सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१०८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ निर्गुण उपासना को अंग
॥१५॥
इन्द्रवज्रा
ब्रह्मा कुलाल रचै बहु भाजन,
कर्मनि के दधि मोहि न भावै ।
विष्नु हू मकट आठ गहै सब,
ताहू कौ रक्षक काहु मनावै ॥
संकर भूत पिषाचनि के पति,
पानि कपाल लिये बिललावै ।
ताहि तें सुन्दर निरगुन त्यागि सु,
निर्मल एक निरंजन ध्यावै ॥१॥
कोटिक बात बनाइ कहै कहा,
होत भया सब ही मन रंजन ।
शास्तर स्मृति वेद पुरान,
बखानत है अतिशै लुक अंजन ॥
पानी मैं बूडत पानी गहै कत,
पार पहूचत है मति भजन ।
सुन्दर तौ लग आंधेकी जेवरी,
जौलौं न ध्याइ है एक निरंजन ॥२॥
(१) कुलाल-कुम्हार की तरह । भाजन-बर्तन । पानि-
पाणि, हाथ मे । (२) मति भजन मदमति मूर्ख ।