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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

७८ / सुदामा-चरित
श्रीकृष्ण जब अपने मित्र सुदामा की स्नेह-भेंट चावलों को खाने लगते हैं तो लक्ष्मी,
ऋद्धि, सिद्धि, इन्द्र, कुबेर आदि सभी चिंतित हो उठते हैं। उनकी चिंता
का कवि ने अति स्वाभाविक निरूपण किया है। अतिशयोक्ति अलंकार के प्रयोग
से भावोत्कर्ष में अच्छी सहायता मिली है।
(५२) शब्दार्थ— हूल = घबड़ाहट; पीड़ा। हियरा में = हृदय में। कानन =
कानों में। टेर = पुकार, आवाज। भेंटत सुदामैं···आघात ही— (१) सुदामा
ने भेंटस्वरूप जो चावल दिया उसे चाव से खाते हुए कृष्ण नहीं अघाते हैं।
(२) कृष्ण सुदामा से मिलते हैं और चावल चबा कर अघाते नहीं हैं। सोर
भयौ = हल्ला मच गया। ठाढ़ी = खड़ी-खड़ी। थरहरैं = काँपती हैं। तहीं = उसी
जगह। नाक लोक— स्वर्ग लोक। नाग लोक— पाताल लोक। ओक-ओक— घर
घर। थोक-थोक = समूह के समूह, टोली की टोली। गातहीं = शरीर। हालो
परो = हल्ला मच गया। थोकन में = झुंड और समूह में। लालो परो लोकन
मैं = लोकों में त्रास छा गया; अकाल पड़ गया। चालो परो चक्रन में— (१)
जन्म के दरिद्र सुदामा का आज भाग्य पलट रहा है; वह रंक से राजा होने जा
रहा है। इससे कालचक्र भी चलायमान हो गया। (२) चारों ओर उथल-पुथल
मच गई।
व्याख्या—कानों-कानों में यह बात फैल गई कि श्रीकृष्ण ने सुदामा जैसे
दीन का बहुत आदर-सत्कार किया और वे अब उससे भेंटस्वरूप मिले। साधारण
चावल ऐसी रुचि से चबा रहे हैं कि अघाते ही नहीं। सबके हृदय में एक घबरा-
हट-सी हुई। नरोत्तमदास कहते हैं कि समृद्धि और सफलता की अधिष्ठात्री
ऋद्धि-सिद्धियों में कोलहल सा मच गया। (अपने पति भगवान् की यह
अप्रत्याशित विरक्ति देखकर) लक्ष्मीजी वहीं खड़ी-खड़ी काँपने लगीं। स्वर्ग में
पाताल में, घर-घर में, झुण्ड-झुण्ड में इस अनहोनी घटना की खबर फैल गई।
इस संवाद से सबके मुख सूख गए और सब काँपने लगे। श्रीकृष्ण के चावल
चबाते ही देव-समूह में हल्ला मच गया कि अब क्या होगा? लोक-लोक में अकाल
पड़ गया (क्योंकि अधिकांश समृद्धि भगवान् ने सुदामा को दे दी)। श्रीकृष्ण की
यह लीला देखकर कालचक्र भी विचलित हो उठा। (जिस सुदामा के भाग्य में

सुदामा-चरित / ७६
इतनी दरिद्रता लिखी थी, वह दो मुट्ठी चावल खिलाकर आज अपार सम्पत्ति
का मालिक होने जा रहा है, अतः अपनी परवशता पर काल का विचलित हो
उठना स्वाभाविक ही है।)
विशेष—इस कवित्त में भावानुकूल भाषा का प्रयोग, कहावतों तथा अनु-
प्रासों का सौष्ठव भाव को प्रभावोत्पादक बनाने में अत्यन्त उपयोगी रहा है।
इसमें भाव एवं कला का एक साथ सौन्दर्य द्रष्टव्य है।
(५३) शब्दार्थ—भौन—भवन। पकवान—पूरी कचौड़ी आदि। निधि—
खजाना। सुषमा—सुन्दरता। अभिलाषत—चाहते हैं। दाख—मुनक्का, अंगूर
न चाखत—चखते तक नहीं। सिंधु छमा के—क्षमा के सागर, श्रीकृष्ण। सेर-
पावक—लगभग पाव भर। समा—साँवाँ; एक प्रकार का चावल। कंत रमा
के = लक्ष्मी-पति; विष्णु; कृष्ण।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण को सुदामा के साधारण चावलों को चबाते देखकर
लोग आपस में कहने लगे) सौन्दर्य के भण्डार, श्रीकृष्ण के महल तरह-तरह की
मिठाइयों और पकवानों से भरे पड़े हैं। साँझ-सवेरे उनके माता-पिता बड़े दुलार
से उनसे मिठाई-पकवान खाने का आग्रह करते हैं। पर क्षमा के सागर श्रीकृष्ण
अंगूर भी नहीं चखते। (कहने का तात्पर्य यह है कि मेवा-मिठाई में भी श्रीकृष्ण
की रुचि नहीं।) प्रीति की रीति को क्या कहा जाय; एक दुखिया ब्राह्मण एक पाव
साँवाँ जैसे मोटा चावल लाया है, (मेवा-मिठाई में भी रुचि नहीं लेने वाले)
श्रीकृष्ण उन मोटे चावलों को बड़े प्रेम से बैठे चबा रहे हैं।
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का निरूपण हुआ
है। वे नाना प्रकार के पकवान छोड़कर मित्र के द्वारा भेंट किए गए चावल
जिस प्रेम-भाव से चबाते हैं, उसमें मैत्री-आदर्श का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता
हैं। विषम अलंकार का प्रयोग भी भावों को प्रभावोत्पादक बनाने में बड़ा उप-
योगी रहा है।
(५४) शब्दार्थ—रुकुमिनि=रुक्मणी कृष्ण की आठ पटरानियों में एक।
अनचाह=अनिच्छा; उदासीनता।
व्याख्या—(दो मुट्ठी चावल खाने के बाद) श्रीकृष्ण ज्योंही तीसरी मुट्ठी

