सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ओट नहि राखै कछु लोट पोट होइ जाइ,
चोट नहिं चूकै, शीश रिपु कौ उतारि है ।
सुन्दर कहत ताहि नैकहू न सोच पोच,
ऐसौ शूरवीर धीर मीर जाइ मारि है ॥५॥
अधिक अजानबाहु मन मैं उछाह कीये,
दीये गजगाह मुख बरखत नूर है ।
काढै जब करवाल वाल सब ठाढे होहिं,
अति बिकराल पुनि देखत करूर है ॥
नैक न उसास लेत फौज कौं फिटाइ देत,
खेत नहिं छाडै मारि करै चकचूर है ।
सुन्दर कहत ताकी कीरति प्रसिद्ध होइ,
सोई शूरबीर धीर श्याम के हजूर है ॥६॥
ज्ञान कौ कवच अग काहू सौं न होइ भग,
टोप शीस झलकत - परम बिबेक है ।
तिन्है ताजी असवार लीये समसेर सार,
आगे ही कौ पाव धरै भागणै की टेक है ॥
छूटत बदूक बाण बीचै जहा घमसान, -
देखिकै पिशुन दल मारत अनेक है ।
सुन्दर सकल लोक माहि ताकौ जै जै कार,
ऐसौ शूरबीर कोऊ कोटिन मैं एक है ॥७॥
(६) अजानबाहु-अजानवाहु-दीर्घबाहु, शूरवीर । कर-
वाल-तलवार ।