श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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महाप्रभुसे शिक्षा ग्रहण, महाप्रभुके द्वारा उन्हें वृन्दावन
जानेका आदेश वर्णित हुआ है। चैःचः अन्त्यलीलाके
प्रथम अध्यायमें श्रीरूपका पुनः गौड़देशमें आगमन,
अनुपमकी गङ्गा प्राप्ति, श्रीक्षेत्रमें हरिदास ठाकुरकी
कुटीमें आगमन, सपरिकर महाप्रभुसे मिलन, महाप्रभुके
द्वारा श्रीरूपके हस्ताक्षरकी प्रशंसा, महाप्रभुके हृदयके
भावोंके अनुरूप श्लोककी रचना, ललितमाधव और
विदग्धमाधवकी रचना आरम्भ, श्रीरायरामानन्दके द्वारा
प्रशंसा, महाप्रभुकी भक्तिशास्त्रोंके प्रकाशकी इच्छा एवं
श्रीरूपको वृन्दावन जानेकी आज्ञा, श्रीरूपका वृन्दावन
गमनका वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीला चौथे अध्यायमें
सनातन गोस्वामीका वृन्दावनमें जाकर श्रीरूपके साथ
मिलन, महाप्रभुकी आज्ञा पालनका वर्णन है।
'श्रीसनातन गोस्वामी'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 181वाँ
श्लोक)-
“या रूपमञ्जरीप्रेष्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी।
सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः॥ 181 ॥
साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः।
तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः॥ 182॥”
“पहले जो श्रीरूपमञ्जरीकी प्रिय रतिमञ्जरी थीं
और पण्डितगणोंके द्वारा नामभेदसे लवङ्गमञ्जरी कहलाती
थीं, वे ही अब श्रीगौराङ्गके अभिन्न तनु, सबके आराध्य
श्रीसनातन गोस्वामी हैं। मुनिरत्न सनातन भी कार्यवशतः
इनमें प्रविष्ट हुए हैं।” भक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें-
“श्रीसनातनेर गुरु विद्यावाचस्पति।
मध्ये मध्ये रामकेलि-ग्रामे ताँर स्थिति॥
सर्वशास्त्र अध्ययन करिला याँर ठाँइ।
यैछे गुरुभक्ति कहि, -ऐछे साध्य नाइ॥
यवन देखिले पिता प्रायश्चित करय।
हेन यवनेर सङ्ग निरन्तर हय॥
करि' मुखापेक्षा यवनेरे गृहे यान।
एहेतु आपना माने म्लेच्छेरे समान॥
इथे अति दीनहीन आपना मानय॥
यबे मग्न हन दैन्य-समुद्र मझारे।
म्लेच्छादिक हइते नीच माने आपनारे॥
नीचजाति-सङ्गे सदा नीच व्यवहार।
एइ हेतु “नीचजात्यादिक” उक्ति ताँर॥
विप्रराज हइया महाखेदयुक्त अन्तरे।
आपनाके विप्रज्ञान कभु नाहि करे॥”
भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें-
“सनातन गोस्वामीर ग्रन्थ-चतुष्टय।
टीकासह 'भागवतामृत'-खण्डद्वय॥
हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्प्रदर्शिनी'।
'वैष्णव-तोषणी'-नाम दशम-टिप्पणी॥
'लीलास्तव' दशम-चरित यारे कय।
सनातन गोस्वामीर एइ चतुष्टय॥”
“चौद्दशत सप्त छये सम्पूर्ण वृहत्।
पन्नरशत चारिशके लघुतोषणी सुसम्मत॥
(महाप्रभु) रामानन्दद्वारे कन्दर्पेर दर्प नाशे।
दामोदर-द्वारे नैरपेक्ष्य परकाशे॥
हरिदास-द्वारे सहिष्णुता जानाइल।
सनातन-रूप-द्वारे दैन्य प्रकाशिल॥”
“श्रीसनातनके गुरु विद्यावाचस्पति थे और वे
कभी-कभी रामकेलि ग्राममें ठहरते थे। इन्होंने (श्रीसनातनने)
उनसे सभी शास्त्रोंका अध्ययन किया था। इनकी
गुरुभक्तिका वर्णन नहीं किया जा सकता है।
यवनके दर्शन होनेपर प्रायश्चित करना होता है,
परन्तु ये तो सदा उनका सङ्ग करते थे। ये इन
नियमोंका उल्लङ्घन करके यवनोंके घर जाते थे, इस
कारण वे स्वयंको मलेच्छके समान मानते थे। ये
अपनेको अति दीन-हीन मानते थे और इस प्रकार ये
दैन्य-समुद्रमें डूब जाते थे। इनका कहना था कि मैं
म्लेच्छादिसे भी नीच हूँ, नीच जातिका सङ्ग करता हूँ
और मेरा व्यवहार भी सदा नीच है। इस प्रकार ये
स्वयंको नीच-जातिका कहते थे। ब्राह्मणोंमें सर्वश्रेष्ठ
होकर भी कभी स्वयंको ब्राह्मण नहीं मानते थे और
यवनोंकी सेवा करनेके कारण सदा इनके हृदयमें
महाखेद होता था।” तथा “सनातन गोस्वामीने चार
ग्रन्थोंकी रचना की। टीकासहित वृहद्भागवतामृत,
हरिभक्तिविलास-टीका 'दिक्दर्शिनी', 'वैष्णव-तोषणी' नामक
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दशम स्कन्धकी टीका और 'लीलास्तव' जिसमें दशम-चरित
(श्रीकृष्ण-चरित) कहा है।" 1476में वैष्णव-तोषणी और
1504में लघुतोषणी पूर्ण की। महाप्रभुने श्रीरायरामानन्दके
द्वारा कामदेवके अभिमानको तोड़ा, श्रीदामोदर पण्डितके
द्वारा निरपेक्षता प्रकाश की, श्रीहरिदासके द्वारा सहिष्णुता
दिखलायी और श्रीसनातन-श्रीरूपके द्वारा दैन्यका प्रकाश
किया।"
चैःचः मध्यलीला उन्नीसवें अध्यायमें इनका विषय
त्यागका चिन्तन, रोगी होनेके बहानेसे घरमें भागवत
आलोचना, बादशाहका इन्हें देखने आना, बादशाहके
द्वारा इन्हें बन्दी बनाना, बादशाहके साथ उड़ीसा युद्धमें
जाना अस्वीकार करना, गृहत्यागके समय श्रीरूपका
इनके पास कारागारमें पत्र भेजनेका वर्णन है। चैःचः
मध्यलीलाके बीसवें अध्यायमें इनकी कारागार रक्षकको
धन देकर मुक्ति, केवल एक सेवक ईशानके राज्यसे
पलायन और आठ स्वर्ण मुद्राएँ देकर डाकुओंसे रक्षा
और उनकी सहायतासे पर्वतको पार करना, ईशानको
विदाकर अकेले यात्रा, हाजिपुरमें बहनोई श्रीकान्तके
साथ मिलन और वहाँ रहना अस्वीकारकर केवल
उनसे एक कम्बल ग्रहण करना, वाराणसीमें आगमन
और चन्द्रशेखरके घर महाप्रभुसे मिलन, मुण्डन करवाकर
तपनमिश्रके द्वारा प्रदत्त पुराने वस्त्रका बहिर्वास और
कौपीन ग्रहण करना, महाराष्ट्र
ग्रहण करना, महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा और महाप्रभुके
द्वारा इन्हें शिक्षा प्रदान करना वर्णित है। (1) 'सम्बन्ध
ज्ञान'की शिक्षा चैःचः मध्यलीलाके बीसवें और इक्कीसवें
अध्यायमें वर्णित है। (2) अभिधेय-विचार-बाइसवें
अध्यायमें और (3) प्रयोजन-विचार-तेइसवें अध्यायमें;
महाप्रभुके द्वारा इन्हें भक्तिसिद्धान्तके ग्रन्थोंकी रचना,
लुप्ततीर्थोंका उद्धार, वैष्णवस्मृति सङ्कलनके द्वारा
वैष्णव-समाजका संस्थापन और भक्तिशास्त्र-प्रचारका
आदेश, आशीर्वादका वर्णन है। चौबीसवें अध्यायमें
इनको 'आत्माराम' श्लोककी पहले अठारह प्रकारसे
और बादमें इकसठ प्रकारसे अर्थ-व्याख्या, इनका
राजपयसे मथुरा गमन और सुबुद्धिरायके साथ मिलनका
वर्णन है। चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे अध्यायमें इनका
झारखण्डके जङ्गलोंसे होते हुए पुनः नीलाचल आगमन,
रथके पहियेके नीचे अपनी देहत्यागका सङ्कल्प, हरिदास
ठाकुरसे मिलन और सपरिकर महाप्रभुके दर्शन, अनुपमकी
गङ्गा-प्राप्ति और माहात्म्य श्रवण, इनके देहत्यागके
सङ्कल्पमें महाप्रभुकी अस्वीकृति, इनके द्वारा महाप्रभुके
प्रयोजनके अनुरूप साधनकी इच्छा, इनके द्वारा हरिदास
ठाकुरकी महिमाका वर्णन, मर्यादामार्गीय श्रीजगन्नाथजीके
सेवकोंको उनका स्पर्श न हो जाय, इस भयसे
तप्तबालूके ऊपरसे होकर महाप्रभुके पास जाना और
इनके दर्शनसे महाप्रभुकी प्रसन्नता, महाप्रभुसे जगदानन्दको
वृन्दावन जानेकी आज्ञा देनेकी प्रार्थना, महाप्रभुके द्वारा
इनकी स्तुति, इनकी अप्राकृत देहमें महाप्रभुकी प्रीति
और आलिङ्गन, उसके फलस्वरूप दिव्यदेहकी प्राप्ति,
एक वर्ष नीलाचलमें रहनेका महाप्रभुका आदेश, तत्पश्चात्
इन्हें वृन्दावन भेजना, श्रीरूपके साथ बहुत समयके बाद
वृन्दावनमें मिलन और महाप्रभुकी आज्ञापालनका वर्णन
है।
श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामीका श्रीपाट श्रीरामकेलि
('गुप्त वृन्दावन') - वर्तमान शहर इंग्रेंजबाजार (मालदह)
से प्राय आठ मील दक्षिणमें अवस्थित है। वहाँ
निम्नलिखित देखने योग्य स्थान हैं-
(1) श्रीमदनमोहन विग्रह-श्रीसनातन गोस्वामीके
द्वारा प्रतिष्ठित विग्रह। (2) केलिकदम्ब वृक्ष-जिसके
नीचे श्रीरूप और श्रीसनातनका महाप्रभुके साथ रात्रिमें
साक्षात्कार हुआ था और सपार्षद महाप्रभुने भक्तोंको
प्रेमामृतका दान किया था, ऐसा कहा जाता है। (3)
रूपसागर-श्रीरूप गोस्वामीप्रभुके द्वारा प्रतिष्ठित विशाल
सरोवर। इस सरोवरकी सफाई और श्रीरामकेलिपाटकी
लुप्तकीर्त्ति उद्धारके लिये मालदहमें 8 जून 1924 ई०
में 'रामकेलि-संस्कार-समिति' प्रतिष्ठित हुई थी ॥ 84 ॥
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(44क) श्रीजीव :-
ताँर मध्ये रूप-सनातन—बड़ शाखा।
अनुपम, जीव, राजेन्द्रादि—उपशाखा॥ 85॥
अनुवाद—इनके मध्य श्रीरूप और श्रीसनातन बड़ी
शाखा हैं तथा श्रीअनुपम, श्रीजीव, श्रीराजेन्द्रादि उपशाखा
हैं॥ 85॥
अनुभाष्य— 'श्रीजीव गोस्वामी'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
204 एवं 195 श्लोक)—
"विलासमञ्जरी कामलेखा च मौनमञ्जरी॥ 195ख॥"
"सुशीलः पण्डितः श्रीमान् जीवः श्रीवल्लभात्मजः। 204क।"
"विलासमञ्जरी श्रीवल्लभके सुशील एवं पण्डित
सुपुत्र श्रील जीव गोस्वामी हैं।"
श्रीजीव बाल्यकालसे श्रीमद्भागवतके अनुरागी थे।
बादमें नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभुके आनुगत्यमें
इन्होंने श्रीनवद्वीप-धामकी परिक्रमा और दर्शन किये।
इन्होंने काशीमें जाकर मधुसूदन वाचस्पतिसे सभी
शास्त्रोंका अध्ययन किया। उसके बाद वे वृन्दावनमें
आकर श्रीरूप और श्रीसनातनके आश्रित हुए।
(श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें)—
“श्रीजीवेर ग्रन्थ पञ्चविंशति विदित।