८० / सुदामा-चरित
चावल लेने लगे तभी रुक्मिणी ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा—आज
आप धन-सम्पत्ति से इतना उदासीन क्यों हो गये हैं ?
(५५) शब्दार्थ—यह धौं कौन मिलाप == यह कैसा मिलन है ? यह कैसी
मित्रता है ? करत सुदामा...सुदामा आप==सुदामा को अपने समान ऐश्वर्यवान
बना रहे हैं और स्वयं सुदामा के समान कंगाल बन रहे हैं।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण का हाथ रोक कर) रुक्मिणी ने उनके कान में कहा—
भला, यह भी मिलने-भेंटने का कोई ढंग है कि आप सुदामा को अपने समान
तीनों लोकों का स्वामी बना रहे हैं और स्वयं सुदामा के समान निर्धन बन
रहे हैं।
विशेष—इस दोहे में महादानी श्रीकृष्ण के दीनबन्धु तथा मित्रवत्सल रूप
का चित्रण हुआ है वे अपना सर्वस्व अपने मित्र को देकर स्वयं उसकी निर्धनता
अपना लेने में गौरव अनुभव करते हैं।
(५६) शब्दार्थ—कौतुक—तमाशा; क्रीड़ा, विस्मयजनक प्रसंग । भई रसोई
सिद्ध = भोजन तैयार हो गया ।
व्याख्या—इसी विस्मयजनक प्रसंग के समय सेवकों ने आकर निवेदन
किया—महाराज, भोजन तैयार है। चल कर भोजन कीजिए ।
(५७) शब्दार्थ—मध्याह्न = दोपहर ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा के साथ स्नान किया, धुली-धुलाई धोती
पहनी और दोपहर की संध्या की। फिर वे खाने के लिए चौके में जा बैठे ।
(५८) शब्दार्थ - रूपे के = चांदी के। रुचिर == सुन्दर । पायस दूध में
बनी खीर । सिता = चीनी; मिसरी । सरद = शरद । सोंधो = सोंधा ।
पहिति = दाल। सुरभी = गाय । फूले-फूले फुलका = फूली-फूली रोटियां ।
प्रफुल्ल = खिला हुआ श्वेत कमल । दुति = द्युति; चमक; शोभा । फूले-फूले...
मंद की = फूली-फूली रोटियों के सामने खिले हुए श्वेत कमलों की शोभा भी
मंद पड़ जाती हैं। व्यंजन = तरकारियां; विविध खाद्य पदार्थ । आछे कै = अच्छी
तरह । जेंवाय = भोजन करा कर; खिला कर । पाछे तैं = पीछे से । पछिया-
वरि = श्रीखण्ड; सिखरन - दही या मट्ठे में शक्कर डाल कर बनी वस्तु ।

३. तृतीय भाग: तण्डुल-भक्षण, विदाई, सुदामापुरी वैभव एवं ग्रन्थ-उपसंहार

सुदामा-चरित / ८१
भोजन के पश्चात् मीठी वस्तु खाने से पाचन शक्ति ठीक रहती है। आनि =
ला कर। कन्द = मिसरी।
व्याख्या—(श्रीकृष्ण और सुदामा जब खाने बैठे तब उन्हें) चाँदी की
सुन्दर थाली में मिश्री सहित खीर परोसी गई, जो शरद् ऋतु के चन्द्रमा से भी
अधिक स्वच्छ थी। दूसरी थाली में दाल-भात, गाय का सुगन्धित घी और फूले
हुए फुलके परोसे गये। फूल-फूले फुलकों के सामने श्वेत कमलों की शोभा भी
मंद पड़ गई। पापड़, मुँगौरी, बड़ा इत्यादि तरह-तरह के व्यंजन परोसे गए।
भोजन के अन्त में श्रीखंड या सिखरन परोसी गई। श्रीकृष्ण ने अपने मित्र
सुदामा को ऐसे प्रेम से भोजन कराया कि देवता भी वह प्रीति देखते ही रह
गये।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण द्वारा मित्र सुदामा को दिये गये अपार
आदर; सत्कार, अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों आदि का अति सुन्दर निरूपण
हुआ है। प्रतीप अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है।
(५६) शब्दार्थ विधि = प्रकार। चित चल्यौ = इच्छा हुई। बनाव =
वर्णन।
व्याख्या—इस तरह सात दिन सुदामाजी द्वारिका में रहे। प्रतिदिन उन्हें
श्रीकृष्ण की ओर से अधिक सम्मान मिलता रहा। तब उन्हें घर वापस लौटने
की इच्छा हुई। आगे उसका वर्णन सुनिये।
(५०) शब्दार्थ—दाहिने = दायीं ओर। चतुरानन = ब्रह्मा। सामुहें =
सम्मुख सामने। महेस = महेश; शंकर। दुऔ = दोनों। कर = हाथ। सुरेस =
इन्द्र। ऐतइ बीच = इसी बीच में। पायन = पांवों पर। आय = आ कर।
विभौ = वैभव। वपुरो = बेचारा।
व्याख्या—(जाते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को सब कुछ दे दिया। परन्तु
प्रत्यक्ष रूप में सुदामा को दान की सूचना न देकर उन्होंने एक स्वप्न में उन्हें
सारे ऐश्वर्य की झलक-सी दिखा दी) जाते समय सुदामा ने स्वप्न में देखा,—
ब्रह्मा उनकी दाहिनी ओर वेद पढ़ रहे हैं, सामने शंकर ध्यान लगाये हैं, बायीं
ओर सब देवताओं के साथ इन्द्र हाथ जोड़े खड़े हैं और विविध ऐश्वर्य लिए

८२ / सुदामा-चरित
कुबेर उनके सामने प्रणत हैं। जन्म का दरिद्र ब्राह्मण अपने स्वप्न में इतना
ऐश्वर्य देख कर चौंक पड़ा !
[अपने घर वापस लौटने पर सुदामा ने इस स्वप्न की चर्चा अपनी पत्नी
से की है। वे कहते हैं—
“दिन-प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि।
सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होंहि ॥”]
विशेष—इस सवैया छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप को सांकेतिक किया
गया है। इसी से वे अपने भक्त सुदामा को एक असाधारण स्वप्न का दर्शन
कराते हैं। उदात्त अलंकार का सौन्दर्य भावों के उत्कर्ष में पूर्ण सहयोग देता है।
(६१) शब्दार्थ—देनो हुतो = जो देना था। गाथ = गाथा; कथा; रहस्य ।
बेर = बेला; समय ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण ने सुदामा को जो कुछ देना था सो दे दिया।
(सुदामा ने उस ऐश्वर्य को स्वप्न में देखा भी ।) परन्तु सुदामा इस रहस्य को
नहीं समझ सके। चलते समय श्रीकृष्ण ने प्रत्यक्ष रूप में उन्हें कुछ न दिया।
(६२) शब्दार्थ—पुनकनि—प्रसन्नता; रोमांच होना; उमंग; उत्साह। वह
पुलकनि भाँति—श्रीकृष्ण का उत्साह और उमंग से उठ कर आदरपूर्वक ललक
कर सुदामा से गले मिलना। भाँति—रीति। पठवनि—विदाई; भेजना। यह
पुनकनि—और यह (बिना कुछ दिये) विदा करना।
व्याख्या—(चलते समय श्रीकृष्ण ने सुदामा को प्रत्यक्ष रूप में कुछ न
दिया। यह सोच कर सुदामा को बड़ा पछतावा हुआ। रास्ते में वे सोचने लगे)
श्रीकृष्ण का रहस्य कुछ समझ में नहीं आता। कहाँ तो प्रेम से अत्यन्त पुलकित
होकर आतुरता तथा उमंग से उन्होंने मेरा स्वागत किया और कहाँ इस तरह
खाली हाथ विदा कर दिया ! (अगर अन्त में उन्हें मेरे साथ इतना निष्ठुर
व्यवहार करना था तो उन्होंने पहले मेरे प्रति इतना प्रेम प्रदर्शित क्यों
किया ?)
(६३) शब्दार्थ—कर ओड़त फिरे = हाथ पसारे फिरे। तनक = थोड़ा ।
काज = लिये; कहा भयो ॰॰॰ राज समाज = अब कृष्ण को राजपाट मिल गया तो

