सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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११० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सो परब्रह्म सदा सिर उपरि,
सुन्दर सो प्रभु सो मन माना ॥५॥
जो उपज्यो कछु प्राह जरा लग,
सो सब नाश निरंतर होई ।
रूप धर्यो जु रहै नहिं निश्चय,
तीनों लोक सबै कहा होई ॥
राजस तामस सात्त्विक जागत,
देखत काल सबै पुनि खोई ।
आपु हि एक रहै जु निरंजन,
सुन्दर के मन मानत सोई ॥६॥
देवनि के सिर देव विराजत,
ईश्वर के सिर ईश्वर कहिये ।
लालनि के सिर लाल निरंतर,
खूबन के सिर खूब सु लहिये ॥
पावनि के सिर पाक शिरोमणि,
देखि विचारि उहै दृढ गहिये ।
सुन्दर एक सदा सिर ऊपरि,
और कछू हमकौं नहिं चहिये ॥७॥
शेष महेश गणेश जहां लग,
विष्णु विरंचिहु के सिर स्वामी ।