सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 121

१८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ पतिव्रता को अंग ॥१६॥
द्विपद छंद
आन की ओर निहारत ही जगै,
जान पतिव्रत एक अनी को ।
ऐन अनादर ऐसी हि भांति जु,
सीस फिरै पुनि शूर मनी को ॥
बैठिहि मैं हरवो कहै जान,
घिनै अथ बिद ज्यों जोग जती की ।
गभ हृदै नै गयै जन सुन्दर,
एक रती बिन एक अनी ही ॥१॥
जो हरि को तजि आन उपासत,
सो मतिमंद फजीहति होई ।
ज्यो अपने भरतार हि छाडि,
भई विभचारिनि कामिनि कोई ॥
सुन्दर ताहि न आदर मान,
फिरै विमुखी अपनी पत खोई ।
बूडि मरै किनि कूप मझारि,
कहा जग जीवत है शठ सोई ॥२॥
(१) हरवा-पतित । घिर्म-गिन्न से ।
(२) भत्तार-भर्ता पनि । पत-इज्जत ।