सुदामा-चरित / ८३
क्या हुआ ।
व्याख्या - (खाली हाथ लौटने से सुदामा का मन बहुत क्षुब्ध था ।
पर मन ही मन श्रीकृष्ण की आलोचना कर उन्होंने अपने आप को धीरज
दिया । उन्होंने यह सोच कर अपने आप को धीरज दिया कि श्रीकृष्ण स्वभाव
से ही क्षुद्र हैं । संसार में धन पा जाने से किसी की प्रवृत्ति थोड़े ही में बदल
जाती है ।) ये वही कृष्ण हैं जो बाल्यावस्था में जरा सा दही के लिए घर-घर
हाथ फैलाते फिरते थे । अब उन्हें राज-पाट मिल गया तो क्या हुआ, स्वभाव
तो अभी वही है ।
विशेष—इस दोहे में सुदामा का मन स्थिति का अत्यन्त स्वाभाविक
चित्रण हुआ है ।
(६४) शब्दार्थ = हौं = मैं । आवत नाहीं हुतौ = आता नहीं था; आना
चाहता था । वाही = उसी ने (स्त्री ने) । ठेलि = ठेल कर; जबरदस्ती । वाहीं
पठ्यौ ठेलि = स्त्री ने वारबार ठेल कर यहाँ भेजा । धन = स्त्री । = धनधन-
सम्पत्ति । जाइकै = जा कर सकेलि = समेट कर ।
व्याख्या = (सुदामा स्त्री के कहने से ही श्रीकृष्ण के पास आये थे ।
जब श्रीकृष्ण ने चलते समय उन्हें कुछ न दिया तो स्त्री के प्रति भी झुँझला
कर मन ही मन उन्होंने कहा...) मैं तो श्रीकृष्ण के पास आता ही नहीं था
या आना ही नहीं चाहता था, मेरी स्त्री ने ही मुझे बार-बार ठेलकर यहाँ
भेजा । अब मैं घर जाकर अपनी स्त्री से कहूँगा कि श्रीकृष्ण ने तेरे लिए
गाड़ियों में भर-भर कर धन-सम्पत्ति भेजी है, इसे अच्छी तरह सँभाल कर
रख ।)
विशेष—इस दोहे सुदामा की अपनी झुँझलाहट, व्यंग्य-बाणों की वर्षा तथा
यमक अलंकार का सौष्ठव विशेष रूप से देखा जा सकता है ।
(६५) शब्दार्थ = बालापन = बचपन । साप = शाप । कहा...साप मैं शाप
क्या दूँ । जैसो...आप = जैसा कृष्ण ने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले ।
व्याख्या—(स्त्री पर अपनी झुंझलाहट उतारने के बाद सुदामा का
ध्यान फिर श्रीकृष्ण की ओर गया । उन्होंने मन ही मन कहा—श्रीकृष्ण मेरे

८४ / सुदामा-चरित
बचपन के मित्र हैं, अतः मैं उन्हें शाप क्या दूं ? केवल इतना ही कहता हूँ,
जैसा उन्होंने मुझे दिया, वैसा ही उन्हें भी मिले।
(६६) शब्दार्थ—नौ गुनधारी=नौ गुण धारण करने वाला; नौ तागे का
जनेउ धारण करने वाला; ब्राह्मण सुदामा। छगुनं=ब्राह्मणों के छः गुण
अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह। तिगुना मध्ये—तीन
गुणों—यजन, पठन, और दान वाले क्षत्रियों के बीच। जाय=जा कर। लायौ
=लाया। चापल—(चापल्य)=चंचलता; विकलता। चौगुनी=काम, क्रोध,
मद, लोभ इन चार लक्षणों वाला। ओंठों गुननि=ज्ञान के साधन—विवेक,
वैराग्य; षट्-सम्पत्ति (शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और सामाधान);
मुमुक्षा, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और समाधि।
विशेष—इस दोहे में सुदामा के खाली हाथ लौटने पर उनके मन के संताप,
पश्चाताप तथा अहं का अत्यन्त मनोवैज्ञानिक निरूपण हुआ है।
(६७) शब्दार्थ—और कहा कहिए=और क्या कहूँ। कंचन—सोना।
निपट—एक दम। कठिन—कठोर। हृदय। मोको—मुझे। दाम—कौड़ी;
छदाम।
व्याख्या=(सुदामा फिर मन में सोचने लगे—) और क्या कहूँ जहाँ
सोने के ही महल हैं, उस द्वारिका के स्वामी श्रीकृष्ण का हृदय इतना कठोर है
कि उन्होंने आते वक्त मुझ जैसे दरिद्र को एक छदाम भी नहीं दिया।
(६८) शब्दार्थ=रतनन=रतनों से। लाग=दोष। लाग आपने भाग को
=अपने भाग्य का ही दोष है। काको=किसको।
व्याख्या=(सुदामा सोचते हैं) श्रीकृष्ण के यहां न जाने कितने
भंडार हैं जिनमें बहु-मूल्य रत्न भरे पड़े हैं (परन्तु उन्होंने मुझे कुछ भी नहीं
दिया)। (अन्त में वे यह सोच कर अपने आप को सान्त्वना देते हैं कि) यह सब
अपने भाग्य का दोष है, इसमें श्रीकृष्ण का क्या दोष है? अर्थात् मेरा भाग्य ही
खोटा है, मैं श्रीकृष्ण को क्या दोष दूं?
(६६) शब्दार्थ—इमि=इस तरह; इस प्रकार। झखत=पछताते हुए;
झुंझलाते हुए। पुन-तीर=गाँव के निकट। दीठि=नजर; दृष्टि। हय=घोड़ा।

, 'अ' has a top curve, bottom curve, middle bar, vertical stem, and another vertical stem for 'ा' -> आ!
Yes, look: it is हुआ!
प्रयाग हुआ है । -> सार्थक प्रयोग हुआ है ।
Ah, the letter is ह + ु = हु, and आ = आ!
So: सार्थक प्रयोग हुआ है ।!
Let's re-verify: हुआ in line 25:
हुआ है, जिसे प्रभावशाली बनाने में सन्देह अलंकार का सार्थक प्रयोग हुआ है ।
Yes, absolutely हुआ है ।!

