान् को अंग ॥ [ १२७
शूरबीर रिपु कौ नमूनौ देखि चौट करै,
मारै तब ताकि करि तरवारि तीर सौ ।
साधु आठौ जाम बैठौ मन ही सौ युद्ध करै,
जाकैं मुह माथौ नहिं देखिये शरीर सौ ॥
सूरबीर भूमि पर दौर करै दूरि लगै,
साधु सुनि कौ पकरि राखै धरि धीर सौ ।
सुन्दर कहत तहा काहू के न पाव टिकै,
साधु कौ संग्राम है अधिक शूरबीर सौ ॥८॥
खेचि करडी कमान ज्ञान की लगायो बान,
मार्यौ महाबली मन जग जिन रान्यौ है ।
ताकै अगवानी पच जोधा ऊ कतल कीये,
और रह्यौ पह्यौ सब अरि दल भान्यौ है ॥
ऐसौ कोऊ सुभट जगत मै न देखियत,
जाकै आगै कालहू सौ कपिकै परान्यौ है ।
सुन्दर कहत ताकी शोभा तिहूं लोक माहि,
साधु सौ न शूरबीर कोऊ हम जान्यौ है ॥६॥
काम सौ प्रबल महा जीते जिन तीनौ लोक,
सो तौ एक साधु कै बिचार आगै हार्यौ है ।
क्रोध सौ कराल जाके, देखत न धीर धरै,
सोउ साधु क्षमा कै हथ्यार सौ बिदार्यौ है ॥
लोभ सौ सुभट साधु तोष सौ गिराइ दियौ,
मोह सौ नृपति साधु ज्ञान सौ प्रहार्यौ है ।