(1) 'हरिनाममृत व्याकरण' दिव्यरीत॥
(2) 'सूत्रमालिका' (3) 'धातुसंग्रह' सुप्रकार।
(4) 'कृष्णार्च्चादीपिका'-ग्रन्थ अति चमत्कार॥
(5) 'गोपालविरुदावली' (6) 'रसामृतशेष'।
(7) 'श्रीमाधव-महोत्सव' सर्वाशे विशेष॥
(8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष-ग्रन्थेर प्रचार।
(9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू अति चमत्कार॥
(10) 'गोपालतापनी-टीका' (11) टीका 'ब्रह्मसंहितार'।
(12) 'रसामृत-टीका' (13) 'श्रीउज्ज्वल-टीका' आर॥
(14) 'योगसारस्तवेर टीका'ते सुसङ्गति।
(15) 'अग्निपुराणस्थ श्रीगायत्री-भाष्य' तथि॥
(16) पद्मपुराणोक्त 'श्रीकृष्णरे पदचिह्न'।
(17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न' भिन्न॥
(18) 'गोपालचम्पू'-पूर्व-उत्तर-विभागेते।
(19-25) सप्त-सन्दर्भ विख्यात भागवत-रीति।
(क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म-कृष्ण-भक्ति-प्रीति)॥"
“श्रीजीव गोस्वामीके द्वारा रचित पच्चीस ग्रन्थ
विदित हैं।
(1) 'हरिनाममृत व्याकरण',
(2) 'सूत्रमालिका'
(3) 'धातुसंग्रह',
(4) 'कृष्णार्च्चादीपिका',
(5) 'गोपालविरुदावली',
(6) 'रसामृतशेष',
(7) 'श्रीमाधव-महोत्सव',
(8) 'श्रीसङ्कल्पकल्पवृक्ष',
(9) 'भावार्थसूचक'-चम्पू,
(10) 'गोपालतापनी-टीका',
(11) 'ब्रह्मसंहिताकी टीका',
(12) 'भक्तिरसामृतसिन्धु-टीका',
(13) 'श्रीउज्ज्वलनीलमणि-टीका',
(14) 'योगसार-स्तव-टीका',
(15) 'अग्निपुराणके श्रीगायत्रीका भाष्य',
(16) पद्मपुराणमें उक्त 'श्रीकृष्ण-पदचिह्न',
(17) 'श्रीराधिका-कर-पदस्थित चिह्न',
(18) 'गोपालचम्पू' पूर्व एवं उत्तर विभाग,
(19-25) सप्त-सन्दर्भ (क्रम-तत्त्व-भगवत्-परमात्म-
कृष्ण-भक्ति-प्रीति सन्दर्भ)।
इन्होंने श्रीरूप-सनातनादिके अप्रकट होनेके बाद
उत्कल-गौड़-माथुर-मण्डलके गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदायके
सर्वश्रेष्ठ आचार्यपदपर अधिष्ठित होकर सबको श्रीगौरसुन्दरके
द्वारा प्रचारित सत्यका प्रचारकर भजनमें लगाया।
बीच-बीचमें ये भक्तोंके साथ व्रजधामकी परिक्रमा करते
और मथुरामें विट्ठल-देवके दर्शन करने जाते। श्रीकविराज
गोस्वामीने इनके प्रकटकालमें श्रीचैतन्यचरितामृतकी रचना
की थी। इन्होंने कुछ समय बाद गौड़देशसे आये
श्रीनिवास, नरोत्तम और दुःखी कृष्णदासको क्रमशः
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‘आचार्य’, ‘ठाकुर’ और ‘श्यामानन्द’ नाम देकर सारे
गोस्वामी-ग्रन्थोंके साथ गौड़देशमें नामप्रेमके प्रचारके
लिये भेजा। इन्हें पहले ग्रन्थोंके अपहरणका समाचार
और बादमें उनके प्राप्त होनेका समाचार मिला। इन्होंने
श्रीनिवासके शिष्य रामचन्द्र सेनको और उनके छोटे
भाई गोविन्दको ‘कविराज’ नाम प्रदान किया। इनके
प्रकटकालमें श्रील जाह्नवा देवी कुछ भक्तोंके साथ
वृन्दावनमें पधारीं। गौड़देशसे आये हुए भक्तोंके ठहरने
और प्रसादकी इन्होंने व्यवस्था की। इनके शिष्य
श्रीकृष्णदास अधिकारीने अपने ग्रन्थमें श्रीरूप-सनातन-जीव
प्रभुओंके ग्रन्थोंकी तालिका दी है।
अनभिज्ञ प्राकृत सहजिया-सम्प्रदायमें श्रीजीव गोस्वामीके
विरुद्ध तीन अपवाद प्रचलित हैं, उनके द्वारा
श्रीकृष्ण-विमुखताके कारण हरि-गुरु-वैष्णव-विरोध-मूलमें
अवश्य ही उनके अपराध ही वर्धित हो रहे हैं।
(1) जड़-प्रतिष्ठाका इच्छुक एक दिग्विजयी पण्डित
निष्किञ्चन श्रीरूप-सनातनके पास आकर उन्हें शास्त्रार्थ
करनेकी चुनौती देने लगा। इस चुनौतीको अपने
भजनमें बाधा जानकर और तृणादपि सुनीच, अमानी-मानद
व्यवहार करते हुए उन्होंने बिना शास्त्रार्थके पराजय
स्वीकारकर उसे जयपत्र लिखकर दे दिया। वह उस
जयपत्रको लेकर श्रीजीव गोस्वामीके पास आया और
उनके गुरुवर्गको (श्रीरूप-सनातनको) मूर्ख कहकर
उनको भी जयपत्र लिखनेके लिये कहने लगा। यह
सुनकर जयपत्र लिखकर देनेके बदले श्रीजीव गोस्वामीने
उसे शास्त्रार्थमें ललकारकर उसे पराजितकर मौन कर
दिया। इस प्रकार गुरुकी निन्दा करनेवालेकी जिह्वाको
स्तम्भितकर गुरुदेवके पद-नखकी शोभाकी मर्यादा प्रदर्शित
करते हुए ‘गुरु-देवात्मा’के अनुरूप शिष्यके आदर्शका
प्रदर्शन किया। इस घटनाके विषयमें सहजिया लोग
कहते हैं,– “श्रीजीवके इस प्रकार आचरणसे तृणादपि
सुनीचता और मानद-धर्मके विरोधके कारण श्रीरूप
गोस्वामी प्रभुने इनकी तीव्र भर्त्सना की और इनका
परित्याग कर दिया। बादमें श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुके
कहनेपर उन्होंने श्रीजीवको पुनः ग्रहण किया।”
ये गुरु-वैष्णव विरोधी लोग श्रीकृष्णकी कृपासे
जिस दिन अपनेको गुरु-वैष्णवका दास समझेंगे, उस
दिन श्रीजीव गोस्वामीकी कृपा लाभकर वास्तविक
‘तृणादपि सुनीच’ और ‘मानद’ होकर हरिनाम-कीर्तनमें
अधिकारी होंगे।
(2) कोई-कोई अनभिज्ञ व्यक्ति कहते हैं– “श्रीकविराज
गोस्वामी प्रभुके ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’के रचना-सौन्दर्य और
अप्राकृत व्रजरस-माहात्म्य दर्शनसे अपनी प्रतिष्ठाकी
हानिकी आशङ्कासे श्रीजीव गोस्वामीके हृदयमें ईर्ष्या
उदित हुई और उन्होंने मूल ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’को
कुँएमें फेंक दिया। इसे सुनकर कविराज गोस्वामीने
अपने प्राण त्याग दिये। उनके मुकुन्द नामक एक
शिष्यने पहलेसे मूल पाण्डुलिपिकी एक नकल करके
रखी थी, इसलिये ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’ पुनः प्रकाशित
हुई, अन्यथा यह ग्रन्थ जगत्से लुप्त हो जाता।”
इस प्रकारकी वैष्णव-विद्वेषमूलक कल्पना-नितान्त
मिथ्या और असम्भव है।
(3) अन्य कोई-कोई इन्द्रिय-भोगी व्यभिचारी लोग
कहते हैं– “श्रीजीव प्रभु श्रीरूपगोस्वामीके मतानुयायी
व्रजगोपियोंके ‘पारकीय’ रसको स्वीकार न करके ‘स्वकीय’
रसका अनुमोदन करते हैं। इस कारण वे रसिक भक्त
नहीं थे, इसलिये उनका आदर्श ग्रहणीय नहीं है।”
प्रकटकालमें अपने अनुगत लोगोंके बीच किसी-किसी
भक्तकी ‘स्वकीय रस’ में रुचि देखकर उनके मङ्गलके
लिये उनके अधिकारको जानकर और बादमें अनधिकारी
व्यक्ति अप्राकृत परम-चमत्कारमय पारकीय-व्रजरसके
सौन्दर्य एवं महिमाको न बूझकर उसका अनुकरणकर
व्यभिचारमें प्रवृत्त होंगे, इसलिये वैष्णवाचार्य श्रीजीव
प्रभुने स्वकीयवादको स्वीकार किया। किन्तु इस कारणसे
उन्हें अप्राकृत पारकीय व्रजरसका विरोधी नहीं मानना
चाहिये, क्योंकि ये स्वयं श्रीरूपानुगवर हैं और साक्षात्
श्रीकविराज गोस्वामीके शिक्षागुरुवर्गके अन्यतम हैं॥85॥
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अमृतानुकणिका—जीव गोस्वामीने बारह कारण
दिखलाकर श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका स्वकीय भावमें
सम्बन्ध स्थापित किया। लौकिक रीतिके अनुसार उपपति
भाव बहुत ही निन्दनीय और अस्वर्गकर आदि है।
शास्त्रोंमें भी उपपतिको घृणित बतलाया गया है।
श्रीकृष्णने भी स्वयं कहा है कि कुलीन स्त्रियोंके लिये
जार पुरुषकी सेवा सब प्रकारसे निन्दनीय है, उनका
लोक-परलोक, दोनों ही बिगड़ता है। यह कुकर्म तो
अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक है, वर्तमानमें भी कष्टदायक
है और नरकका द्वार है। परीक्षित महाराजने भी
श्रीशुकदेव गोस्वामीसे प्रश्न किया कि श्रीकृष्ण तो
आप्तकाम हैं, तब किसलिये उन्होंने ऐसा निन्दनीय कर्म
किया? इसलिये यह निन्दनीय कर्म है। यहाँपर जानना
आवश्यक है कि यह श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं, अपितु
अन्य लोगोंके लिये निन्दनीय कहा गया है। श्रीकृष्णके
साथ गोपियोंका नित्य दाम्पत्य सम्बन्ध है, स्त्री-पतिका
सम्बन्ध है। जैसे श्रीब्रह्म-संहितामें यह बतलाया है—
“आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।”
ह्लादिनीशक्तिकी वृत्तिरूपा प्रेयसियाँ—श्रीकृष्णके स्वरूपसे
अभिन्न उन्हींकी कलाएँ हैं। शक्ति-शक्तिमान् अभेद हैं,
इसलिये वे उनकी ही अपनी शक्ति हैं। गौतमीय-तन्त्रके
अप्रकट-नित्यलीलाशीलन दशाक्षर मन्त्रकी व्याख्यामें भी
ऐसा कहा गया है—'अनेक जन्म सिद्धानां गोपिनां
पतिरेव वा' अर्थात् श्रीकृष्ण अनेक जन्मोंमें सिद्ध
होनेवाली गोपियोंके पति हैं। वे समस्त विश्व-ब्रह्माण्डके
पति हैं, गोपियोंके पतियोंके पति हैं, सबके पति हैं।
लक्ष्मियाँ कभी भी परकीया नहीं हैं। ये लक्ष्मियोंकी भी
लक्ष्मियाँ हैं, इनके लिये परकीया कैसे सम्भव है?
आदि बहुतसी बातें जीव गोस्वामीजीने कही हैं और
इसके अन्तमें उन्होंने लिख दिया (उज्ज्वलनीलमणि
1/21 की टीका)—
“स्वेच्छया लिखितं किञ्चित् किञ्चदत्र परेच्छया।
यत् पूर्वापरसम्बन्धं तत् पूर्वमपरं परम्॥”
“मैंने कुछ अपनी इच्छासे लिखा है और कुछ
दूसरोंके अनुरोध करनेपर लिखा है। जिसमें पूर्वापर
(पहले और पीछेका) सम्बन्ध है, उसे अपनी इच्छासे
लिखा है। जिसमें पूर्वापर सम्बन्ध नहीं है, उसको
दूसरोंकी इच्छासे लिखा है।” अर्थात् उन्होंने कहीं पति
लिखा है और कहीं उपपति—इसमें सङ्गति नहीं है,
इसलिये यह उनका विचार नहीं है।
यदि श्रीजीव गोस्वामी रूपानुग नहीं होते, तो वे
श्रीरूप गोस्वामी रचित श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु और
उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना क्यों
करते?