Line 26:
(७२) शब्दार्थ-देव-नगर = स्वर्ग, अमरावती । जच्छपुर = यक्षपुर; कुबेर का
(Notice: शब्दार्थ-देव-नगर = स्वर्ग, अमरावती । जच्छपुर = यक्षपुर; कुबेर का).

Line 27:
नगर (अलकापुरी) । भटको = भटक पड़ा । कित आय = कहाँ आ कर । कहा =
Wait, is it कित आय or कित आयौ?
Look at कित आय: क ि त आ य -> कित आय = कहाँ आ कर । कहा =.
Wait, let's check आय: is there a matra on य? No, just आय.

८६ / सुदामा-चरित
क्या। यहि = इस। संभ्रमहिं = भूल जायें। अनैसे = खराब। द्विजदेव = ब्राह्मण
देवता। लखौ द्विज देव नगर कै = देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा)
का नगर है। हरि-देव = श्रीकृष्ण। कै दियो है = कर दिया है; बना दिया है।
व्याख्या (जब बहुत खोजने पर भी सुदामा को अपनी झोपड़ी का पता न लगा
तब उन्होंने उस नगर के निवासियों से झुँझला कर पूछा—) अरे भाई, यह तो
बताओ कि यह कौन-सा नगर है; यह स्वर्ग है या अलकापुरी है? तुम लोग मुझे
समझा कर क्यों नहीं कहते कि इस नगर का क्या नाम है? मैं भटक कर कहाँ
आ गया हूँ? तुम कैसे नगरवासी हो कि भूले हुए पथिक को ठीक रास्ता नहीं
बतलाते? जिस नगर में पथिक रास्ता भूल जायें और कोई ठीक मार्ग न बताये,
वहाँ के लोग तो भले नहीं समझे जाते।
सुदामा का यह आक्षेप सुन कर एक व्यक्ति ने कहा—यहाँ के लोग बुरे
नहीं हैं। देखिये, यह देवतास्वरूप ब्राह्मण (सुदामा) का नगर है। श्रीकृष्ण ने
कृपा करके इस नगर को देवनगर के समान सुन्दर वैभवपूर्ण बना दिया है।
विशेष—इस कुण्डलिया छन्द में भी सुदामा की भ्रमित मनः स्थिति का
निरूपण हुआ है और इसमें भी सन्देह अलंकार का सौष्ठव द्रष्टव्य है।
(७३) शब्दार्थ—मन-मानिक = मणि-माणिक्य । जटित = जड़े हुए ।
सुबरन = स्वर्ण, सोना। भेंटे अकुलाय = आतुर हो कर मिल रहे हैं। छू वै रह्यौ
—छू रहे। बाँभनी = ब्राह्मणी; सुदामा की पत्नी। विविध बिधि = अनेक प्रकार
के। जैहौं = जाऊँगा। हौं—मैं जैहौं हौं निकालौ = मैं निकाला जाऊँगा । सो
तमासौ जग ज्वै रह्यौ = वह तमाशा संसार देख रहा है। तैं—तरत—सुन्दर;
से आकर्षक। ऐसी दशा···ह्वै रह्यौ—सुदामा के, भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन
मात्र से सुदामापुरी द्वारिकापुरी के समान सुन्दर हो रही है।
व्याख्या सुदामा के नगर का वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि
वहाँ सुन्दर-सुन्दर महल थे जिनमें मणि और माणिक्य जड़े हुए थे। उन्हें देख
कर ऐसा मालूम होता था मानो सोने का सूर्य प्रकाश दे रहा है। सुदामा को
आते देख कर नगर के लोग दौड़ पड़े। लोग उत्सुकतापूर्वक उनसे मिले और पैर
छू कर दण्डवत किया। (अब भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह उनका ही

सुदामा-चरित / ८७
नगर है।) तरह-तरह के वस्त्राभूषणों से सजी हुई ब्राह्मणी* को देख कर उन्हें
और भ्रम हो गया कि यह उनका नगर नहीं। वे घबड़ा गये और सोचने लगे,
यहाँ से अब अवश्य मैं निकाला जाऊँगा, यह तमाशा भी लोग देखेंगे ।
(सुदामा को क्या पता था कि) उनके श्रीकृष्ण के दर्शन मात्र से ही सुदामापुरी
की कायापलट हो गयी और अब वह द्वारिकापुरी से भी अधिक सुन्दर हो गयी
है।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण की दानशीलता के फलस्वरूप बने सुदामा
के भव्य भवन का अति सुन्दर वर्णन हुआ है। वर्णनात्मक शैली सौष्ठव के साथ-
साथ उदात्त एवं उत्प्रेक्षा का सौन्दर्य भी द्रष्टव्य है।
(७४) शब्दार्थ—कनक-दंड = सोने की छड़ी। सबनि = सबने ले कर ।
व्याख्या—(नगर-निवासियों ने एक महल के सामने सुदामा को ले
जा कर खड़ा किया) जिसके द्वार पर सोने का दंड हाथ में लिए हुए द्वारपाल
खड़ा था। उन लोगों ने सुदामा से कहा = यही आप का महल है।
(७५) शब्दार्थ—हँसत हौ = दिल्लगी करते हो। ह्वै करि परम प्रवीन =
बहुत चालाक हो कर या अपने को बहुत चालाक समझ कर ।
व्याख्या—(उस महल और द्वारपाल को देख कर सुदामा ने उन
लोगों से कहा—) आप लोग अत्यन्त चतुर हो कर भी मुझ दीन ब्राह्मण के साथ
दिल्लगी क्यों कर रहे हैं ? मुझे मेरी वह झोपड़ी दिखलाइये जहाँ मेरी दीन-
*कुछ लोगों के विचारानुसार ब्राह्मणी से यहाँ तात्पर्य सुदामा की पत्नी से
है। परन्तु सुदामा की पत्नी को सुदामा के आने की खबर पीछे मिलती है, जैसा
कि इस दोहे से स्पष्ट है—
“सुनत चली आनंदयुत, सब सखियान लै संग ।
नूपुर किंकिनि, दुँदभी, मनहुँ काम चतुरंग ॥”
यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि ‘बाँभनी’ शब्द यहाँ किसके लिए आया है। अगर
‘बाँभनी’ से तात्पर्य किसी ब्राह्मण की स्त्री से है तो सुदामा का, परस्त्री को
आभूषणों से लदी देख कर घबड़ा जाना युक्तिसंगत नहीं मालूम होता ।

