श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
[ 18/31-39 अठारहवाँ अध्याय 435
मूच्छित अवस्थामें बहते-बहते कोणार्ककी ओर जाना :-
कोणार्केर दिके प्रभुरे तरङ्गे लञा याय।
कभु डुबाञा राखे, कभु भासाञा लञा याय॥ 31॥
अनुवाद—समुद्रकी लहरें महाप्रभुको कोणार्ककी
ओर ले जा रही थीं, कभी वे उन्हें डुबोकर और कभी
उन्हें ऊपर बहाते हुए ले जा रही थीं॥ 31॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'कोणार्क',—'अर्कतीर्थ', जिसे
आजकल 'कोणारक' कहते हैं॥ 31॥
अनुभाष्य—'कोणार्क',—उत्तर-अक्षांश 19°53′ 25″;
पुरीसे उन्नीस मील उत्तरमें समुद्रतटपर स्थित। तेरहवीं
शक-शताब्दीके प्रारम्भमें इस स्थानपर वास्तुशिल्पकी
निपुणताके उत्कृष्ट उदाहरणस्वरूप काले पत्थरके
सूर्य-मन्दिरके निर्माणका प्रयास हुआ॥ 31॥
भावमें निमग्न गोपी-किङ्करी-अभिमानी
महाप्रभुकी उद्घूर्णा :-
यमुनाते जलकेलि गोपीगण-सङ्गे।
कृष्ण करेन, महाप्रभु मग्न सेइ रङ्गे॥ 32॥
अनुवाद—'श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ यमुनामें जलकेलि
कर रहे हैं'—महाप्रभु इसी लीलाके आनन्दमें निमग्न
थे॥ 32॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 18/80-82 संख्या देखें॥ 32॥
श्रीस्वरूपादिके द्वारा महाप्रभुको ढूँढ़ना :-
इँहा स्वरूपादिगण प्रभु ना देखिया।
'काँहा गेला प्रभु?' कहे चमकित हञा॥ 33॥
अनुवाद—इधर श्रीस्वरूप दामोदर आदि महाप्रभुको
नहीं देखकर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे,—'महाप्रभु
कहाँ चले गये?' 33॥
निरङ्कुश इच्छाशक्तिके परिचालक
महाप्रभुके प्रति स्वतन्त्र-ज्ञान :-
मनोवेगे गेला प्रभु, देखिते नारिला।
प्रभुरे ना देखिया संशय करिते लागिला॥ 34॥
मन-मनमें वितर्क :-
'जगन्नाथ देखिते, किंवा देवालये गेला?
अन्य उद्याने किंवा उन्मादे पड़िला?? 35॥
गुण्डिचा-मन्दिरे गेला, किंवा नरेन्द्ररे?
चटक-पर्वते गेला, किंवा कोणार्के??'36॥
अनुवाद—महाप्रभु मनके वेगसे चले गये, कोई
उन्हें देख नहीं पाया। श्रीस्वरूप दामोदरादि महाप्रभुको
नहीं देखकर कुछ संशय करते हुए कहने लगे,—'कहीं
वे श्रीजगन्नाथके दर्शन करनेके लिये मन्दिर तो नहीं गये
हैं अथवा किसी अन्य उद्यानमें उन्मादग्रस्त होकर गिर
पड़े हैं? क्या महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिरमें गये हैं या
नरेन्द्र सरोवर गये हैं अथवा चटक पर्वतपर गये हैं या
फिर कोणार्क तो नहीं चले गये हैं?' 34-36॥
समुद्रके तटपर गमन :-
एत बलि' सबे फिरे प्रभुरे चाहिया।
समुद्रेर तीरे आइला कतजन लञा॥ 37॥
महाप्रभुके नहीं मिलनेपर उनके अन्तर्धानका अनुमान :-
चाहिये बेड़ाइते ऐछे रात्रि शेष हैल।
'अन्तर्धान हइला प्रभु',—निश्चय करिल॥ 38॥
मन-ही-मन भक्तोंके द्वारा अमङ्गलकी आशङ्का :-
प्रभुर विच्छेदे कार देहे नाहि प्राण।