श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने भी कहा है कि
श्रीजीव गोस्वामी कभी भी स्वकीयाके पक्षमें अपनी राय
नहीं दे सकते हैं। उन्होंने स्वयंकी इच्छासे नहीं, अपितु
दूसरोंकी इच्छासे ही ऐसी व्याख्या की है। इसलिये
उन्होंने अपनी व्याख्याके उपसंहारमें स्वयं ही इस
बातको स्वीकार किया है। उनकी अपनी इच्छा क्या
है? जो श्रीरूप गोस्वामी और जो श्रीसनातन गोस्वामीकी
इच्छा है। दूसरोंकी इच्छासे उन्होंने स्वकीयाका प्रतिपादन
किया है जिससे लौकिक दृष्टिसे अनाधिकारी व्यक्ति
उनमें प्रवेश न करें। विशेषकर महाप्रभुके चरणाश्रित
अन्तरङ्ग भक्तोंके लिये स्वकीयाके पक्षमें व्याख्या कदापि
ग्राह्य नहीं हो सकती।
जीव गोस्वामीके आशयको समझना बहुत कठिन
है। श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीश्यामानन्द
प्रभु—ये तीनों ही श्रीजीव गोस्वामीके शिक्षा-शिष्य हैं
तथा पारकीया भावको माननेवाले हैं। इसलिये इन
शिष्योंके विचारोंसे समझा जायेगा कि श्रीजीव गोस्वामीने
उन्हें जो शिक्षा दी, उसीका उन्होंने प्रचार किया।
श्रीनिवासाचार्य प्रभुकी ज्येष्ठ कन्या हेमलता ठाकुराणी हैं
और उनके शिष्य यदुनन्दनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ
'कर्णानन्द'के चतुर्थ निर्यासमें लिखा है—
“एइ सब निर्द्धार करि श्रीदासगोसाञि।
नियम करि कुण्डतीरे बसिला तथाइ॥
दसवाँ अध्याय | 71
[ 10/85-89 ]
सङ्गे कृष्णदास आर गोसाञि लोकनाथ।
दिवानिशि कृष्ण कथा सदा अविरत॥
हेनइ समये ग्रन्थ गोपालचम्पू नाम।
सबे मेलि आस्वादये सदा अविराम॥
आस्वादिया चित्ते अति आनन्द उल्लास।
अत्यन्त दुरूह किवा श्लोकेर अभिलाष॥
बाह्यार्थे बुझाय ताहा स्वकीय बलिया।
भितरेर अर्थ मात्र केवल परकीया॥
श्रीजीवेरे गम्भीर हृदय ना बुझिया।
बहिलोक बाखानये स्वकीया बलिया॥
ग्रन्थेर मर्मार्थ बुझाय येन परकीया।
आनन्दे निमग्न सबे ताहा आस्वादिया॥
चम्पू ग्रन्थ मर्म जानि गोसाञि कविराज।
नित्यलीला स्थापन लिखिला ग्रन्थ माझ॥
श्रीगोपालचम्पू नामे ग्रन्थ महाशूर।
नित्यलीला स्थापन याते व्रजरसपूर॥
रसपूर शब्दे कहि नित्य परकीया।
हृदये धरह तुमि यतन कोरिया॥"
महाप्रभुकी विचारधारा जिसका रूप गोस्वामीने
भक्तिरसामृतसिन्धु और उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंमें
वर्णन किया है, उनका विचार करते हुए श्रीरघुनाथदास
गोस्वामी कुण्डके तटपर रहकर नियमपूर्वक भजन
करते थे। उनके साथमें श्रीकृष्णदास कविराज और
श्रीलोकनाथ गोस्वामी रहते थे। श्रीकृष्णकथामें और
श्रीमद्भागवतके अनुशीलनमें इनका सब समय व्यतीत
होता था। उसी समय गोपालचम्पू ग्रन्थको पाकर सभी
मिलकर उसका निरन्तर आस्वादन करने लगे। श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीने भी उस ग्रन्थको देखा और उसका आस्वादन
किया। यदि यह स्वकीय भावका ग्रन्थ होता, तो दास
गोस्वामी कभी भी उसे आँख बन्द करके भी नहीं
देखते। यह उस ग्रन्थके परकीया भावका होनेका
उज्ज्वल प्रमाण है। और यदुनन्दनदास ठाकुर भी
असत्य बात नहीं कह सकते, क्योंकि वे हेमलता
ठाकुराणीके शिष्य हैं। ग्रन्थको पढ़कर सभीको बहुत
उल्लास हुआ। इसके श्लोकोंके गूढ़ अभिप्राय बड़ी
कठिनतासे समझ आनेवाले हैं। ग्रन्थका इसीमें सौन्दर्य
और माधुर्य है कि ऊपरसे देखनेमें एक भाव है और
भीतरमें अन्य भाव है। ऊपरसे देखनेमें स्वकीय है,
परन्तु भीतरसे केवल परकीया है। जीव गोस्वामीके
हृदयके गम्भीर भावोंको समझ नहीं पानेके कारण
विजातीय लोग इस ग्रन्थको स्वकीया भावका ग्रन्थ
बतलाते हैं। ग्रन्थका जो मर्मार्थ है, वह परकीया है
और सभी उसीका बड़े आनन्दसे आस्वादन करते।
श्रीगोपालचम्पू ग्रन्थके वास्तविक भावको श्रीकृष्णराज
गोस्वामीने भली-भाँति जानकर अपने ग्रन्थमें नित्यलीलाके
रूपमें लिखा है और यह व्रजरससे परिपूर्ण है; 'रसपूर'
का अर्थ है-नित्य परकीया, इसे हृदयमें यत्नपूर्वक
धारण करो॥ 85॥
श्रीरूप-सनातन-शाखाका विस्तार और कार्य :-
मालीर इच्छाय शाखा बहुत बाड़िल।
बाड़िया पश्चिमदेशे सब आच्छादिल॥ 86॥
समस्त भारतका उद्धार :-
आ-सिन्धुनदी-तीर आर हिमालय।
वृन्दावन-मथुरादि यत तीर्थ हय॥ 87॥
सभीकी प्रेमोन्मत्तता :-
दुइ शाखार प्रेमफले सकल भासिल।
प्रेमफलास्वादे लोक उन्मत्त हइल॥ 88॥
अनुवाद-मालीकी इच्छासे शाखा बहुत बढ़ गयी
और इसने पश्चिम (भारत) देशको आच्छादित कर
लिया। सिन्धुनदीके तटसे लेकर हिमालय और
वृन्दावन-मथुरादि जितने तीर्थ हैं, सभी दोनों शाखाओंके
प्रेमफलके कारण प्रेममें डूब गये। प्रेमफलका आस्वादन
करके लोग उन्मत्त हो गये॥ 86-88॥
(1) भक्ति-आचरणका प्रवर्तन :-
पश्चिमेर लोक सब मूढ़ अनाचार।
ताहाँ प्रचारिल दुँहे भक्ति-सदाचार॥ 89॥
अनुवाद-पश्चिम देशके लोग धर्मके विषयमें मूर्ख
72 | श्रीचैतन्यचरितामृत
और आचरण-विहीन थे। इन दो भाइयों (श्रीरूप और
श्रीसनातन) ने भक्ति-सदाचारका प्रचार किया॥ 89 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-पश्चिमप्रदेशके लोग यवनोंके
संसर्गसे कुछ कर्त्तव्य-विमूढ़ और बङ्गालदेशके सदाचारकी
तुलनामें अनेक लोग आचार-रहित थे। वे उस समय
मुसलमानादिके संसर्गसे कुछ अधिक अनाचारी हो गये
थे। श्रीरूप-सनातनकी कृपासे उनकी सदाचारमें प्रवृत्ति
हुई॥ 89 ॥
(2) लुप्त तीर्थोंका उद्धार और
(3) श्रीमूर्त्ति-पूजा-प्रचार :-
शास्त्रदृष्टे कैल लुप्ततीर्थेर उद्धार।
वृन्दावने कैल श्रीमूर्त्ति-पूजार प्रचार ॥ 90 ॥
अनुवाद-शास्त्रके प्रमाणके आधारपर उन्होंने
व्रजमण्डलके लुप्त तीर्थोंका उद्धार किया और वृन्दावनमें
श्रीमूर्तिकी पूजाका प्रचार किया॥ 90 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'लुप्ततीर्थ' - श्रीराधाकुण्डादि
लुप्ततीर्थ। 'श्रीमूर्त्ति'- श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्द, श्रीगोपीनाथादि
सात मूर्तियोंकी पूजाका प्रचार किया॥ 90॥
(45) श्रीरघुनाथदास :-
महाप्रभुर प्रिय भृत्य - रघुनाथदास ।
सर्व त्यजि' कैल प्रभुर पदतले वास ॥ 91 ॥
अनुवाद-महाप्रभुके प्रिय सेवक श्रीरघुनाथदास हैं,
जिन्होंने सब कुछ त्यागकर उनके चरणोंमें वास
किया ॥ 92 ॥
अनुभाष्य-'श्रीरघुनाथदास' - 1416 शकाब्दके लगभग
हुगली जिलामें 'श्रीकृष्णपुर' ग्राममें कायस्थकुलमें इनका
आविर्भाव हुआ था। इनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदार
और इनके ताऊ श्रीहिरण्य मजूमदार थे। सप्तग्रामसे
श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुकी प्रकटभूमि 'श्रीकृष्णपुर'
एक मीलसे कुछ अधिक और त्रिशबिघा-स्टेशनसे प्राय
डेढ़ मीलकी दूरीपर होगी। इस स्थानपर श्रील दासगोस्वामी
प्रभुके पूर्वाश्रमके पिता श्रीगोवर्धन दासके द्वारा प्रतिष्ठित
प्रसिद्ध श्रीराधागोविन्दके श्रीविग्रह विराजमान हैं। मन्दिरके
सामने एक विस्तृत प्राङ्गण है, कोई भी नाट्य मन्दिर
नहीं है, केवल एक जगमोहन* है।'
कोलकाता सिमला-निवासी श्रीयुक्त हरिचरण घोषने
[टीका लिखनेके] एक वर्ष पूर्व मन्दिरका संस्कार
(उद्धार) किया था। मन्दिरके प्राङ्गणके चारों ओर
दीवारें हैं। जिस कक्षमें श्रीविग्रह विराजमान हैं, उसके
साथवाले एक छोटेसे कक्षमें पत्थरसे बने आसनको
श्रील रघुनाथदास गोस्वामी प्रभुका 'भजनासन' बतलाते
हैं। यह आसन बहुत ऊँचा नहीं है (यह डेढ़ हाथ
लम्बा, एक हाथ चौड़ा और पौना हाथ ऊँचा है)। ऐसा
प्रसिद्ध है कि इस आसनपर बैठकर श्रील दास गोस्वामी
प्रभु भजन करते थे। मन्दिरके पास बहुत ही कम
पानीवाली स्रोतहीन सरस्वती नदी विराजमान है।
श्रील दास गोस्वामीके पिता वैष्णवप्राय थे और वे
अत्यन्त धनी थे। यदुनन्दन आचार्य श्रील दास गोस्वामीके
दीक्षा गुरु थे। गृहस्थ आश्रममें प्रवेश करनेके बहुत
अल्प समय बाद ही ये श्रीमन्महाप्रभुके आश्रयकी प्रार्थना
करने लगे। कुछ दिन बाद ही 1439 शकाब्दमें सुयोग
पाकर गृह त्यागकर पुरुषोत्तम क्षेत्र आये। वहाँ श्रीचैतन्यदेवके
सुशीतल चरण लाभकर श्रीस्वरूप दामोदरके आनुगत्यमें
रहने लगे। सोलह वर्ष नीलाचलमें रहनेपर महाप्रभुके
अप्रकट होनेपर ये श्रीवृन्दावन आकर श्रीरूप-सनातनके
पास रहने लगे। श्रीभक्तिरत्नाकरकी प्रथम तरङ्गमें-
“रघुनाथदास गोस्वामीर् ग्रन्थत्रय।
'स्तवमाला' नाम 'स्तवावली' यारे कय॥
'श्रीदान-चरित', 'मुक्ताचरित' मधुर।”
“श्रीरघुनाथ गोस्वामीके तीन ग्रन्थ हैं-'स्तवमाला'
या 'स्तवावली', 'श्रीदान-चरित' और 'मुक्ताचरित'।”
*विग्रहके सिंहासनके सामने जो कक्ष होता है, उसे
नाट्य मन्दिर कहते हैं। नाट्य मन्दिरके बाद जो कक्ष
होता है, उसे जगमोहन कहते हैं।
[ 10/91-97
इनकी दीर्घ आयु थी। श्रीनिवासाचार्यने वृन्दावनसे
ग्रन्थादि लेकर पुनः लौटनेसे पूर्व श्रीदास गोस्वामीकी
कृपा लाभ की थी। जैसे भक्तिरत्नाकर छठी तरङ्गमें—
“अतिक्षीण शरीर, दुर्बल क्षणे क्षणे।
करये भक्षण किछु दुइ चारिदिने॥
दिवानिशि ना जानये श्रीनाम-ग्रहणे।
नेत्रे निद्रा नाइ, अश्रुधारा दु'नयने॥
श्रीनिवास दास गोस्वामीर् सन्दर्शने।
आपना मानये धन्य पड़िला चरणे॥
श्रीदास गोस्वामी श्रीनिवासे आलिङ्गिला।
श्रीनिवास श्रीगौड़ गमन निवे दिला॥
शुनि' श्रीगोस्वामी मुखे अनुमति दिल।”
“इनका शरीर धीरे-धीरे दुर्बल होता जा रहा था।
दो-चार दिनमें ये कुछ खाते थे और दिन-रात श्रीनाम
जप करते थे। इनके नेत्रोंमें निद्रा नहीं होती थी, अपितु
सदा अश्रुधारा बहती रहती थी। श्रीनिवासने श्रीदास
