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सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 284 में से

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पृष्ठ 118

॥ निर्गुण उपासना को अंग ॥ [ १०६
मजन सो जु मनोमल मजन,
सज्जन सो जु कहै गति गुझैं ।
गजन सो जु इन्द्रिय गहि गजत,
रंजन सो जु बुझावै अबुझैं ॥
भजन सो जु भर्यौ रस माहि,
बिदुज्जन सो कतहू न अरुझैं ।
व्यजन सो जु बढै रुचि सुन्दर,
अजन सो जु निरंजन सुझैं ॥३॥
जा प्रभु तैं उतपत्ति भई यह,
सो प्रभु है उर इष्ट हमारै ।
जो प्रभु है सबकें सिर ऊपरि,
ता प्रभु कौ हम हू सिर धारै ॥
रूप न रेख अलेख अखंडित,
भिन्न रहै सब कारिज सारै ।
नाम निरंजन है तिनकौ पुनि,
सुन्दर ता प्रभु कै बलिहारै ॥४॥
जो उपजै बिनसै गुन धारत,
सो यह जानहु अजन माया ।
आवै न जाइ मरै नहिं जीवत,
अच्युत एक निरंजन राया ॥
ज्यो तरु तत्त रहै रस एक हि,
आवत जात फिरै यह छाया ।