८८ / सुदामा-चरित
दुखिया ब्राह्मणी रहती है।
(७६) शब्दार्थ—सो = से। तिन = उन्होंने। कहि पठवहु = कहला भेजो।
व्याख्या—नगर-निवासियों ने द्वारपाल से कहा—भीतर (सुदामा
की पत्नी के पास) खबर भिजवा दो कि ब्राह्मण-देवता आ गये हैं। अपने पति
का दर्शन कर सनाथ सो जाओ। (इसका अर्थ इस प्रकार भी हो सकता है—
भीतर यह खबर भिजवा दो, ब्राह्मणदेवता आ गये हैं कि ब्राह्मणी उनका दर्शन
कर कृतकृत्य हो जायें।)
(७७) शब्दार्थ—नूपुर = पेंजनी। किंकिनि—किंकिणी = करधनी; कमर-
कस। दुंदभी = दुन्दुभी, नगाड़ा। मनहु काम चतुरंग = मानो कामदेव की चतुरं-
गिणी सेना। चतुरंगिनी = चार अंगों (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) वाली सेना।
व्याख्या—ब्राह्मणी वह सूचना पाकर बहुत प्रसन्न हुई और अपनी सखियों
के साथ पाजेब, करधनी की घंटिकाओं की ध्वनि करती हुई, नगाड़े के संगीत के
बीच इस प्रकार द्वार की ओर चली मानो कामदेव की चतुरंगिणी सेना आ रही
हो।
विशेष—इस दोहे में श्रीकृष्ण की अपार कृपा से धन-वैभव पाने वाली
सुदामा-पत्नी की साज-सज्जा का अलंकृत वर्णन हुआ है और उत्प्रेक्षा अलंकार
उस सौष्ठव की वृद्धि में सहायक है।
(७८) शब्दार्थ—कंत = पतिदेव। गेह = घर।
व्याख्या—ब्राह्मणी ने सुदामा से आ कर कहा—हे नाथ! यही अपना घर
है। श्रीकृष्ण ने इस प्रकार हमारी दरिद्रता का नाश करके तीनों लोकों में
अपनी मैत्री-प्रेम को प्रकट किया है।
(७६) शब्दार्थ—जनि = मत। जनि कहो = न कहो। सँभारि = सँभाल
कर; सोच-विचार कर। इहैं = यहीं पर। कुटी मेरी हती = मेरी झोपड़ी
थी। बापुरी = बेचारी।
व्याख्या—(सुदामा अपनी पत्नी को पहचान न सके। अपने सामने एक
पटरानी को खड़ी देख कर और उसके द्वारा पति सम्बोधन सुन कर वे बहुत
चकमकाये। उन्होंने कहा—) तुम सोच-समझ कर बोलो; मुझे अपना पति मत

सुदामा-चरित / ८६
कहो। (हाँ,) यहीं पर मेरी झोपड़ी थी जिसमें बेचारी मेरी दुखिया पत्नी रहती
थी।
(८०) शब्दार्थ—तिहारियै=आपकी ही; तुम्हारी ही। सुधि सँभारिए=
होश कीजिये; याद कीजिये। प्रभुता=प्रभुत्व। श्री भगवंत=श्रीकृष्ण।
व्याख्या। (पति का शंका दूर करने के लिए सुदामा की पत्नी ने कहा—)
हे नाथ ! होश सँभालिये, जरा ध्यान से देखिये, मैं आपकी ही स्त्री हूँ। यह
सब धन-सम्पत्ति और सुन्दरता भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुई है।
(८१) शब्दार्थ—परी हुती=पड़ी हुई थी। तामैं=उसी में। दुःख काटौं
=दुःख के दिन बिताते थे। हेम-धाम=सोने का घर। जेवर-जराऊ=जड़ाऊ
गहने। साजे=पहने। छूछी=खाली; बिना गहनों की। छाम=क्षीण। सारी-
जरतारी=साड़ी जिस पर ज़री का काम किया हुआ हो। कारी=काली।
कामरी=कम्बल। पड़ाइन=पड़िवाइन; ब्राह्मणी। तिहारी अनुहार=तुम्हारे
समान रूप वाली। बिपदा-सताई=दुःख की मारी। पामरी=अभागिन।
व्याख्या—(अभी भी सुदामा को विश्वास न हुआ कि यह स्त्री मेरी पत्नी
है और यह महल मेरा अपना घर हे। उन्होंने कहा—) यहीं पर मेरी टूटी-फूटी
झोपड़ी थी। उसी में मेरी पत्नी अपने दुःख के दिन व्यतीत करती थी।
उस झोपड़ी के स्थान पर ये सोने के महल कैसे आ गये? (या, उसके रहने के
सोने के महल कहाँ थे?) तुम्हारा प्रत्येक अंग जड़ाऊ गहनों से सुशोभित है
और इतनी सखियाँ तुम्हारे साथ हैं। परन्तु मेरी ब्राह्मणी वह ब्राह्मणी दुबली-
पतली और अकेली थी; उसके शरीर पर कोई गहना न था। तुम ज़री के काम
की साड़ी और किनारेदार रेशमी दुपट्टा पहने हुए हो, परन्तु मेरी ब्राह्मणी के
पास तो ओढ़ने के लिए सिर्फ़ एक काली कामरिया थी। (हाँ,) तुम्हारी ओर
देख कर मैं इतना तो कह सकता हूँ कि मेरी वह ब्राह्मणी तुम्हारी ही सूरत-
शक्ल की थी। पर यह बात मेरी समझ में नहीं आती कि जन्म भर दुःख सहने
वाली बेचारी ब्राह्मणी को कुछ दिनों के अन्दर ही इतना धन-ऐश्वर्य कहाँ से
मिल गया? (अन्तिम पंक्ति का अर्थ, कुछ लोग इस प्रकार लगाते हैं—अपनी
विपदा की सतायी हुई दुखिया ब्राह्मणी को मैं कहाँ पाऊँगा?)