गोस्वामीके दर्शन करके अपनेको धन्य माना और
उनके चरणोंमें गिर गये। श्रीदास गोस्वामीने उनका
आलिङ्गन किया। श्रीनिवासने उनसे गौड़देश जानेके
लिये आज्ञा माँगी। यह सुनकर श्रीदास गोस्वामीने उन्हें
जानेकी अनुमति प्रदान की।” यह घटना 1512 शकाब्दके
बाद की है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 186वाँ श्लोक)—
“दासश्रीरघुनाथस्य पूर्वाख्या रसमञ्जरी।
अमुं केचित् प्रभाषन्ते श्रीमतीं रतिमञ्जरीम्।
भानुमत्याख्यया केचिदाहुस्तं नामभेदतः॥186॥”
“श्रीरघुनाथदास गोस्वामीका पूर्वनाम श्रीरसमञ्जरी
है। उन्हें कोई-कोई श्रीरतिमञ्जरी भी कहते हैं।
नामभेदसे कोई-कोई उन्हें भानुमति भी कहते हैं॥”91॥
श्रीस्वरूपके आनुगत्यमें श्रीरघुनाथकी श्रीगौरसेवा :—
प्रभु समर्पिल ताँरे स्वरूपेर हाते।
प्रभुर गुप्तसेवा कैल स्वरूपेर साथे॥92॥
श्रीगौर और श्रीस्वरूपके अप्रकटपर वृन्दावन आगमन :—
षोड़श वत्सर कैल अन्तरङ्ग-सेवन।
स्वरूपेर अन्तर्धाने आइला वृन्दावन॥93॥
अनुवाद—महाप्रभुने इन्हें श्रीस्वरूप दामोदरके हाथोंमें
सौंप दिया। ये श्रीस्वरूप दामोदरके साथ महाप्रभुकी गुप्त
रूपसे (अन्तरङ्ग) सेवा करते थे। श्रीदास गोस्वामीने
सोलह वर्षतक अन्तरङ्ग सेवा की और श्रीस्वरूपके
अन्तर्धान होनेपर वृन्दावन आ गये॥92-93॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'गुप्तसेवा'—जिन सब सेवाओंमें
बाहरके लोगोंका अधिकार नहीं है। महाप्रभुका स्नान,
भोजन, विश्राम, कीर्तनादिके समय जो सब अभीष्ट
प्रियसेवाका प्रयोजन है, उसे ही 'अन्तरङ्ग-सेवा' कहा
जाता है॥93॥
वृन्दावने दुइ भाइर चरण देखिया।
गोवर्धने त्यजिब देह भृगुपात करिया॥94॥
अनुवाद—वृन्दावन आकर ये (श्रीरूप-सनातन) दोनों
भाइयोंके चरणोंमें उपस्थित हुए। (महाप्रभु और श्रीस्वरूपके
विरहमें इतने दुःखी थे कि) इन्होंने गोवर्धन पर्वतसे
कूदकर प्राण त्यागनेका निश्चय किया था॥94॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'भृगुपात करिया'—पर्वतके शिखरसे
कूदना॥94॥
श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन :—
एइ त' निश्चय करि' आइल वृन्दावने।
आसि' रूप-सनातनरे वन्दिल चरणे॥95॥
श्रीरूप-सनातनके तीसरे भाई :—
तबे दुइ भाइ ताँरे मरिते ना दिल।
निज तृतीय भाइ करि' निकटे राखिल॥96॥
अनुवाद—यह निश्चय करके ये वृन्दावन आये थे।
वृन्दावन आकर इन्होंने श्रीरूप-सनातनके चरणोंमें गिरकर
वन्दना की। तब उन दोनों भाइयोंने इन्हें ऐसे प्राण
त्यागनेसे निषेध किया और अपने तीसरे भाईके समान
इन्हें अपने पास प्रेमसे रखा॥95-96॥
महाप्रभुर लीला यत बाहिर-अन्तर।
दुइ भाइ ताँर मुखे सुने निरन्तर॥97॥
74 | श्रीचैतन्यचरितामृत
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक लिप्यन्तरण दिया गया है:
10/97-104 ]
उनके दैनिक कृत्य :-
अन्न-जल त्याग कैल अन्य-कथन।
पल दुइ-तिन माठा करेन भक्षण ॥ 98 ॥
सहस्र दण्डवत् करे, लय लक्ष नाम।
दुइ सहस्र वैष्णवेरे नित्य परणाम ॥ 99 ॥
अनुवाद—महाप्रभुकी जो भी बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग
लीलाएँ थीं, दोनों भाई इनके मुखसे निरन्तर सुनते थे।
श्रीदास गोस्वामीने अन्न-जल और भगवद्-कथाके अतिरिक्त
अन्य किसी चर्चाका त्याग कर दिया। दो-तीन पलके
समयमें थोड़ासा मट्ठा पीते थे। श्रीदास गोस्वामी प्रतिदिन
(लीला-स्थलियोंको) एक हजार दण्डवत् प्रणाम करते
थे और वैष्णवोंको दो हजार प्रणाम निवेदन करते
थे ॥ 97-99 ॥
अनुभाष्य—'माठा'—मट्ठा ॥ 98 ॥
रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस-सेवन।
प्रहरेक महाप्रभुर चरित्र-कथन ॥ 100 ॥
तिन सन्ध्या राधाकुण्डे अपतित स्नान।
व्रजवासी वैष्णवेरे आलिङ्गन दान ॥ 101 ॥
सार्द्ध सप्त प्रहर करे भक्तिर साधने।
चारि दण्ड निद्रा, सेइ नहे कोनदिने ॥ 102 ॥
अनुवाद—वे रात-दिन श्रीराधा-कृष्णकी मानसिक
सेवा करते थे। एक प्रहर महाप्रभुके चरित्रकी कथा
करते थे। वे नियमपूर्वक दिनमें तीन बार श्रीराधाकुण्डमें
स्नान करते थे और व्रजवासियोंको अपना आलिङ्गन
प्रदानकर उनका सम्मान करते थे। दिनमें साढ़े सात
प्रहर भक्ति-साधनमें रत रहते थे और केवल चार
दण्ड* निद्रा लेते थे, किसी दिन तो वे सोते भी नहीं
थे ॥ 100-102 ॥
*एक प्रहर = तीन घंटे
साठ दण्ड = एक दिन
एक दण्ड = चौबीस मिनट
अमृतप्रवाह भाष्य—'रात्रिदिने राधाकृष्णेर मानस-
सेवन'—हरिनामेके (कीर्तनके) साथ अष्टकालीन सेवाका
मनन ॥ 100 ॥
श्रीरूप-रघुनाथके प्रति ग्रन्थकारका नित्यदासाभिमान :-
ताँहार साधन-रीति शुनिते चमत्कार।
सेइ रूप-रघुनाथ प्रभु ये आमार ॥ 103 ॥
अनुवाद—उनकी साधनकी रीति सुननेसे हृदयमें
चमत्कार होता है। वे ही श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामी मेरे
(कृष्णदास कविराजके) प्रभु अर्थात् शिक्षा-गुरु हैं॥ 103 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी प्रभु श्रील
दासगोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामीको 'अपना प्रभु' मानते
थे और उन्होंने प्रत्येक अध्यायके अन्तमें
'श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे
कृष्णदास ॥' लिखा है। कोई-कोई 'रघुनाथ' शब्दसे
श्रीरघुनाथभट्टको कहना चाहते हैं और वे उनको
श्रीकविराजके पाञ्चरात्रिक दीक्षागुरु कहना चाहते हैं,
परन्तु इस बातका कोई प्रमाण नहीं है। कविराज-
शाखा-गुरुपरम्परामें श्रीरघुनाथभट्टका उनके दीक्षागुरुके
रूपमें जो उल्लेख देखा जाता है, उसकी सत्यताका
कोई विशेष परिचय नहीं मिलता है॥ 103 ॥
इँहा सबार यैछे हैल प्रभुर मिलन।
आगे विस्तारिया ताहा करिब वर्णन ॥ 104 ॥
अनुवाद—ये सब अर्थात् श्रीरूप-सनातन-रघुनाथ
गोस्वामी महाप्रभुसे कैसे मिले, इसका मैं बादमें विस्तारसे
वर्णन करूँगा ॥ 104 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—श्रीरघुनाथ गोस्वामीके साथ
महाप्रभुके मिलनका प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीला छठे
अध्यायमें द्रष्टव्य है ॥ 104 ॥
अनुभाष्य—श्रीरूप गोस्वामीके साथ महाप्रभुका मिलन
चैःचः मध्यलीला 19/45 संख्या, श्रीसनातनके साथ
महाप्रभुका मिलन चैःचः मध्यलीला 20/51 संख्या और
दसवाँ अध्याय | 75
[ 10/104-105
श्रीरघुनाथके साथ महाप्रभुका मिलन चैःचः अन्त्यलीला
6/191 संख्या द्रष्टव्य हैं॥104॥
(46) श्रीगोपाल भट्ट-शाखा :-
श्रीगोपालभट्ट—एक शाखा सर्वोत्तम।
रूप-सनातन-सङ्गे याँर प्रेम-आलापन ॥105॥
अनुवाद—श्रीगोपालभट्ट एक सर्वोत्तम शाखा हैं।
उनका श्रीरूप-सनातनके साथ प्रेमालाप होता था॥105॥
अनुभाष्य—'श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी'—ये श्रीरङ्गक्षेत्रके
प्रवासी श्रीव्यैङ्कटभट्टके पुत्र और (पहले रामानुजीय और
बादमें गौड़ीय) श्रीप्रबोधानन्दके शिष्य थे। 1433 शकाब्दमें
महाप्रभुके श्रीरङ्गक्षेत्रमें 'श्री'-सम्प्रदायी व्यैङ्कटभट्टके घरपर
चातुर्मास्य व्रतके उपलक्षमें अवस्थान करनेके समय
इन्होंने महाप्रभुकी तन-मन-प्राणसे सेवा की। इन्होंने
अपने चाचा त्रिदण्डी श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वतीसे दीक्षा
ग्रहण की, जैसा हरिभक्तिविलास, प्रथम विलास, द्वितीय
श्लोक—
“भक्तेर्विलासांश्चिनुते प्रबोधानन्दस्य शिष्यो भगवत्प्रियस्य।
गोपालभट्टो रघुनाथदासं सन्तोषयन् रूप-सनातनौ च॥”
“भगवान् श्रीचैतन्यदेवके प्रिय परिकर श्रीप्रबोधानन्दके
शिष्य श्रीगोपालभट्ट श्रीरूप-सनातन और श्रीरघुनाथदास
गोस्वामीको सन्तुष्ट करनेके लिये श्रीहरिभक्तिविलास
नामक ग्रन्थका प्रणयन कर रहे हैं।” भक्तिरत्नाकरकी
प्रथम तरङ्गमें—
“गोपालेर माता पिता महाभाग्यवान्।
श्रीचैतन्यपदे ये सौंपिल मनःप्राण॥163॥
वृन्दावने याइते पुत्रेर आज्ञा दिया।
दोंहे सङ्गोपन हैला प्रभु सोडरिया॥164॥
कतदिने गोपाल गेलेन वृन्दावन।
रूप-सनातन सङ्गे हइल मिलन॥165॥”
(नीलाचले प्रभुके) “लिखिलेन पत्रीते श्रीरूप-सनातन।
गोपालभट्टेरे वृन्दावने आगमन॥180॥”
(प्रभु) “लिखये पत्रीते प्रिय रूप-सनातने।
पाइल आनन्द गोपालेर आगमने॥189॥
निज-भ्राता-सम गोपाले जानिबे।190क।”
“गोपालेर नामे श्रीगोस्वामी सनातन।
करिल श्रीहरिभक्तिविलास-वर्णन॥198॥
श्रीरूपगोस्वामी भट्टे प्राणसम जाने।
श्रीराधारमण-सेवा कराइल ताने॥200॥”
(कविराज गोस्वामीके)
“श्रीगोपाल भट्ट हृष्ट हैया आज्ञा दिल।
ग्रन्थे निज-प्रसङ्ग वर्णिते निषेधिल॥222॥
केने निषेधिल इहा के बुझिते पारे।
निरन्तर अति दीन माने आपनारे॥223॥
कविराज ताँर आज्ञा नारे लङ्घिवारे।
नाम-मात्र लिखे, अन्य ना करे प्रचारे॥224॥”
“प्राचीन वैष्णव-मुखे ए-सब शुनिल॥225॥”
—(ग्रन्थकार घनश्यामदासेर उक्ति)।
“श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके माता-पिता महाभाग्यवान्
हैं, जिन्होंने अपने मन-प्राण श्रीचैतन्यदेवके चरणोंमें
समर्पित कर दिये हैं। उन्होंने अपने पुत्रको वृन्दावन
जानेकी अनुमति प्रदान की और महाप्रभुका स्मरण
करते हुए अपनी देहका त्याग किया। वृन्दावन आनेके
कुछ दिन बाद इनका श्रीरूप-सनातनके साथ मिलन
हुआ। श्रीरूप-सनातनने इनके वृन्दावन आनेका समाचार
पत्रके द्वारा महाप्रभुको नीलाचलमें भेजा। यह समाचार
पाकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने
श्रीरूप-सनातनको इनको अपने छोटे भाईके समान प्रेम
करनेके लिये कहा। श्रीसनातनने श्रीहरिभक्तिविलास
ग्रन्थका सङ्कलनकर प्रेमवश इनके नामसे उसे प्रकाशित
