सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १११
व्यापक ब्रह्म अखड अनावृत,
बाहिरि भीतरि अन्तरयामी ॥
ओर न छोर अनत कहै गुन,
याँहि तैं सुन्दर है धन नामी ।
ऐसो प्रभू जिनकै सिर ऊपरि,
क्यौ परि है तिनकौ कहि खांमी ॥८॥
॥ इति निर्गुण उपासना को अंग सम्पूर्ण ॥
(३) गुज्झे-गुप्त बात । अबुज्झे-अबोध । विदुज्जन-
विद्वान् । अरुज्झे-उलझी बात । सुज्झे-सूझे, दीखे ।
(७) पाक-पवित्र । लाल-प्रिय ।
(८) अनावृत अपरिच्छिन्न, असीम । विरचि-ब्रह्माजी ।