६० / सुदामा-चरित
विशेष—इस कवित्त में सुदामा की हैरानी, दुविधा आदि का अत्यन्त
स्वाभाविक चित्रण हुआ है। अनुप्रास अलंकार का सौष्ठव भी द्रष्टव्य है।
(८२) शब्दार्थ—मंजु=सुन्दर। भायन सों=भावों से। तिहारोई=
तुम्हारी ही। हरौ=दूर कीजिये। श्रम=थकावट। भूरि=बहुत। दारिद
गमायो=दरिद्रता मिटायी। गह्यौ कर हैं=हाथ पकड़ती है। अविनासी=
अविनाशी=अमर। पूरन-प्रकाशी=पूर्ण ज्योतिर्मय। बरु=श्रेष्ठ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने खड़ी होकर बड़ी कोमलता से कहा—हे
स्वामी ! मैं आपके चरण छूकर कहती हूं कि यह आपका ही घर है। आप
बहुत दूर से आये हैं, द्वारिका जाने में आपने बड़ा भारी कष्ट उठाया हैं। श्री-
कृष्ण की कृपा से हमारी दरिद्रता दूर हो गयी है। आइये, मैं अपनी सेवा से
आपकी थकावट दूर कर दूं। (सुदामा को इस प्रकार समझाते हुए स्त्री ने
उनका हाथ पकड़ लिया। सुदामा को अपनी बातों पर पूरा विश्वास न करते
देख वह उन्हें फिर समझाती है—) हे नाथ ! सोलहों कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण,
जिनका कभी नाश नहीं होता (जो ईश्वर के अवतार हैं) उन्होंने ही (मित्रता
निभाने के लिए) ऋद्धि-सिद्धियों को आपकी दासी बना दिया है, करोड़ों काम-
धेनु के साथ अपार सम्पत्ति और सब इच्छाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष
भी उन्होंने आपको दिया है। आप घर चलिए, भ्रम को त्यागिये और भगवान्
ने जो कुछ दिया है उसे ग्रहण कीजिए।
विशेष—इस कवित्त में सुदामा-पत्नी अपने अपार वैभव का रहस्य प्रकट
करते हुए श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप की ओर अपने पति का ध्यान आकृष्ट करती
है।
(८३) शब्दार्थ —मुदित = प्रसन्न। अन्हवायो=स्नान करवाया। उबटि=
उबटन लगा कर। सुचि=शुचि - पवित्र।
व्याख्या—इस तरह पति को समझा-बुझा कर ब्राह्मणी उन्हें महल में ले
गयी और शीघ्र ही उसने उनके शरीर में पवित्र और सुगंधित उबटन मल-मल
कर उन्हें स्नान कराया।
(८४) शब्दार्थ— अंबर = वस्त्र। अंबर रचे = वस्त्र पहनाये।

सुदामा-चरित / ६१
व्याख्या—इसके बाद पति को सिंहासन पर बैठा कर ब्राह्मणी ने बड़े
आदर-प्रेम से उनकी पूजा की; तब उन्हें पवित्र और सुगंधित वस्त्र तथा सुन्दर-
सुन्दर आभूषण पहनाये ।
(८५) शब्दार्थ—सीतल = शीतल । अँचवायकै = आचमन करा कर ।
छवि = सुन्दर । रविप्रभा = सूर्य की कान्ति ।
व्याख्या—सुदामा को वस्त्र-आभूषण पहनाने के बाद ब्राह्मणी ने ठंडे जल से
उनके हाथ-पाँव धो कर उन्हें बैठाया । फिर पानों से भर कर पानदान उनके
पास ले जा कर रखा । वह पानदान अत्यन्त स्वच्छ और चमकीला था।
विशेष—इस दोहे में उपमा अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है ।
(८६) शब्दार्थ—रम्भा = देवलोक की अप्सरा, चिरयौवना, चिर-सुन्दरी ।
रंभादिक = रम्भा आदि; मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोतमा और मंजुघोषा —ये
छः स्वर्ग की प्रधान अप्सराएँ हैं । बयारि = वायु ।
व्याख्या—रम्भा आदि अप्सराएँ चारों ओर से सुदामा पर चमर डुलाने
लगीं और उनकी पतिव्रता स्त्री पंखा झलने लगी ।
(८७) शब्दार्थ—स्वेत-छत्र = उजला चँदोवा । राजत = सुन्दर लगते हैं ।
सक्र = शक्र—इन्द्र । बाहन = सवारी । तुरँग = घोड़ा । बर = सुन्दर । अरु =
और । शुभ = मंगलमय । जान = यान—सवारी; रथ ।
व्याख्या—उजले चँदोवा के नीचे बैठे हुए सुदामा इन्द्र के समान सुशोभित
हो रहे थे । सुन्दर हाथी, घोड़े और रथ के अतिरिक्त और भी कई तरह की
सुखद सवारियाँ उनके पास थीं ।
(८८) शब्दार्थ—जानि परी = जान पड़ता है । गुरु-बन्धु = गुरु-भाई;
सहपाठी । हरिलीन्हीं = दूर कर दी । पीर = दुःख ।
व्याख्या—(जान-पड़ता है कि) गुरुभाई श्रीकृष्ण ने कल्पवृक्ष-सहित कामधेनु
दे कर सुदामा के सब कष्ट हर लिये ।
(८६) शब्दार्थ—सुधा = अमृत । वाम = स्त्री । बिनीत = विनीत, नम्र ।
मृदु = कोमल; मीठे । मन काम = मन की अभिलाषा ।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने विविध प्रकार से उनकी सेवा की और उन्हें

६२ / सुदामा-चरित
अमृत (या अमृत-तुल्य जल) पिलाया। इसके बाद उसने बड़ी नम्रता से मीठे
वचन कहे—अब मेरी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो गयीं।
(६०) शब्दार्थ—लै=ले कर। आयसु=आज्ञा। तिय=स्त्री। न्हाइ करि
=स्नान करके। गौरि=गौरी—पार्वती। सोहाग-हित=सुहाग अचल रखने
के लिए। हित=हेतु; लिए।
व्याख्या—पति की आज्ञा ले कर सुदामा-पत्नी ने स्नान किया और पवित्र
सुगंध शरीर में लगा कर उसने बड़े प्रेम से अपने सौभाग्य की रक्षा के लिए
पार्वती की पूजा की।
(६१) शब्दार्थ—षटरस=मिष्ट, लवण, कटु, कषाय, अम्ल और तिक्त।
रचाय=सजा कर।
व्याख्या—सुदामा की पत्नी ने छहों रसों से युक्त चारों प्रकार के भोजन
बनाये और सोने की थाली में उन्हें सजा कर रखा।
(६२) शब्दार्थ—डारि कै=बिछा कर। सुजानि=चतुर। भाजन-कनक
=सोने का पात्र। आनि=ला कर।
व्याख्या—चतुर दासी ने भोजन तैयार देख कर चंदन की चौकी बिछायी
और रत्नों से जड़े हुए सोने के एक पात्र में गंगाजल भर कर रख दिया।
(६३) शब्दार्थ—कूजा=जल रखने का छोटा पात्र; लुटिया। रच्छाधान
=ढक्कन। जल-प्रकाश=स्वच्छ जल। भर-पूरि=भर कर।
व्याख्या—(फिर) दासी ने ढक्कन सहित (रत्नों से जड़ा हुआ) जलपात्र ला
कर रखा, जिसमें पवित्र, सुगंधित एवं स्वच्छ जल पूरा भरा हुआ था।
(६४) शब्दार्थ—काम=लिए। मरकत मनि=नीलम। छविधाम - बहुत
सुन्दर।
व्याख्या—(फिर उसने) सुदामाजी के बैठने के लिए रत्न-जड़ित सोने का
पीढ़ा रखा और कुछ दूर पर मणियों से जड़ी हुई बहुत सुन्दर चौकी रखी।
(६५) शब्दार्थ—पाथ = पानी; जल। पादुका = खड़ाऊँ। सलिल = जल।
व्याख्या—सुदामाजी के पैर धोने के लिए चौकी मँगा कर रखी गयी तथा
जल के साथ, उनके पहनने को मणियों से जड़ी हुई खड़ाऊँ रखी गयी।