किया। श्रीरूप गोस्वामी भी इन्हें अपने प्राणोंके समान
मानते थे। श्रीरूप-सनातनके आदेशसे इन्होंने श्रीराधारमणके
विग्रहकी स्थापना की। श्रीकविराज गोस्वामीने जब
श्रीचैतन्यचरितामृतके रचनाके लिये सभी वैष्णवोंसे आज्ञा
ली, तो इन्होंने उस ग्रन्थमें अपने विषयमें वर्णन
करनेका निषेध किया। इन्होंने क्यों निषेध किया, इसे
कौन समझ सकता है? ये स्वयंको सदा अति दीन
मानते थे। श्रीकविराजने इनकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं
किया और केवल इनका नाममात्र लिखा तथा अन्य
कोई विवरण नहीं दिया। ग्रन्थकार घनश्यामदासने कहा
कि यह सब उन्होंने पुराने वैष्णवोंके मुखसे सुना है।”
76 | श्रीचैतन्यचरितामृत
10/105-106 ]
षट्सन्दर्भमे तत्त्व-सन्दर्भके आरम्भमें श्रीजीव गोस्वामीने
श्रीरूप-सनातनको प्रणामके बाद लिखा है-
“कोऽपि तद्बान्धवो भट्टो दक्षिण-द्विज-वंशजः।
विविच्य व्यलिखद्-ग्रन्थं लिखिताद्वृद्धवैष्णवैः॥
तस्याद्यं ग्रन्थनालेखं क्रान्त-व्युत्क्रान्त-खण्डितम्।
पर्यालोच्याथ पर्यायं कृत्वा लिखति जीवकः॥”
“श्रीमध्व-श्रीरामानुज-श्रीधरस्वामी आदि प्राचीन
वैष्णवाचार्योके द्वारा लिखित ग्रन्थोंके विचारादिका सङ्कलन
करके श्रीरूप-सनातन, इन दोनों प्रभुओंके प्रिय सुहृद
ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न दक्षिणदेशके वासी श्रीगोपालभट्टने
एक ग्रन्थ लिखा था, वह कहीं क्रमसे था और उसमें
कहीं क्रम भङ्ग हुआ था तथा कहीं-कहीं खण्ड-खण्ड
करके लिखा हुआ था, उसे एक क्षुद्र जीव, मैंने,
पर्यालोचना करके क्रमानुसार यथायथ लिखा है।”
‘भगवत्’ आदि अन्यान्य सन्दर्भोंके आरम्भमें भी इस
प्रकार वर्णन है। श्रीगोपालभट्ट ‘सत्क्रियासार-दीपिका’ के
रचयिता, ‘हरिभक्तिविलास’ के सम्पादक और षट्सन्दर्भके
पूर्व लेखक हैं। भक्तिरत्नाकर प्रथम तरङ्गमें—
“करिलेन कृष्णकर्णामृतेर टिप्पणी।
वैष्णवेर परम आनन्द याहा शुनि ॥ 228 ॥”
“इन्होंने कृष्णकर्णामृत ग्रन्थकी टिप्पणी लिखी है,
जिसे श्रवण करके वैष्णव परमानन्दित होते हैं।” इन्होंने
श्रीराधारमण-विग्रहकी स्थापना की। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
184वाँ श्लोक)—
“अनङ्गमञ्जरी यासीत् साद्य गोपालभट्टकः।
भट्टगोस्वामिनं केचिदाहुः श्रीगुणमञ्जरी ॥ 184 ॥”
“श्रीअनङ्गमञ्जरी ही अब श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी हैं।
कोई-कोई इन्हें गुणमञ्जरी भी कहते हैं।” श्रीनिवासाचार्य
और गोपीनाथ पुजारी इनके शिष्य हैं॥105॥
(47) शङ्करारण्य-शाखा, (47क) मुकुन्द,
(47ख) काशीनाथ, (47ग) रुद्र :-
शङ्करारण्य-आचार्य-वृक्षेर एक शाखा।
मुकुन्द, काशीनाथ, रुद्र,-उपशाखा लेखा ॥ 106 ॥
अनुवाद—शङ्करारण्य-आचार्य वृक्षकी एक और
शाखा हैं और मुकुन्द, काशीनाथ और रुद्र उनकी
उपशाखा हैं॥ 106 ॥
अनुभाष्य- 'शङ्करारण्य'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 60वाँ
श्लोक)—
“अस्याग्रजस्त्वकृतदारपरिग्रहः सन् सङ्कर्षणः
स भगवान् भुवि विश्वरूपः।
स्वीयं महः किल पुरीश्वरमापयित्वा
पूर्वं परिव्रजित एव तिरोबभूव ॥” इति ॥ 60 ॥
“श्रीगौराङ्गके बड़े भाई, जो विश्वरूपके नामसे
विख्यात हैं, वे भगवान् सङ्कर्षण हैं। वे विवाहसे पूर्व
ही संन्यास ग्रहण करके अपने तेजको श्रीईश्वरपुरीमें
स्थापित करके अन्तर्हित हो गये थे।” ये 1432
शकाब्दमें शोलापुर जिलाके अन्तर्गत पाण्डवपुर-तीर्थमें
अप्रकट हुए थे-चैःचः मध्यलीला, 9/299-300 संख्या
द्रष्टव्य हैं।
'मुकुन्द (मुकुन्दसञ्जय)'-इनके घरमें श्रीविश्वम्भरने
पाठशाला खोली थी और इनके पुत्र पुरुषोत्तम महाप्रभुके
छात्र थे।
'काशीनाथ'-ये श्रीविश्वम्भरके विवाहका संयोग
करवानेवाले ब्राह्मण पण्डित थे। इन्होंने राजपण्डित
सनातनको उनकी कन्या विष्णुप्रियादेवीके साथ महाप्रभुके
विवाहका परामर्श दिया था। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
50वाँ श्लोक)—
“यश्च सत्राजिता विप्रः प्रहितो माधवं प्रति।
सत्योद्वाहाय कुलकः श्रीकाशीनाथ एव सः ॥ 50 ॥”
“राजा सत्राजितने सत्यभामाके विवाहके लिये जिन
कुलक नामक ब्राह्मणको श्रीमाधवके निकट भेजा था,
वे ही अब काशीनाथ हैं।”
'रुद्र'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 135वाँ श्लोक)—
“वरूथपः सखा नाम्ना कृष्णचन्द्रस्य यो व्रजे।
आसीत् स एव गौराङ्गवल्लभः रुद्रपण्डितः ॥ 135 ॥”
“व्रजमें वरूथप-नामक श्रीकृष्ण सखा ही अब
श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके प्रिय श्रीरुद्रपण्डित हैं।”
दसवाँ अध्याय | 77
[ 10/106-108
'वल्लभपुर'-कमलाकर पिप्पलाइके श्रीपाट माहेेशके
एक मील उत्तरमें है। इस स्थानपर एक विशाल
मन्दिरमें काशीश्वर गोस्वामीके भाज्जे श्रीरुद्रराम पण्डितके
द्वारा स्थापित श्रीराधा-वल्लभजी विराजमान हैं। रुद्रराम
पण्डितके छोटे भाई यदुनन्दन बन्दोपाध्याय महाशयके
वंशधर 'चक्रवर्त्तिगण' श्रीराधावल्लभजीके वर्तमान सेवायित
हैं। पहले रथयात्राके समय माहेेशसे श्रीजगन्नाथदेव
वल्लभपुरमें श्रीराधा-वल्लभके मन्दिरमें आते थे, किन्तु
1262 वर्षसे श्रीराधा-वल्लभजीके सेवायितोंका परस्पर
मन-मलिनताके कारण यह प्रथा रुक गयी॥ 106 ॥
(48) श्रीनाथ पण्डित :-
श्रीनाथ पण्डित-प्रभुर कृपार भाजन।
याँर कृष्णसेवा देखि' वश त्रिभुवन॥ 107 ॥
अनुवाद-श्रीनाथ पण्डित महाप्रभुकी कृपाके विशेष
पात्र हैं, जिनकी श्रीकृष्णसेवाको देखकर तीनों लोकोंके
लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं॥ 107 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनाथ पण्डित काँचड़ापाड़ाके
निवासी थे॥ 107 ॥
अनुभाष्य-श्रीनाथ पण्डित-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
211वाँ श्लोक)-
“व्याचकार पारिपाट्यात् यो भागवत-संहिताम्।
कुमारहट्टे यत्कीर्त्तिः कृष्णदेवो विराजते॥ 211॥”
“ये परिपाटीके साथ भागवत-संहिताकी व्याख्या
करते थे। कुमारहट्टमें इनकी कीर्त्ति श्रीकृष्णदेवके
विग्रहरूपमें विराजमान है।”
कुमारहट्टसे लगभग डेढ़ मीलकी दूरीपर काँचड़ापाड़ामें
श्रीशिवानन्दसेनका स्थान है। उस स्थानपर शिवानन्दसेनके
द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीगौरगोपाल' का विग्रह है और श्रीनाथ
पण्डितके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीकृष्णराय' नामक श्रीराधाकृष्णकी
मूर्त्ति एक विशाल मन्दिरमें विराजमान है। मन्दिरके
सामने बड़ा आङ्गन, भोग बनानेके लिये पाकशाला और
अतिथिगृह आदि हैं। प्राङ्गणके चारों ओर ऊँची दीवारें
हैं। माहेेशके मन्दिरसे भी यह मन्दिर बड़ा है। 1708
शकाब्दमें इस मन्दिरका निर्माण हुआ था। मन्दिरके
सम्मुख एक अनुष्टुप श्लोकमें मन्दिरके प्रतिष्ठाताका
नाम, उनके पिताका नाम, पितामहका नाम और तिथि
खुदी है। कलकत्ता-पाथुरियाघाटाके निवासी परलोकगत
निमाइ मल्लिक नामक एक धनी व्यक्तिने इस मन्दिरका
निर्माण कराया था। श्रीनाथ पण्डित श्रीअद्वैताचार्यके
शिष्य थे और शिवानन्द सेनके तीसरे पुत्र गौरगणोद्देशके
लेखक परमानन्द कविकर्णपूर श्रीनाथ पण्डितके शिष्य
थे। सम्भवतः कविकर्णपूरके समयमें ही श्रीकृष्णरायका
विग्रह प्रकाशित हुआ था। किंवदन्तीके अनुसार श्रीवीरभद्र
प्रभु एक विशाल सुरम्य पत्थर मुर्शीदाबादसे लाये थे
और उस पत्थरसे वल्लभपुरके श्रीराधावल्लभ-विग्रह,
खड़देहके श्रीश्यामसुन्दर विग्रह और काँचड़ापाड़ाके
श्रीकृष्णरायके विग्रह प्रकाशित हुए थे।
शिवानन्द सेनका प्राचीन स्थान गङ्गातटपर था और
वहाँ एक टूटा-फूटा छोटासा मन्दिर था। सुना जाता है
कि निमाइ मल्लिक जब काशी जा रहे थे, तब वे इस
स्थानपर कुछ समय रुके थे और उन्होंने मन्दिरकी
जीर्ण दशाको देखकर बादमें वहाँ एक विशाल मन्दिरका
निर्माण कराया था॥ 107 ॥
(49) श्रीजगन्नाथ आचार्य :-
जगन्नाथ आचार्य प्रभुर प्रिय दास।
प्रभुर आज्ञाते तँहो कैल गङ्गावास॥ 108 ॥
अनुवाद-जगन्नाथ आचार्य महाप्रभुके प्रिय दास हैं।
महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने 'गङ्गावास' में वास किया॥ 108 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'गङ्गावास'-श्रीनवद्वीपके एक
किनारे 'अलकनन्दा' नदीके तटपर 'गङ्गावास' नामक
ग्राममें उन्होंने वास किया॥ 108 ॥
अनुभाष्य-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 111वाँ श्लोक)-
“आचार्यः श्रीजगन्नाथो गङ्गावासः प्रभुप्रियः।
आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिकाप्रियः॥ 111 ॥”
78 | श्रीचैतन्यचरितामृत
10/108-112 ]
“श्रीजगन्नाथ आचार्य और गङ्गादास, ये दोनों
महाप्रभुके प्रिय थे। ये दोनों पहले श्रीनिधुवनमें गोपिकाप्रिय
श्रीदुर्वासा ऋषि थे॥” 108॥
(50) कृष्णदास, (51) शेखर पण्डित,
(52) कविचन्द्र, और (53) षष्ठीवर :-
कृष्णदास वैद्य, आर पण्डित शेखर।
कविचन्द्र, आर कीर्त्तनीया षष्ठीवर ॥ 109 ॥
(54) श्रीनाथ मिश्र, (55) शुभानन्द, (56) श्रीराम,
(57) ईशान, (58) श्रीनिधि, (59) श्रीगोपीकान्त,
(60) भगवान् मिश्र :-
श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान।
श्रीनिधि, श्रीगोपीकान्त, मिश्र भगवान् ॥ 110 ॥
अनुवाद—कृष्णदास वैद्य, शेखर पण्डित, कविचन्द्र,
षष्ठीवर, श्रीनाथ मिश्र, शुभानन्द, श्रीराम, ईशान, श्रीनिधि,
श्रीगोपीकान्त और भगवान् मिश्र अन्य शाखाएँ हैं।
षष्ठीवर कीर्तनीया हैं॥ 109-110 ॥