अनिष्टाशङ्का बिना कार मने नाहि आन॥ 39॥
अनुवाद—ऐसा कहते हुए सभी भक्त महाप्रभुको
ढूँढ़ते हुए इधर-उधर घूमने लगे। श्रीस्वरूप दामोदर
कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर समुद्रके तटपर आ
गये। महाप्रभुको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रात्रि समाप्त हो गयी और
उन्होंने यह निश्चय किया,—'महाप्रभु अन्तर्धान हो गये
हैं।' महाप्रभुके विरहमें सभीको लगा कि उनकी देहमें
प्राण नहीं हैं। महाप्रभुके अनिष्टकी आशङ्काको छोड़कर
किसीके मनमें अन्य कोई बात नहीं आ रही
थी॥ 37-39॥
436 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/40-51 ]
प्रियहृदयमें प्रियके अदर्शन-हेतु अमङ्गलकी आशङ्का :-
अभिज्ञानशकुन्तल-नाटकके चतुर्थ अङ्कमें
शकुन्तलाके प्रति प्रियम्वदा-वचन-
अनिष्टाशङ्कीनि बन्धुहृदयानि भवन्ति हि ॥ 40 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 40 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—बन्धुका हृदय सदैव बन्धुके अनिष्टकी आशङ्का करता है॥ 40 ॥
अनुभाष्य—मूलग्रन्थमें—"सिनेहो पावसङ्की" अथवा "सिनेहो पावमासङ्कादि"—ऐसा पाठ देखा जाता है॥ 40 ॥
सभीके द्वारा मिलकर महाप्रभुको ढूँढ़ना :-
समुद्रेर तीरे आसि' युकति करिला।
चिरायु-पर्वत-दिके कतजन गेला ॥ 41 ॥
अनुवाद—उन सबने समुद्रके तटपर आकर कुछ विचार-विमर्श किया। तब कुछ भक्त चिरायु-पर्वतकी ओर गये ॥ 41 ॥
अनुभाष्य—'चिरायु-पर्वत',—चटक-पर्वत ॥ 41 ॥
पूर्व दिशाय चले स्वरूप लञा कतजन।
सिन्धु-तीरे-नीरे करेन प्रभुर अन्वेषण ॥ 42 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर कुछ भक्तोंको अपने साथ लेकर पूर्व दिशाकी ओर चल दिये। वे महाप्रभुको समुद्रके तटपर और जलमें भी ढूँढ़ने लगे ॥ 42 ॥
विषादे विह्वल सबे, नाहिक 'चेतन'।
तबु प्रेमे बुले करि' प्रभुर अन्वेषण ॥ 43 ॥
अनुवाद—सभी भक्त महाप्रभुके विरह-दुःखसे ऐसे विह्वल हो रहे थे मानो उनकी चेतना लुप्त हो गयी हो। तो भी वे महाप्रभुके प्रेमके कारण उन्हें ढूँढ़ते हुए इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे॥ 43 ॥
अद्भुत-भावाविष्ट एक मछुवारेके साथ साक्षात्कार :-
देखेन, एक जालिया आइसे कान्धे जाल करि'।
हासे, कान्दे, नाचे, गाय, बले 'हरि' 'हरि' ॥ 44 ॥
अनुवाद—तभी श्रीस्वरूप दामोदरादि भक्तोंने देखा कि एक मछुवारा अपने कन्धेपर जाल डालकर आ रहा है। वह 'हरि', 'हरि' बोलते हुए कभी हँस रहा था, कभी रो रहा था, कभी नाच रहा था और कभी गा रहा था॥ 44 ॥
मछुवारेसे उसके भावावेशके कारणकी जिज्ञासा :-
जालियार चेष्टा देखि' सबार चमत्कार।
स्वरूप-गोसाञि तारे पुछेन समाचार ॥ 45 ॥
ग्रह-आविष्ट मछुवारेके द्वारा महाप्रभुके संवाद और उनकी अवस्थाका वर्णन :-
"कह जालिया, एइ दिके देखिला एकजने?