सुदामा-चरित / ६३
(६६) शब्दार्थ—मृदु भाखि = मीठे शब्दों में; मधुर शब्द वाली । साखि =
साक्षी । कृष्ण को साक्षी करके सुदामाजी ने धन्य-धन्य कहा ।
व्याख्या—दासी ने आ कर बड़े मीठे शब्दों में कहा—भोजन करने चलिये ।
(इस समय सुदामा के मन में यह विचार आया कि यह सब धन-ऐश्वर्य श्रीकृष्ण
की कृपा का ही फल है ।) अतः, यह कह कर कि 'हे श्रीकृष्ण ! आप धन्य हैं' वे
भोजन करने के लिए उठे ।
(६७) शब्दार्थ—वसन = वस्त्र; कपड़े । सरोज = कमल । जनु = मानो ।
तनु धरे = शरीर धारण किये । मनोज = कामदेव ।
व्याख्या—वस्त्र उतार कर चरण-कमल धोने के लिए सुदामाजी जब
चौकी पर गये, उस समय वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो साक्षात् कामदेव
शरीर धारण कर उपस्थित हो गये हों ।
विशेष—इस दोहे में धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न सुदामा के सौन्दर्य का चित्रण
हुआ है । रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार का स्वाभाविक प्रयोग भी द्रष्टव्य है ।
(६८) शब्दार्थ—रति = कामदेव की स्त्री । छवि आगरी = सुन्दरता की
खान ।
व्याख्या— (पैर धो कर) सुदामाजी खड़ाऊँ पहन कर भोजन करने के
लिए गये और पीढ़े पर जा बैठे । उस समय रति से भी अधिक सुन्दर उनकी
स्त्री उनके पास आ मुस्करा कर हँसने लगी ।
विशेष—इस दोहे में अपार धन-वैभव मिल जाने के उपरांत, सुदामा-पत्नी
के सौन्दर्य का चित्रण हुआ है । व्यतिरेक अलंकार के प्रयोग द्वारा कवि ने उसे
कामदेव की पत्नी से भी अधिक सुन्दर बताया है ।
(६६) शब्दार्थ—व्यंजन चारि प्रकार = चार प्रकार के भोजन—चर्व्य,
चूच्य, लेह्य और पेय । जोरी = एकत्र की । पछिऔरी = भोजन के बाद दिया
जाने वाला पेय; शिखरन आदि ।
व्याख्या—अनेक प्रकार के भोजन, चारों प्रकार के व्यंजन और अंत में
खायी जाने वाली पछिऔरी सुदामाजी के सामने रखी गयी । कवि कहता है कि
उनके भोजन का वर्णन नहीं किया जा सकता है ।

६४ / सुदामा-चरित
(१००) शब्दार्थ - हरिहि समर्पौ = भगवान् को समर्पित करके भोग
लगाये । नाद = शब्द । मंद = धीरे से । त्यों = वैसे ही ।
व्याख्या - सब कुछ परोसे जाने पर उनकी पत्नी ने मुस्करा कर कहा-
अब भगवान् को समर्पित करके भोग लगाइए । यह सुन कर सुदामा ने घंटी
बजा भगवान् का नाम ले कर उन्हें भोजन समर्पित किया ।
(१०१) शब्दार्थ - अगिन जिमाय = अग्नि में आहुति दे कर । विधान =
विधान - नियम । बैस्व देव करि नेम बलि काढ़ी = नियमपूर्वक विश्वदेव अर्थात्
गो, काक और श्वान को कौर निकाल कर । करति पवन = पंखा झलती है ।
व्याख्या - इसके बाद नियमपूर्वक अग्निहोत्र कर तथा गो, काग और श्वान
को कौर निकाल कर सुदामाजी ने भोजन करना आरम्भ किया । उनकी पत्नी
(पास ही बैठ कर) प्रेम से पंखा झलने लगी ।
(१०२) शब्दार्थ - रुचि = इच्छा । अबै = अभी । सोय = वही ।
व्याख्या - सुदामा की पत्नी बार-बार पूछती है - जो चीजें आपको अच्छी
लगती हैं वे और लीजिये । श्रीकृष्ण की कृपा से सब चीजें भरी हैं, आप जो
कुछ माँगेंगे उसे मैं अभी ला कर परोस दूँगी ।
(१०३) शब्दार्थ - जेइँ चुके = भोजन कर चुके । अचवन लगे = मुँह-हाथ
धोने लगे । पलका = पलंग । बूनो सुरेसम-दाम = सुन्दर बहुमूल्य रेशम से बुना
हुआ ।
व्याख्या - भोजन और आचमन करने के बाद सुदामाजी रेशम की डोरी
से बिने हुए और रत्नों से जड़े हुए सोने के पलंग पर विश्राम करने गये ।
(१०४) शब्दार्थ - ललित = सुन्दर । विरचिकै = सजा कर । पाँइत = पैर
की तरफ । पाँयके कसिकै डोरि = पायताने की डोरियों को कस कर । अतर =
इत्र । बोरि = बसा कर; भिगो कर ।
व्याख्या - चतुर सेवकों ने पलंग पर सुन्दर बिछौने बिछा दिये, पलंग की
डोरी कस दी और इत्र से बिछौने को सुवासित कर दिया ।
(१०५) शब्दार्थ - नेरे = निकट । बीरी = पान का बीरा । छवि-धाम =
सुन्दर । पौढ़न लगे = लेटने लगे ।