अनुभाष्य—‘कविचन्द्र और श्रीनाथ मिश्र’—
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 171वाँ श्लोक)—
“श्रीनाथमिश्रश्चित्राङ्गी कविचन्द्रो मनोहरा ॥ 171 ॥”
“चित्राङ्गी सखी श्रीनाथ मिश्र और मनोहरा सखी
कविचन्द्र हैं।”
‘शुभानन्द’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194 और 199
श्लोकके अनुसार शुभानन्द ब्रजकी मालती हैं। ये रथके
आगे नृत्यके समय सात-सम्प्रदायोंमें श्रीवास और
श्रीनित्यानन्दके दलोंमें एक मुख्य गायक थे और इन्होंने
भावाविष्ट महाप्रभुके मुखसे निकलती झागका पान
किया था (चैःचः मध्यलीला 13/110 संख्या द्रष्टव्य है)।
‘ईशान’—(चैःभाः मध्यखण्ड आठवाँ अध्याय)—
“सेविलेन सर्वकाल आइरे ईशान।
चतुर्द्दशलोकमध्वे महा-भाग्यवान् ॥”
“ईशानने सब समय शचीमाताकी सेवा की। चौदह
लोकोंमें ये महाभाग्यवान् हैं।” वैष्णव-वन्दनामें (भक्तिरत्नाकर
बारहवीं तरङ्ग)—
“वन्दिब ईशानदास करयोड़ करि’।
शचीठाकुराणी याँरे स्नेह कैल बड़ि॥ 94 ॥”
“मैं हाथ जोड़कर ईशानदासकी वन्दना करता हूँ,
जिनका स्नेहसे पालनकर शची ठाकुरानीने बड़ा किया
है।” भक्तिरत्नाकरकी 12वीं तरङ्गमें—
“निमाइ चाँदेर अति प्रिय से ईशान॥ 95 ॥”
“ईशान निमाइ चाँदके अति प्रिय हैं॥” 109-110 ॥
(61) सुबुद्धि मिश्र, (62) हृदयानन्द, (63) कमलनयन,
(64) महेश पण्डित, (65) श्रीकर, (66) मधुसूदन :-
सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द, कमलनयन।
महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन ॥ 111 ॥
(67) पुरुषोत्तम, (68) श्रीगालीम, (69) जगन्नाथदास,
(70) श्रीचन्द्रशेखर, (71) द्विज हरिदास :-
पुरुषोत्तम, श्रीगालीम, जगन्नाथदास।
श्रीचन्द्रशेखर वैद्य, द्विज हरिदास ॥ 112 ॥
अनुवाद—वृक्षकी अन्य शाखाएँ सुबुद्धि मिश्र, हृदयानन्द,
कमलनयन, महेश पण्डित, श्रीकर, श्रीमघुसूदन, पुरुषोत्तम,
श्रीगालीम, जगन्नाथदास, श्रीचन्द्रशेखर वैद्य और द्विज
हरिदास हैं॥ 111-112 ॥
अनुभाष्य—‘सुबुद्धि मिश्र’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 194
और 201 श्लोकके अनुसार सुबुद्धि मिश्र ब्रजकी
गुणचूड़ा हैं। इनका स्थान श्रीखण्डसे तीन मील पश्चिममें
‘बेलगाँ’ है। यहाँपर श्रीनिताइ-गौरका श्रीविग्रह है। टीका
लिखनेके समय इनके जो वंशधर वर्तमान थे, उनका
नाम श्रीगोविन्दचन्द्र गोस्वामी था।
‘कमलनयन’—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 196 और 205
श्लोकके अनुसार कमलनयन ब्रजकी गन्धोन्मादा हैं।
‘महेश पण्डित’—चैःचः आदिलीला 11/32 संख्या
द्रष्टव्य है।
‘चन्द्रशेखर वैद्य’—काशीमें रहनेके समय महाप्रभुने
दसवाँ अध्याय | 79
[ 10/111-114
इनके घरपर वास किया था। ये लेखक थे। चैःचः “निर्मिता पुस्तिका येन 'कृष्णप्रेमतरङ्गिणी'।
आदिलाीला 7/45 पयार और अनुभाष्य, 10/152, 154; श्रीमद्भागवताचार्यो गौराङ्गात्यन्तवल्लभः ॥ 203 ॥”
मध्य 17/92, 19/241-243; मध्य 20/46-53, 67-71; “श्वेतमञ्जरी श्रीगौराङ्गके अत्यन्त प्रिय वही
25/62, 172 संख्या द्रष्टव्य हैं। श्रीभागवताचार्य हैं, जिन्होंने 'कृष्णप्रेमतरङ्गिणी' नामक
'द्विज हरिदास'—ये अष्टोत्तरशतनामके रचियता हैं ग्रन्थकी रचना की है।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अथवा नहीं, इस विषयमें संशय है। काञ्चनगड़ियाके अध्याय)—
निवासी इनके दो पुत्र श्रीदाम और गोकुलानन्द श्रीनिवास “तबे प्रभु आइलेन वराहनगरे।
आचार्यके शिष्य थे॥ 111-112 ॥ महाभाग्यवन्त एक ब्राह्मणेर घरे॥ 110 ॥
सेइ विप्र बड़ सुशिक्षित भागवते।
(72) रामदास, (73) कविदत्त, (74) गोपालदास, प्रभु देखि' भागवत लागिल पड़िते॥ 111 ॥
(75) रघुनाथ, (76) शार्ङ्गठाकुर :— शुनिया তাহার भक्तियोगेर पठन।
रामदास, कविदत्त, श्रीगोपालदास। आविष्ट हइला गौरचन्द्र नारायण॥ 112 ॥
भागवताचार्य, ठाकुर सारङ्गदास ॥ 113 ॥ प्रभु बले, भागवत एमत पड़िते।
(77) जगन्नाथतीर्थ, (78) जानकीनाथ, कभु नाहि शुनि आर काहारो मुखेते॥ 119 ॥
(79) गोपाल आचार्य, (80) द्विज वाणीनाथ :— एतेके तोमार नाम 'भागवताचार्य'।
जगन्नाथ तीर्थ, विप्र श्रीजानकीनाथ। इहा बइ आर कोन ना करिह कार्य॥” 120 ॥
गोपाल आचार्य आर विप्र वाणीनाथ ॥ 114 ॥ “तब महाप्रभु महाभाग्यवान् एक ब्राह्मणके घर
वराहनगर आये। वे ब्राह्मण भागवतमें बड़े सुशिक्षित थे।
अनुवाद—रामदास, कविदत्त, श्रीगोपालदास, भागवताचार्य, महाप्रभुको देखकर वे भागवत पढ़ने लगे। उनका
ठाकुर सारङ्गदास, जगन्नाथ तीर्थ, विप्र श्रीजानकीनाथ, भक्तियोगका पाठ सुनकर महाप्रभु भावमें आविष्ट हो
गोपाल आचार्य और विप्र वाणीनाथ, भक्तिवृक्षकी अन्य गये और बोले—'मैंने इस प्रकार भागवतका पाठ किसी
शाखाएँ हैं॥ 113-114 ॥ औरके मुखसे कभी नहीं सुना है, इसलिये तुम्हारा नाम
अमृतप्रवाह भाष्य—भागवताचार्य वराहनगरके निवासी 'भागवताचार्य' है। अब तुम भागवत पाठके अतिरिक्त
थे। अभी भी उनके आश्रमको 'भागवताचार्यका पाट' कोई और कार्य नहीं करना।” इनका नाम 'रघुनाथ' भी
कहते हैं। ठाकुर सारङ्ग दास मामगाछीके निवासी थे। कहते हैं। इनका पाट वराहनगर-मालिपाड़ामें गङ्गाके
विप्र वाणीनाथ चम्पाहार्टीके निवासी थे॥ 113-114 ॥ तटपर है।
अनुभाष्य—'श्रीगोपाल दास'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 'ठाकुर सारङ्गदास'—इनका एक और नाम शार्ङ्ग
158वाँ श्लोक)— ठाकुर भी है। इनको कोई-कोई शार्ङ्गपाणि या शार्ङ्गधर
“पुरा श्रीतारका-पाल्यौ ये स्थिते व्रजमण्डले। भी कहते हैं। ये नवद्वीपके अन्तर्गत मोद्रुमद्वीपमें वास
ते साम्प्रतं जगन्नाथ-श्रीगोपालौ प्रभोः प्रियौ॥ 158 ॥” करते हुए गङ्गातटपर निर्जनमें भजन करते थे। भगवान्के
“व्रजमण्डलमें जो पहले श्रीतारका और पाली पुनः पुनः प्रेरणा देनेपर ही ये किसीको शिष्य बनानेके
नामक गोपियाँ थीं, वे दोनों ही अब महाप्रभुके प्रिय लिये बाध्य हुए। तब इन्होंने निश्चय किया कि आगामी
श्रीजगन्नाथ और श्रीगोपाल हैं।” दिवस प्रातःकालमें जिसे सबसे पहले देखेंगे, उसीको
'भागवताचार्य'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 203रा श्लोक)— अपना शिष्य बनायेंगे। घटनावश अगले दिन प्रातःकालमें
80 | श्रीचैतन्यचरितामृत
10/113-115 ]
जब ये गङ्गामें स्नान करने गये, तो इनके चरणोंको
बहती हुई एक मृत देहने स्पर्श किया। इन्होंने उसे पुनः
जीवन प्रदानकर उसे अपना शिष्य बनाया। उनके
शिष्य 'ठाकुर मुरारि' के नामसे प्रसिद्ध हुए और उनकी
वंश-परम्परा अब भी 'शर्'-नामक ग्राममें वास करती
है। श्रीशार्ङ्गके नामके साथ मुरारिकी कथा जुड़नेके
कारण 'शार्ङ्ग-मुरारि' के नामसे प्रसिद्धि अभी तक भी
सुनी जाती है।
आज भी शार्ङ्गठाकुरकी एक प्राचीन सेवा मामगाछि
ग्राममें है। बादमें श्रीठाकुरके एक और मन्दिरका प्राचीन
बकुल वृक्षके सामने निर्माण किया गया है।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 172वाँ श्लोक)—
“व्रजे नान्दीमुखी यासीत् साद्य सारङ्गठक्कुरः।
प्रह्लादो मन्यते कैश्चिन्मत्पिता स न मन्यते॥ 172॥”
“व्रजकी नान्दीमुखी अब सारङ्ग ठाकुर हैं। कोई-कोई
महात्मा इन्हें प्रह्लाद कहते हैं, किन्तु मेरे पिता (श्रीशिवानन्द
सेन) ने इसे स्वीकार नहीं किया।”
'जगन्नाथ तीर्थ'—चैःचः आदिलीला 9/14 (अनुभाष्य)
द्रष्टव्य है।
'वाणीनाथ'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 195 और 204
श्लोक)—
“वाणीनाथद्विजश्चम्पहट्टवासी प्रभोः प्रियः ॥ 204 ॥”
“चम्पाहट्ट निवासी द्विज वाणीनाथ महाप्रभुके अत्यन्त
प्रिय हैं। व्रजलीलामें ये कामलेखा हैं।” चम्पाहट्ट या
चाँपाहार्टि-वर्धमान जिलामें समुद्रगढ़के अन्तर्गत एक
छोटासा ग्राम है। इस प्राचीन श्रीपाटकी सेवामें अनियन्त्रित
व्यवस्था और अवहेलना देखकर बङ्गाब्द 1328 में
श्रीपरमानन्द ब्रह्मचारी (श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके
शिष्य) और चैतन्य मठके सेवकोंने उसका संस्कारकर
वहाँ एक नये मन्दिरका निर्माण करवाया। अब वहाँ
श्रीवाणीनाथके द्वारा प्रतिष्ठित नयनाभिराम श्रीगौर-गदाधरके
विग्रहोंकी शास्त्रविधिके अनुसार अर्चा-पूजा हो रही
है ॥ 113-114 ॥
(81) गोविन्द, (82) माधव, (83) वासुदेव :—
गोविन्द, माधव, वासुदेव-तिन भाइ।
याँ-सबार कीर्त्तने नाचे चैतन्य-निताइ ॥ 115 ॥
अनुवाद—गोविन्द, माधव और वासुदेव-ये तीन
भाई वृक्षकी एक और शाखा थे। इनके कीर्त्तनमें
महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे॥115॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'गोविन्द'—अग्रद्वीपमें श्रीगोपीनाथके
स्थापक ॥ 115 ॥
अनुभाष्य—'गोविन्द, माधव और वासुदेव घोष'—इन
तीनों भाइयोंका जन्म उत्तर-राढ़ीय कायस्थकुलमें हुआ
था। (चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ अध्याय)—
“सुकृति माधवघोष कीर्त्तने तत्पर।
हेन कीर्त्तनीया नाहि पृथिवी-भितर ॥ 257 ॥
याहारे कहेन वृन्दावनर गायन।
नित्यानन्दस्वरूपेर महाप्रियतम ॥ 258 ॥
माधव, गोविन्द, वासुदेव-तिन भाइ।
गाइते लागिला, नाचे ईश्वर निताई ॥ 259 ॥”
“सुकृतिवान् माधव घोष कीर्त्तन करनेमें तत्पर हो
गये। पृथ्वीपर उनके समान कीर्त्तनीया और कोई नहीं
था। उन्हें वृन्दावनके वैभवका गायक कहा जाता था
और वे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिशय प्रिय थे। जब ये
तीनों भाई मिलकर गान करते थे, तो महाप्रभु और
श्रीनित्यानन्द प्रभु भावावेशमें नृत्य करते थे।”
