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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 134

॥ सूरतान को अंग ॥ [ १२५
पांव रोपि रहे रन माहि रजपूत कोऊ,
हय गय गाजत जुरत जहां दल है ।
बाजत भुझाऊ सहनाई सिंधू राग पुनि,
सुनत ही काइर की छूटि जात कल है ॥
झलकत बरछी तरछी तरवारि बहै,
मार मार करत परत खल भल है ।
ऐसे जुद्ध मैं अडिंग सुन्दर सुभट सोई,
घर माहि सूरमा कहावत सकल है ॥३॥
अशन बसन बहू भूषण सकल अंग,
सम्पति बिबिध भांति भर्यौ सब घर है ।
श्रवन नगारौ सुनि छिनक मैं छोड़ि जात,
ऐसे नहि जाने कछू आगे मोहि मर है ॥
मन मैं उछाह रन माहि टूक टूक होइ,
निरभै निशंक वाकै रचहू न डर है ।
सुन्दर कहत कोऊ देह कौ ममत्त नाहि,
सूरमा कै देखियत शीश बिन धर है ॥४॥
जूझिबे कौ चाब जाकै ताकि ताकि करै घाव,
आगे धरि पाव फिरि पीछे न सभारि है ।
हाथ लीये हथियार तीक्ष्ण लगायो धार,
बार नहि लागै सब पिशुन प्रहारि है ॥
(४) अशन-भोजन ।