सुदामा-चरित / ६५
व्याख्या—(उन्होंने) पलंग के पास ही पान बीड़ों से भरा हुआ सुन्दर
पानदान रख दिया। तब सुदामाजी पैर धो कर विश्राम करने के लिए लेट
गये।
(१०६) शब्दार्थ—बीजना = पंखा। सेवत पद चारु = कोई सुन्दर पाँवों
को दबाता। गजमोतिन = गजमुक्ता। हारु = हार; माला।
व्याख्या—कोई दासी चँवर डुलाने लगी, कोई पंखा झलने लगी। सेवक
उनके चरण दबाने लगे। सब दास-दासियाँ सुन्दर आभूषणों से सजे हुए थे और
गजमुक्ताओं के हार पहने हुए थे।
(१०७) शब्दार्थ—पिय = पति। पै = पास। किमि = किस प्रकार। एहि
भाँति = इस रूप में।
व्याख्या—(सुदामा को विश्राम करते हुए देख कर) उनकी पत्नी श्रृंगार
करके, पान खा कर मुस्कुराती हुई उनके पास आयी और उसने पूछा – अब मुझे
आरम्भ से वह कथा सुनाइये कि किस प्रकार श्रीकृष्ण ने हमको इतनी सम्पत्ति
दी।
(१०८) शब्दार्थ—आदिते = शुरू से। जिमि = जैसे।
व्याख्या—सुदामा ने शुरू से सब कथा सुनाना आरम्भ किया। उन्होंने बत-
लाया कि इस तरह रास्ता चलते-चलते उनके पैर थक गये और वो सो गये।
फिर बतलाया कि किस तरह सोयी हुई दशा में ही श्रीकृष्ण ने उन्हें गोमती के
किनारे पहुँचा दिया।
(१०६) शब्दार्थ—बखान = वर्णन; बड़ाई करते हुए वर्णन करना। मुख
लाख सों = लाख मुख से भी। आन = आ कर।
व्याख्या—जिस प्रकार श्रीकृष्ण के द्वार पर वे पहुँचे, उस कथा का भी
उन्होंने वर्णन किया। और, तब कहा कि श्रीकृष्ण जिस प्रकार आकर उद्वेग
और उमंग से उनसे मिले उसका वर्णन एक मुँह से क्या लाखों मुँहों से भी नहीं
किया जा सकता है।
(११०) शब्दार्थ—रमा-निवास = श्रीकृष्ण ; जिनके हृदय में लक्ष्मी का
निवास है।

६६ / सुदामा-चरित
व्याख्या—(सुदामा ने आगे कहा—) श्रीकृष्ण हाथ पकड़ कर मुझे अन्तः-
पुर में ले गये और स्वयं ही मेरे पैर धोने लगे।
(१११) शब्दार्थ—नयनन तें=आँखों से। वारि चल्यो=आँसू बहने
लगे।
व्याख्या—(सुदामा ने कहा—) श्रीकृष्ण ने जब धोने के लिए मेरे पैर
उठाये तो मेरे पैरों की दशा देख कर उनकी आँखों से जो जलधारा बही उसी से
मेरे पैर धुल गये। यह दृश्य देख कर वहाँ उपस्थित सभी नर-नारी चकित हो
गये।
(११२) शब्दार्थ—बहुरि=फिर। मेटे=दूर किया। भ्रम=सन्देह,
संकोच। सन्ताप=दुःख।
व्याख्या—इसके बाद सुदामा ने वे बातें कहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने किस
प्रकार स्वयं चावल लेकर खाये और किस प्रकार उन्हें अपने गले से लगा कर
उनके सारे सन्देहों (संकोचों) और दुःखों को दूर कर दिया।
(११३) शब्दार्थ—जेवनार=भोजन की व्यवस्था। पांति=कतार।
व्याख्या—तब सुदामा ने श्रीकृष्ण के यहाँ के जेवनार का वर्णन करते हुए
कहा, जो-जो व्यंजन मैंने वहाँ खाये उन सबका वर्णन मैं कहाँ तक करूँ; अर्थात्
उन सबका वर्णन करने में मैं असमर्थ हूँ।
(११४) शब्दार्थ—सपन=स्वप्न। परतच्छ=प्रत्यक्ष। निसफल=
बेकार।
व्याख्या—(फिर उन्होंने कहा—) जितने दिन मैं वहाँ रहा, श्रीकृष्ण ने
मुझे नित्यप्रति अत्यन्त प्रेम से रख कर धन और वैभव का स्वप्न दिखलाया।
मैं उस स्वप्न को यहाँ प्रत्यक्ष देख रहा हूँ अर्थात् मेरे स्वप्न सत्य हो गये। अब
मुझे विश्वास हो गया कि सपने झूठे नहीं होते।
(११५) शब्दार्थ—कह्यो आयनो मोह=सब कथा कहने के बाद सुदामा ने
अपने उस भ्रम की बात कही जो उन्हें कृष्ण के, प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर
पर कुछ न देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था। कृपानिधि=दयासागर।
भगत-हित=भक्त-हितकारी। चिदानन्द=चित्—आनन्द। भगवान् को सत्

सुदामा-चरित / ६७
(सत्य), चित् (चैतन्य) और आनन्द कहा गया है क्योंकि वे परम सत्य, परम
चेतन और परम आनन्द हैं।
व्याख्या—इस प्रकार पूरी कथा कह जाने के बाद सुदामा ने अपने उस भ्रम
की भी बात कही (जो उन्हें कृष्ण के; प्रत्यक्ष रूप से विदाई के अवसर पर कुछ न
देने से, द्वारिका से लौटते समय हो गया था और जिस भ्रम के कारण उन्होंने
श्रीकृष्ण को एक छोटा-सा निरापद शाप भी दे डाला था।) पर आज उन्होंने
स्वीकार किया कि श्रीकृष्ण भक्तों के हितकारी हैं और चैतन्य तथा आनन्द के
भंडार हैं।
(११६) शब्दार्थ—साजवाज = साज-सामान; सजावट । बाजि = घोड़ा ।
गज = हाथी । राजत = शोभा दे रहा है। बहल = बहली; सुन्दर छायादार
बैलगाड़ी । शुभ-सिंहासन = मंगलमय सिंहासन । चौक प्रति = प्रति चौक में;
प्रति आंगन में । लहलहैं = लहलहा रहे हैं; हरे-भरे हो रहे हैं; झूम रहे हैं।
पाकसासन = इन्द्र । सहल = साधारण; तुच्छ । लागत सहल हैं = तुच्छ लगते
हैं । लौं = तक ।
व्याख्या—कवि कहता है कि श्रीकृष्ण ने सुदामाजी को जो सम्पत्ति दी
उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। अब सुदामाजी के पास सब तरह से सजे
हुए हाथी, घोड़े, रथ, पालकी और छायादार बैलगाड़ियां हैं। बैठने के लिए
रत्नजटित सुन्दर सिंहासन है। प्रत्येक महल के आँगन में कामधेनु और कल्पतरु
हैं। उनके सारे महल सोने के बने हैं ! (और कहाँ तक कहा जाय) सुदामाजी के
दास-दासियों के आभूषण एवं वस्त्रों को देख कर देवराज इन्द्र के ऐश्वर्य भी
तुच्छ लगते हैं।
विशेष—इस कवित्त में वर्णनात्मक शैली का सौष्ठव विशेष रूप से द्रष्टव्य
है । कवि दीन दयालु श्रीकृष्ण द्वारा प्राप्त सुदामा के अपार धन-ऐश्वर्य का
वर्णन करने में पर्याप्त सफल रहा है। उसने अपने वर्णन को प्रभावोत्पादक बनाने
के लिए अनुप्रास अलंकार का अत्यन्त सार्थक प्रयोग किया है। उसका शब्द-