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 188वाँ श्लोक)—
“कलावती', 'रसोल्लासा', 'गुणतुङ्गा' व्रजे स्थिता।
श्रीविशाखाकृतं गीतं गायन्ति स्माद्य ता मताः।
गोविन्द-माधवानन्द-वासुदेवा यथाक्रमम् ॥ 188 ॥”
“कलावती, रसोल्लासा और गुणतुङ्गा नामक जो
सखियाँ व्रजमें विशाखा सखीके द्वारा रचित गीतोंको
गाया करती थीं, अब वे यथाक्रमसे गोविन्द, माधवानन्द
और वासुदेव हैं।” श्रीक्षेत्रमें रथको ले जाते समय
महाप्रभुके साथ सात कीर्त्तन सम्प्रदायोंमेंसे एक सम्प्रदायमें
ये तीनों भाई मूल गायक थे और उन्हें साक्षात्
दसवौँ अध्याय | 81
[ 10/115-120
श्रीवक्रेश्वर पण्डित प्रधान नर्तक रूपमें प्राप्त हुए थे (चैःचः मध्यलीला, 13/42-43 संख्या द्रष्टव्य है) ॥115॥
(84) अभिराम ठाकुर :-
रामदास अभिराम—सख्य-प्रेमराशि।
षोलसाङ्गेर काष्ठ तुलि' ये करिल वाँशी॥116॥
अनुवाद—रामदास अभिराम सख्यप्रेममें सदा डूबे रहते थे। ये सोलह साङ्गकी* लकड़ीको अकेले ही उठाकर (वंशीके जैसे) धारण कर लेते थे। ॥116॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'अभिराम'—खानाकुल-कृष्णनगर-वासी॥116॥
श्रीनिताइके साथ अभिराम, माधव और वासुघोषका गौड़में नामप्रचार और महाप्रभुके साथ गोविन्दका वास :-
प्रभुर आज्ञाय नित्यानन्द गौड़े चलिला।
ताँर सङ्गे तिनजन प्रभु-आज्ञाय आइला॥117॥
श्रीरामदास, माधव, आर वासुदेव घोष।
प्रभु-सङ्गे रहे गोविन्द पाइया सन्तोष॥118॥
अनुवाद—महाप्रभुकी आज्ञा पाकर श्रीनित्यानन्द प्रभु जब प्रचारके लिये गौड़देश चले, तो उनके साथ रामदास, माधव और वासुदेव घोष—ये तीन भक्त थे। परन्तु गोविन्द महाप्रभुके साथ ही जगन्नाथपुरीमें बड़े आनन्दके साथ रहे॥117-118॥
अनुभाष्य—चैःचः मध्यलीला, 15/42-43 संख्या द्रष्टव्य है। 'रामदास'—चैःचः आदिलीला 11/13-16 और मध्य 15/42-43 संख्या द्रष्टव्य है॥117-118॥
*कोई भारी वस्तु उठानेके लिये उसे एक मजबूत लकड़ीके बीचमें बाँधकर दो व्यक्ति दोनों ओरसे उसे उठाते हैं, उस लकड़ीको साङ्ग कहते हैं। इसलिये सोलह साङ्गकी लकड़ीको उठानेके लिये बत्तीस लोग चाहिये।
(76), (41), (39क), (85) माधवाचार्य,
(86) कमलाकान्त (87) यदुनन्दन :-
भागवताचार्य, चिरञ्जीव, श्रीरघुनन्दन।
श्रीमाधवाचार्य, कमलाकान्त, श्रीयदुनन्दन॥119॥
अनुवाद—भागवताचार्य, चिरञ्जीव, श्रीरघुनन्दन, श्रीमाधवाचार्य, कमलाकान्त और श्रीयदुनन्दन, महाप्रभुकी अन्य शाखाएँ हैं॥119॥
अनुभाष्य— 'माधवाचार्य'—ये ब्रजकी माधवी हैं (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 169वाँ श्लोक)। ये श्रीनित्यानन्द-शाखामें हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी पुत्री श्रीमती गङ्गादेवीके पति हैं। इन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभुके गण पुरुषोत्तम (नागर) से दीक्षा ग्रहणकी थी। ऐसा कहा जाता है कि गङ्गादेवीके विवाहके समय श्रीनित्यानन्द प्रभुने माधवको पाँजिनगर दानमें दिया था। इनका श्रीपाट जीराट्में है। चैःचः आदिलीला 11/38 संख्या द्रष्टव्य है।
'कमलाकान्त'—ये अद्वैताचार्यके जन कमलाकान्त विश्वास हैं।
'यदुनन्दनाचार्य'—ये श्रीअद्वैतशाखामें हैं (चैःचः अन्त्यलीला, 6/160-169 संख्या द्रष्टव्य है॥119॥
(88) जगाइ और (89) माधाइ :-
महाकृपापात्र प्रभुर जगाइ, माधाइ।
'पतितपावन' नामेर साक्षी दुइ भाइ॥120॥
अनुवाद—जगाइ और माधाइ, महाप्रभुकी महाकृपाके पात्र थे। इन दोनों भाइयोंने इस बातके साक्षी होकर प्रमाणित किया कि महाप्रभुका 'पतितपावन' नाम यथार्थ है॥120॥
अनुभाष्य—'जगाइ और माधाइ'—(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 115वाँ श्लोक)—
“वैकुण्ठे द्वारपालौ यौ जयाद्यविजययान्तकौ।
तावद्य जातौ स्वेच्छात्तः श्रीजगन्नाथ-माधवौ॥115॥"
“वैकुण्ठके द्वारपाल जय और विजय स्वेच्छापूर्वक
82 | श्रीचैतन्यचरितामृत
10/120-127 ]
अब श्रीजगन्नाथ (जगाइ) और माधव (मधाइ) के रूपमें
अवतीर्ण हुए हैं।” ये दोनों नवद्वीपमें ब्राह्मण परिवारमें
जन्म ग्रहणकर भी चोरी-डकैती और अन्य सभी
प्रकारके पापकर्मोंमें लिप्त थे। किन्तु बादमें श्रीमन्महाप्रभु
और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी कृपासे हरिनाम प्राप्तकर दोनों
'महाभागवत' बन गये। मधाइका वंश आज भी विद्यमान
है और वे सब कुलीन ब्राह्मण हैं। आकाइहाट जानेके
मार्गमें कटोआसे एक मील दक्षिणकी ओर 'घोषहाट'
अथवा माधाइतला-गाँवमें जगाइ और मधाइका समाज
है। सुना जाता है कि श्रीगोपीचरणदास बाबाजीने लगभग
300 वर्ष पहले इसका उद्धार करके श्रीनिताइ-गौरके
श्रीविग्रहकी प्रतिष्ठाकी थी॥120॥
असंख्य गौड़ीयभक्तोंमें उल्लिखित कुछेक वैष्णवगण :-
गौड़देश-भक्तेर कैल संक्षेप कथन।
अनन्त चैतन्यभक्त ना याय गणन॥121॥
अनुवाद—महाप्रभुके गौड़देशके भक्तोंका मैंने यहाँ
संक्षेपमें वर्णन किया है। श्रीचैतन्यमहाप्रभुके भक्त अनन्त
हैं, जिनकी गणना करना सम्भव नहीं है॥121॥
गौड़ और उड़ीसा, दोनों स्थानोंपर इनकी गौरसेवा :-
नीलाचले इसब भक्त प्रभुसङ्गे।
दुइ स्थाने प्रभु-सेवा कैल नानारङ्गे॥122॥
अनुवाद—मैंने जिन भक्तोंका वर्णन किया है, वे
सब महाप्रभुके पास नीलाचल आते थे। उन्होंने गौड़देश
और नीलाचल, इन दोनों स्थानोंमें महाप्रभुकी अनेक
प्रकारसे सेवा की थी॥122॥
केवल नीलाचलमें मिले सेवकोंका उल्लेख :-
केवल नीलाचले प्रभुर ये ये भक्तगण।
संक्षेपे करिये किछु से-सब कथन॥123॥
अनुवाद—केवल नीलाचलमें महाप्रभुके जो-जो भक्त
थे, उनका संक्षेपमें मैं कुछ वर्णन करूँगा॥123॥
नीलाचले प्रभुसङ्गे सब भक्तगण।
सबार अध्यक्ष—प्रभुर मर्म दुइजन॥124॥
सर्वप्रधान—(1) श्रीपरमानन्द और (2) श्रीस्वरूप :-
परमानन्दपुरी, आर स्वरूप दामोदर।
गदाधर, जगदानन्द, शङ्कर, वक्रेश्वर॥125॥
दामोदर पण्डित, ठाकुर हरिदास।
रघुनाथ वैद्य, आर रघुनाथदास॥126॥
इत्यादिक पूर्वसङ्गी बड़ भक्तगण।
नीलाचले रहि' प्रभुर करेन सेवन॥127॥
अनुवाद—नीलाचलमें महाप्रभुके सङ्ग जो भक्त थे,
उनमें दो प्रधान—परमानन्दपुरी और स्वरूप दामोदर
महाप्रभुके मर्मको जाननेवाले थे। श्रीगदाधर पण्डित,
जगदानन्द पण्डित, शङ्कर, वक्रेश्वर, दामोदर पण्डित,
हरिदास ठाकुर, रघुनाथ वैद्य तथा रघुनाथदास गोस्वामी
आदि बड़े भक्त महाप्रभुके पूर्व सङ्गी थे। उन्होंने
नीलाचलमें रहकर महाप्रभुकी सेवा की॥124-127॥
अनुभाष्य—'रघुनाथ वैद्य'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड पाँचवाँ
अध्याय)—
“रघुनाथ वैद्य आइलेन ततक्षणे।
परमवैष्णव, अन्त नाहि याँर गुणे॥97॥”
“जब महाप्रभु पाणिहाटीमें थे, तब उनके दर्शनके
लिये रघुनाथ वैद्य तुरन्त वहाँ आये। वे परम वैष्णव
हैं और उनमें अनन्त गुण हैं।”
श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ गौड़देश आते हुए उनके
सहगामी भक्तोंका व्रजभाव—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ
अध्याय)—
“रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महामति।
हइलेन मूर्त्तिमति ये हेन रेवती॥239॥”
“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ गौड़देश आते समय
मार्गमें साथ चलते हुए रघुनाथ वैद्य मूर्तिमति रेवती जैसे
हो गये।”
दसवाँ अध्याय | 83
[ 10/126-130
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
“रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महामति।
याँर दृष्टिपाते कृष्णे हय रति मति॥ 726॥”
“उन्हें देखने मात्रसे ही देखनेवालेका चित्त श्रीकृष्णमें
लग जाता था।” चैःचः आदिलीला, 11/22 संख्या
द्रष्टव्य है। ये पुरीमें समुद्र तटपर रहते थे और इन्होंने
वहाँके ‘स्थान-निरूपण’ नामक ग्रन्थकी रचना की
थी॥ 126॥
आर यत भक्तगण गौड़देशवासी।
प्रत्यब्दे प्रभुरे देखे नीलाचले आसि’॥ 128॥
**अनुवाद—**और जितने भी गौड़देशके भक्त, जिनका
नाम पहले उल्लेख किया है, वे प्रतिवर्ष महाप्रभुसे
मिलने नीलाचल आते थे॥ 128॥
नीलाचले प्रभुसह प्रथम मिलन।
सेइ भक्तगणेर एबे करिये गणन॥ 129॥
**अनुवाद—**नीलाचलमें महाप्रभुसे जिनका प्रथम मिलन
हुआ था, उन भक्तोंकी गणना अब मैं करूँगा॥ 129॥
(3) सार्वभौम शाखा, (4) गोपीनाथाचार्य :—
बड़शाखा एक,—सार्वभौम भट्टाचार्य।
ताँर भगनीपति श्रीगोपीनाथाचार्य॥ 130॥
**अनुवाद—**सार्वभौम भट्टाचार्य एक बड़ी शाखा हैं,
श्रीगोपीनाथाचार्य उनके बहनोई हैं॥ 130॥
अनुभाष्य—‘सार्वभौम भट्टाचार्य’—इनका नाम पहले
वासुदेव भट्टाचार्य था। ये वर्तमान नवद्वीप अथवा
चाँपाहाटीसे दो मील दूर ‘विद्यानगर’ नामक पल्लीके
प्रसिद्ध महेश्वर विशारदके पुत्र थे। कहा जाता है कि
ये उस समय भारतके सर्वप्रधान नैयायिक थे। इन्होंने
मिथिलाके सुविख्यात न्याय-विद्यालयके प्रधान अध्यापक
पक्षधर मिश्रसे समस्त न्यायशास्त्रको कण्ठस्थ करके
नवद्वीपमें न्यायविद्यालयकी स्थापना करके वहाँ
अध्यापन कार्य आरम्भ किया। न्याय-शास्त्रके इतिहासमें
इन्होंने नये युगका आरम्भ किया। तबसे नवद्वीप
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
मिथिलाको गौरवहीन करके आज भी समस्त भारतमें
सर्वप्रधान न्याय-विद्यापीठके रूपमें परिचित है।
किसी-किसीके मतानुसार ‘दीधिति’ ग्रन्थोंके रचयिता
सुविख्यात नैयायिक रघुनाथ शिरोमणि इनके ही छात्र
हैं। जैसा भी हो, (सार्वभौम) न्याय और वेदान्तशास्त्रके
प्रकाण्ड पण्डित थे। वे गृहस्थाश्रममें रहकर भी क्षेत्र-संन्यास
