श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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अमृतानुकणिका—जीव गोस्वामीने बारह कारण
दिखलाकर श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका स्वकीय भावमें
सम्बन्ध स्थापित किया। लौकिक रीतिके अनुसार उपपति
भाव बहुत ही निन्दनीय और अस्वर्गकर आदि है।
शास्त्रोंमें भी उपपतिको घृणित बतलाया गया है।
श्रीकृष्णने भी स्वयं कहा है कि कुलीन स्त्रियोंके लिये
जार पुरुषकी सेवा सब प्रकारसे निन्दनीय है, उनका
लोक-परलोक, दोनों ही बिगड़ता है। यह कुकर्म तो
अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक है, वर्तमानमें भी कष्टदायक
है और नरकका द्वार है। परीक्षित महाराजने भी
श्रीशुकदेव गोस्वामीसे प्रश्न किया कि श्रीकृष्ण तो
आप्तकाम हैं, तब किसलिये उन्होंने ऐसा निन्दनीय कर्म
किया? इसलिये यह निन्दनीय कर्म है। यहाँपर जानना
आवश्यक है कि यह श्रीकृष्णके सम्बन्धमें नहीं, अपितु
अन्य लोगोंके लिये निन्दनीय कहा गया है। श्रीकृष्णके
साथ गोपियोंका नित्य दाम्पत्य सम्बन्ध है, स्त्री-पतिका
सम्बन्ध है। जैसे श्रीब्रह्म-संहितामें यह बतलाया है—
“आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभि-
स्ताभिर्य एव निजरूपतया कलाभिः।”
ह्लादिनीशक्तिकी वृत्तिरूपा प्रेयसियाँ—श्रीकृष्णके स्वरूपसे
अभिन्न उन्हींकी कलाएँ हैं। शक्ति-शक्तिमान् अभेद हैं,
इसलिये वे उनकी ही अपनी शक्ति हैं। गौतमीय-तन्त्रके
अप्रकट-नित्यलीलाशीलन दशाक्षर मन्त्रकी व्याख्यामें भी
ऐसा कहा गया है—'अनेक जन्म सिद्धानां गोपिनां
पतिरेव वा' अर्थात् श्रीकृष्ण अनेक जन्मोंमें सिद्ध
होनेवाली गोपियोंके पति हैं। वे समस्त विश्व-ब्रह्माण्डके
पति हैं, गोपियोंके पतियोंके पति हैं, सबके पति हैं।
लक्ष्मियाँ कभी भी परकीया नहीं हैं। ये लक्ष्मियोंकी भी
लक्ष्मियाँ हैं, इनके लिये परकीया कैसे सम्भव है?
आदि बहुतसी बातें जीव गोस्वामीजीने कही हैं और
इसके अन्तमें उन्होंने लिख दिया (उज्ज्वलनीलमणि
1/21 की टीका)—
“स्वेच्छया लिखितं किञ्चित् किञ्चदत्र परेच्छया।
यत् पूर्वापरसम्बन्धं तत् पूर्वमपरं परम्॥”
“मैंने कुछ अपनी इच्छासे लिखा है और कुछ
दूसरोंके अनुरोध करनेपर लिखा है। जिसमें पूर्वापर
(पहले और पीछेका) सम्बन्ध है, उसे अपनी इच्छासे
लिखा है। जिसमें पूर्वापर सम्बन्ध नहीं है, उसको
दूसरोंकी इच्छासे लिखा है।” अर्थात् उन्होंने कहीं पति
लिखा है और कहीं उपपति—इसमें सङ्गति नहीं है,
इसलिये यह उनका विचार नहीं है।
यदि श्रीजीव गोस्वामी रूपानुग नहीं होते, तो वे
श्रीरूप गोस्वामी रचित श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु और
उज्ज्वलनीलमणि आदि ग्रन्थोंकी टीकाओंकी रचना क्यों
करते?
श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने भी कहा है कि
श्रीजीव गोस्वामी कभी भी स्वकीयाके पक्षमें अपनी राय
नहीं दे सकते हैं। उन्होंने स्वयंकी इच्छासे नहीं, अपितु
दूसरोंकी इच्छासे ही ऐसी व्याख्या की है। इसलिये
उन्होंने अपनी व्याख्याके उपसंहारमें स्वयं ही इस
बातको स्वीकार किया है। उनकी अपनी इच्छा क्या
है? जो श्रीरूप गोस्वामी और जो श्रीसनातन गोस्वामीकी
इच्छा है। दूसरोंकी इच्छासे उन्होंने स्वकीयाका प्रतिपादन
किया है जिससे लौकिक दृष्टिसे अनाधिकारी व्यक्ति
उनमें प्रवेश न करें। विशेषकर महाप्रभुके चरणाश्रित
अन्तरङ्ग भक्तोंके लिये स्वकीयाके पक्षमें व्याख्या कदापि
ग्राह्य नहीं हो सकती।
जीव गोस्वामीके आशयको समझना बहुत कठिन
है। श्रीनिवासाचार्य, श्रीनरोत्तम ठाकुर और श्रीश्यामानन्द
प्रभु—ये तीनों ही श्रीजीव गोस्वामीके शिक्षा-शिष्य हैं
तथा पारकीया भावको माननेवाले हैं। इसलिये इन
शिष्योंके विचारोंसे समझा जायेगा कि श्रीजीव गोस्वामीने
उन्हें जो शिक्षा दी, उसीका उन्होंने प्रचार किया।
श्रीनिवासाचार्य प्रभुकी ज्येष्ठ कन्या हेमलता ठाकुराणी हैं
और उनके शिष्य यदुनन्दनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ
'कर्णानन्द'के चतुर्थ निर्यासमें लिखा है—
“एइ सब निर्द्धार करि श्रीदासगोसाञि।
नियम करि कुण्डतीरे बसिला तथाइ॥
दसवाँ अध्याय | 71