तोमार एइ दशा केने,—कह त' कारण??" 46 ॥
अनुवाद—उस मछुवारेके व्यवहारको देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गये। श्रीस्वरूप दामोदरने उस मछुवारेसे जानकारी लेनेके लिये पूछा,—"हे मछुवारे ! बतलाओ तो, क्या तुमने इस तरफ किसी एक अकेले व्यक्तिको देखा है? तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है—इसका कारण तो बतलाओ?" 45-46 ॥
जालिया कहे,—"इँहा एक मनुष्य ना देखिल।
जाल बाहिते एक मृत मोर जाले आइल ॥ 47 ॥
बड़ मत्स्य बलि' आमि उठाइलुँ यतने।
मृतक देखिते मोर भय हैल मने ॥ 48 ॥
जाल खसाइते तार अङ्ग-स्पर्श हइल।
स्पर्शमात्रे सेइ भूत हृदये पशिल ॥ 49 ॥
भये कम्प हैल, मोर नेत्रे बहे जल।
गद्गद वाणी रोम उठिल सकल ॥ 50 ॥
किवा ब्रह्मदैत्य, किवा भूत, कहने ना याय।
दर्शनमात्रे मनुष्येर पशे सेइ काय ॥ 51 ॥
अनुवाद—मछुवारेने कहा,—"मैंने यहाँ किसी अकेले मनुष्यको नहीं देखा, किन्तु जब मैंने समुद्रमें जाल
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक पाठ (transcription) प्रस्तुत है:
[ 18/47-62
अठारहवाँ अध्याय
437
फेंका तो एक मृत व्यक्ति मेरे जालमें आ गया। मैंने
उसे बहुत बड़ी मछली समझकर बहुत परिश्रमसे बाहर
निकाला, किन्तु मेरे मनमें मृत व्यक्तिको देखकर भय
उत्पन्न हो गया। उस व्यक्तिको जालसे छुड़ाते समय मेरा
उसके शरीरसे स्पर्श हो गया। स्पर्शमात्रसे वह भूत मेरे
हृदयमें प्रविष्ट हो गया। मैं भयसे काँपने लगा, मेरे
नेत्रोंसे अश्रु बहने लगे, मेरी वाणी गद्गद हो गयी और
मुझमें रोमाञ्च होने लगा। वह कोई ब्रह्म-दैत्य है
अथवा कोई भूत, यह मैं कह नहीं सकता। दर्शन
करने मात्रसे ही वह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश कर जाता
है॥ 47-51 ॥
शरीर दीघल तार-हात पाँच-सात।
एक हस्त पद तार, तिन तिन हात ॥ 52 ॥
अस्थि-सन्धि छुटि' चर्म करे नड़बड़े।
ताहा देखि' प्राण कार नाहि रहे धरे ॥ 53 ॥
मड़ा रूप धरि' रहे उत्तान-नयन।
कभु गोँ गोँ करे, कभु देखि अचेतन ॥ 54 ॥
साक्षात् देखेछौं, - मोरे पाइल सेइ भूत।
मुइ मैले मोर कैछे जीवे स्त्री-पूत ॥ 55 ॥
सेइ त' भूतेर कथा कहन ना याय।
ओझा ठाञि याइछौं, - यदि से भूत छोड़ाय ॥ 56 ॥
अनुवाद-उसका शरीर पाँच-सात हाथ लम्बा है,
उसका एक-एक हाथ-पाँव तीन-तीन हाथ लम्बा है।
उसकी हड्डियोंके जोड़ खुल गये हैं और उसकी त्वचा
लटक गयी है। उसे देखकर कोई प्राण धारण नहीं कर
सकता। उसने मरे हुए व्यक्तिकी भाँति रूप धारण किया
हुआ है और उसके नेत्र ऊपर चढ़े हुए हैं। कभी तो
वह गोँ-गोँ करता है और कभी अचेतन दिखायी देता
है। मैंने उस भूतको साक्षात् रूपमें देखा है, वह भूत
मेरे पीछे लग गया है। मेरे मरनेपर मेरी पत्नी और
पुत्रका जीवन कैसे चलेगा? उस भूतकी बात कही नहीं
जा सकती, मैं ओझाके पास जा रहा हूँ, हो सकता
है वह मुझे भूतसे छुड़ा दे॥ 52-56 ॥
अनुभाष्य- 'जीवे',-बचेंगे ॥ 55 ॥
श्रीनृसिंह-स्मरणसे समस्त विपत्तियोंका विनाश :-
एका रात्र्ये बुलि' मत्स्य मारिये निर्जने।
भूत-प्रेत आमार ना लागे 'नृसिंह'-स्मरणे ॥ 57 ॥
एइ भूत नृसिंह-नामे चापये द्विगुणे।
ताहार आकार देखिते भय लागे मने ॥ 58 ॥
ओथा ना याइह, आमि निषेधि तोमारे।
ताँहा गेले सेइ भूत लागिबे सबारे ॥ "59 ॥
अनुवाद-मैं अकेला ही रात्रिमें घूमकर निर्जन
स्थानपर मछलियोंको मारता हूँ। मुझे श्रीनृसिंह भगवान्के
स्मरणके प्रभावसे भूत-प्रेत आदि नहीं लगते। किन्तु
यह भूत नृसिंह भगवान्का नाम लेनेसे मुझे दो गुणा