ग्रहणकर नीलाचलमें वेदान्त पढ़ाया करते थे। इन्होंने
श्रीमन्महाप्रभुको शाङ्कर-भाष्यानुमोदित वेदान्त सुनाया।
बादमें महाप्रभुसे श्रवण करके ये वेदान्तके वास्तविक
अर्थसे अवगत हुए। इन्होंने महाप्रभुकी षड्भुज-मूर्तिका
दर्शन किया। इनके द्वारा रचित ‘चैतन्यशतक’ में
गौरभक्ति प्रकटित है; विशेषतः “वैराग्यविद्यानिजभक्ति
योग’ दो श्लोक सार्वभौमके पाण्डित्यकी सीमा है।
महाप्रभुका सार्वभौमके साथ मिलन और इनके साथ
विचार और उद्धारके वृत्तान्तके लिये मध्यलीलाका छठा
अध्याय द्रष्टव्य है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 119वाँ
श्लोक)—
“भट्टाचार्यः सार्वभौमः पुरासीद्गीष्पतिर्दिवि॥ 119॥”
“देवलोकके बृहस्पति अब सार्वभौम भट्टाचार्य हैं।”
‘गोपीनाथ आचार्य’—ये नवद्वीपवासी और महाप्रभुके
सङ्गी ब्राह्मण हैं। ये सार्वभौम भट्टाचार्यके बहनोई हैं।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 178वाँ श्लोक)—
“पुरा प्राणसखी यासीन्नाम्ना रत्नावली व्रजे।
गोपीनाथाख्यकाचार्यो निर्मलत्वेन विश्रुतः॥ 178॥”
“पहले जो व्रजमें रत्नावली नामक प्राणसखी थीं,
वे ही अब श्रीगोपीनाथाचार्यके नामसे विख्यात हैं।”
किसी-किसी के मतानुसार, ये ब्रह्मा हैं।
(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 75वाँ श्लोक)—
“गोपीनाथाचार्यनाम्ना ब्रह्मा ज्ञेयो जगत्पतिः।
नवव्यूहे तु गणितो यस्तन्त्रे तन्त्रवेदिभिः॥ 75॥”
“तन्त्रवादी लोग जिनकी तन्त्रमें वर्णित नवव्यूहके
अन्तर्गत गणना करते हैं, उन्हीं जगत्पति ब्रह्माको
श्रीगोपीनाथाचार्य जानना होगा॥” 130॥
84 | श्रीचैतन्यचरितामृत
10/131-134 ]
(5) काशीमिश्र, (6) प्रद्युम्नमिश्र, (7) राय भवानन्द :-
काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र, राय भवानन्द।
याँहार मिलने प्रभु पाइला आनन्द ॥ 131 ॥
आलिङ्गन करि' ताँरे बलिल वचन।
तुमि पाण्डु, पञ्चपाण्डव—तोमार नन्दन ॥ 132 ॥
अनुवाद-काशीमिश्र, प्रद्युम्नमिश्र और राय भवानन्द,
जिन्हें मिलकर महाप्रभुको आनन्द हुआ। राय भवानन्दका
आलिङ्गन करके महाप्रभुने कहा कि तुम पाण्डु हो
और तुम्हारे पुत्र पाँच पाण्डव हैं॥ 131-132 ॥
अनुभाष्य-‘काशीमिश्र’-राजपुरोहित थे। नीलाचलमें
श्रीमन्महाप्रभु इनके घरमें ही रहे थे। बादमें यह स्थान
श्रीवक्रेश्वर पण्डितको मिला। उनके शिष्य श्रीगोपालगुरु
गोस्वामीके समयमें वहाँपर 'श्रीराधाकान्त' विग्रहकी स्थापना
हुई थी। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 193वाँ श्लोक)—
“मथुरायां पुरा यासीत् सैरन्ध्री कृष्णवल्लभा।
साद्य नीलाचलावासः काशीमिश्रः प्रभोः प्रियः ॥ 193 ॥”
“पहले मथुरामें जो श्रीकृष्णकी प्रिया सैरन्ध्री
(कुब्जा) थीं, वे ही अब महाप्रभुके प्रियपात्र नीलाचलवासी
काशी मिश्र हैं।”
'प्रद्युम्न मिश्र'-उड़ीसाके निवासी थे। (चैःभाः
अन्त्यखण्ड, पाँचवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्न मिश्र कृष्णसुखेर सागर।
आत्मपद याँरे दिला श्रीगौरसुन्दर ॥ 211 ॥”
“श्रीकृष्णप्रेमके सागर श्रीप्रद्युम्न मिश्र, जिन्हें
श्रीगौरसुन्दरने आत्म-पद प्रदान किया।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड,
आठवाँ अध्याय)-
“श्रीप्रद्युम्नमिश्र प्रेमभक्तिर प्रधान ॥ 57 ॥”
“प्रेमभक्तिके प्रधान श्रीप्रद्युम्न मिश्र।” (चैःचः मध्य,
10/43)-
“प्रद्युम्नमिश्र इहँ वैष्णव-प्रधान।
जगन्नाथेर 'महासोयार' इहँ 'दास' नाम ॥ 43 ॥”
“प्रद्युम्नमिश्र वैष्णवोंमें प्रधान हैं। वे भगवान् श्रीजगन्नाथके
प्रधान रसोइया हैं। दास इनका नाम है॥”
अशौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न महाभागवत श्रीराय
रामानन्दके निकट शौक्र-ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न प्रद्युम्नमिश्रको
हरिकथा-श्रवणरूप शिष्यत्व प्रदानकर महाप्रभुकी कृपाका
प्रसङ्ग-चैःचः अन्त्यलीला, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है।
'भवानन्द राय' - श्रीरामानन्द रायके पिता। पुरीसे
पश्चिमकी ओर छह कोसकी दूरीपर ब्रह्मगिरी अथवा
आलालनाथके निकट इनका वास स्थान था। ये जातिसे
शौक्र-करण थे। इनके पाँच पुत्रोंके सम्बन्धमें 133
संख्या द्रष्टव्य है। ये पहले 'पाण्डुराज' के रूपमें
परिचित थे॥ 131 ॥
(8) श्रीराय-रामानन्दादि पाँच भाई :-
रामानन्द राय, पट्टनायक गोपीनाथ।
कलानिधि, सुधानिधि, नायक वाणीनाथ ॥ 133 ॥
एइ पञ्चपुत्र तोमार—मोर प्रियपात्र।
रामानन्द-सह मोर देह-भेद मात्र ॥ 134 ॥
अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे ये पाँचों पुत्र रामानन्द राय,
गोपीनाथ पट्टनायक, कलानिधि, सुधानिधि और नायक
वाणीनाथ, मेरे प्रिय पात्र हैं, किन्तु रामानन्द मेरा ही
स्वरूप है, उसके साथ मेरा केवल देह मात्रका भेद
है॥ 133-134 ॥
अनुभाष्य-‘रामानन्द राय'-(श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका
120-124वें श्लोक)—
“प्रियनर्मसखः कश्चिदर्जुनः पाण्डवोऽर्जुनः।
मिलित्वा समभूद्रामानन्दरायः प्रभोः प्रियः ॥ 120 ॥
अतो राधाकृष्णभक्तिप्रेमतत्त्वादिकं कृती।
रामानन्दो गौरचन्द्रं प्रत्यवर्णयदन्वहम् ॥ 121 ॥
ललितेत्याहुरेके यत्तदेकेनानुमन्यते।
भवानन्दं प्रति प्राह गौरो यत्त्वं पृथापतिः ॥ 122 ॥
गोप्योऽर्जुनीयया सार्द्धमेकीभूयापि पाण्डवः।
अर्जुनो यद्रायरामानन्द इत्याहुरुत्तमाः ॥ 123 ॥
अर्जुनीयाभवत्तूष्णीमर्जुनोऽपि च पाण्डवः।
इति पाद्मोत्तरे खण्डे व्यक्तमेव विराजते।
तस्मादेतत्त्रयं रामानन्दराय-महाशयः ॥ 124 ॥”
दसवाँ अध्याय | 85
[ 10/134
“श्रीकृष्णके प्रियनर्म सखा श्रीअर्जुन और पाण्डव-अर्जुन
मिलकर श्रीगौरप्रिय श्रीरामानन्द राय हुए हैं। इसलिये
रामानन्द प्रतिदिन ही श्रीगौरचन्द्रको राधाकृष्णतत्त्व, भक्तितत्त्व,
प्रेमतत्त्व आदि वर्णन करते थे। कोई उन्हें श्रीललिता
भी कहते हैं, किन्तु अधिकांश महात्मा इस बातको
स्वीकार नहीं करते हैं, क्योंकि श्रीगौरसुन्दरने भवानन्दको
कहा है कि आप कुन्तीपति राजा पाण्डु हैं। विज्ञजन
कहते हैं कि अर्जुनीया नामकी गोपी और पाण्डुपुत्र
अर्जुन एक होकर श्रीरायरामानन्द हुए हैं। पाद्मोत्तर-खण्डमें
कहा गया है कि अर्जुनीया ही अर्जुन हुई थी। इसलिये
श्रीललितादेवी (अथवा प्रियनर्मसखा अर्जुन?), श्रीमती
अर्जुनीया और पाण्डव-अर्जुन, ये तीनोंका मिलित रूप
श्रीरायरामानन्द हैं।”
किसी-किसीके मतमें ये विशाखादेवी हैं (चैःचः
मध्यलीला, नौवाँ और अन्त्य, पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य
है)। अन्तरङ्ग भक्तोंके बीच इनका बहुत ऊँचा स्थान
है। महाप्रभुका कथन है—
“आमि त' संन्यासी, आपना विरक्त करि' मानि।
दर्शन दूरे, प्रकृतिर नाम यदि शुनि ॥
तबहिँ विकार पाय मोर तनु मन।
प्रकृति-दर्शने स्थिर हय कोन् जन॥
निर्विकार देह-मन काष्ठ-पाषाण सम।
आश्चर्य तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥
एक रामानन्देर हय एइ अधिकार।
ताते जानि, - अप्राकृत देह ताँहार ॥
ताँहार मनेर भाव तिनिइ जाने मात्र।
ताहा जानिवारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥
गृहस्थ हञा नहे राय षड्वर्गेर वशे।
विषयी हञा संन्यासीरे उपदेशे ॥”
“मैं तो संन्यासी हूँ और अपनेको विरक्त मानता
हूँ। परन्तु दर्शन तो दूरकी बात है, स्त्रीका नाम भी
यदि मैं सुनता हूँ, तो मेरे तन-मनमें विकार आ जाता
है। स्त्रीका दर्शन करके कौन स्थिर रह सकता है?
किसका तन और मन काष्ठ-पत्थरके सामान निर्विकार
रह सकता है? यह बहुत आश्चर्यकी बात है कि
तरुणीके स्पर्शसे भी मन निर्विकार रहे। एक रामानन्दका
ही ऐसा अधिकार है। इसलिये यह समझना चाहिये कि
उनकी देह अप्राकृत है। उनके मनके भावोंको केवल
वे ही जान सकते हैं, उनको जाननेवाला कोई दूसरा
नहीं है। गृहस्थ होकर भी राय षड्वर्ग (काम, क्रोध,
मोह, लोभ, मद और मात्सर्य) के वशमें नहीं हैं। बाह्य
दृष्टिसे विषयी दिखनेपर भी वे इतने विरक्त हैं कि वे
विषयोंको त्याग किये हुए निर्गुण संन्यासीको भी जड़
विषयोंका त्यागकर श्रीकृष्णविषयके अनुशीलनमें प्रवृत्त
करानेमें समर्थ हैं।”
श्रीस्वरूप और इनके साथ महाप्रभु शेषलीलामें
निरन्तर श्रीकृष्णविरहिणी राधाके महाभाव-वैचित्र्यका
आस्वादन करते थे (चैःचः मध्यलीला, 2/77संख्या);
इनके शुद्धसख्यके द्वारा महाप्रभु वशीभूत थे (चैःचः
मध्यलीला, 2/78 संख्या)। सार्वभौम भट्टाचार्यका कथन—
“रामानन्द राय आछे गोदावरी तीरे।
अधिकारी हयेन तँहो विद्यानगरे॥
पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम।
पाण्डित्य आर भक्तिरस, दुँहेर तँहो सीमा ॥”
“रामानन्द राय गोदावरी तटपर विद्यानगरके अधिकारी
हैं। पृथ्वीपर उनके समान और कोई रसिक भक्त नहीं
है। वे पाण्डित्य और भक्तिरसकी सीमा हैं।”
श्रीरामरायके साथ महाप्रभुका मिलन और रायके
मुखसे साध्य-साधन तत्त्वका श्रवण, महाप्रभुका
रसराज-महाभाव-रूपका प्रदर्शन, महाप्रभुकी उक्ति—
“आमि एक बातुल, तुमि द्वितीय बातुल।
अतएव तोमाय आमाय हइ समतुल॥”
“मैं एक पागल हूँ और तुम दूसरे पागल हो।
इसलिये तुम और मैं एक समान हैं।”
रामरायको राजकार्य त्यागकर श्रीक्षेत्र जानेकी आज्ञा
(चैःचः मध्यलीला, आठवाँ अध्याय); महाप्रभुका दक्षिण
भारतमें प्रचारसे लौटनेके बाद रामरायके साथ पुनः
मिलन और उनका महाप्रभुको नीलाचल जानेका आग्रह
86 | श्रीचैतन्यचरितामृत