अधिक बलसे दबाता है। उसका आकार देखते ही
मनमें भय हो जाता है। मैं आप लोगोंको भी मना कर
रहा हूँ कि आप उधर मत जाना। वहाँ जानेपर आप
सब लोगोंपर भी वह भूत चढ़ जायेगा ॥ "57-59 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके सन्धान-प्राप्तिके
विषयमें यथार्थ अनुमान :-
एत शुनि' स्वरूप-गोसाञि सब तत्त्व जानि'।
जालियारे किछु कय सुमधुर वाणी ॥ 60 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको आश्वासन
और उसके भयको दूर करना :-
“आमि-बड़ ओझा, जानि भूत छोड़ाइते।”
मन्त्र पड़ि' श्रीहस्त दिला ताहार माथाते ॥ 61 ॥
तिन चापड़ मारि' कहे, - "भूत पलाइल।
भय ना पाइह" बलि' सुस्थिर करिल ॥ 62 ॥
अनुवाद-यह सुनकर श्रीस्वरूप दामोदर सब कुछ
समझ गये और उन्होंने मछुवारेको अत्यन्त मधुर
वाणीसे कहा, - "मैं एक बहुत बड़ा ओझा हूँ, मैं भूत
438 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/60-72 ]
छुड़ाना जानता हूँ।” ऐसा कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने
मन्त्र पढ़कर अपने श्रीहस्तको उस मछुवारेके सिरपर
रख दिया। तब उन्होंने उस मछुवारेको तीन थप्पड़
लगानेके बाद कहा,—“तुम्हारा भूत भाग गया है। अब
डरनेकी कोई बात नहीं है।” ऐसा कहकर उन्होंने
मछुवारेको सुस्थिर किया॥ 60-62 ॥
एके प्रेम, आरे भय—द्विगुण अस्थिर।
भय-अंश गेल,—से हैल किछु धीर ॥ 63 ॥
अनुवाद—मछुवारेमें एक तो प्रेम, उसपर भी
भय—इसलिये पहले वह दोगुना अस्थिर था। अब
उसका भयवाला अंश तो दूर हो गया, इसलिये उसको
कुछ धैर्य आ गया ॥ 63 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका परिचय देना :—
स्वरूप कहे,—“याँरे तुमि कर ‘भूत’-ज्ञान।
भूत नहे, तेंहो—कृष्णचैतन्य भगवान् ॥ 64 ॥
प्रेमावेशे पड़िला तेंहो समुद्रेर जले।
ताँरे तुमि उठाइला आपनार जाले ॥ 65 ॥
ताँर स्पर्शे हैल तोमार कृष्णप्रेमोदय।
भूत-प्रेत-ज्ञाने तोमार हैल महाभय ॥ 66 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको महाप्रभुको
दिखलानेका आदेश :—
एबे भय गेल, तोमार मन हैल स्थिरे।
काँहा ताँरे उठाञाछ, देखाह आमारे ॥”67॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने मछुवारेसे कहा,—“जिन्हें
तुम भूत मान रहे हो, वे भूत नहीं अपितु वे भगवान्
श्रीकृष्णचैतन्य हैं। वे प्रेमके आवेशमें समुद्रके जलमें
जा पड़े थे, तुमने उन्हींको अपने जालमें पकड़कर
उठाया है। उनके स्पर्शसे ही तुममें कृष्णप्रेम उदित हुआ
है। उन्हें भूत-प्रेत समझनेके कारण तुम्हें बहुत भय
लगा। अब तुम्हारा भय दूर हो गया है और तुम्हारा
मन स्थिर हो गया है। अब तुम हमें दिखलाओ कि
तुमने उन्हें समुद्रसे निकालकर कहाँ रखा है॥” 64-67॥
बुद्धिविभ्रम :—
जालिया कहे,—“प्रभुरे देख्याछौं बारबार।
तेंहो नहेन एइ अतिविकृत आकार ॥”68॥
अनुवाद—मछुवारेने कहा,—“मैंने महाप्रभुको अनेक
बार देखा है। ये वे नहीं हैं, यह तो कोई बहुत-ही
विकृत-आकारका व्यक्ति है॥”68॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके प्रेमका वर्णन :—
स्वरूप कहे,—“ताँर हय प्रेमेर विकार।
अस्थि-सन्धि छाड़े, हय अति दीर्घकार ॥”69॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“महाप्रभुमें प्रेमका
विकार उत्पन्न होता है, उसी कारण उनकी हड्डियोंके
जोड़ खुल जाते हैं और वे बहुत दीर्घकार हो जाते
हैं॥”69॥
मछुवारेके द्वारा सभीको महाप्रभुके दर्शन
करवाना; महाप्रभुकी अवस्था :—
शुनि’ सेइ जालिया आनन्दित हइल।
सबा लञा गेल, महाप्रभुरे देखाइल ॥ 70 ॥
भूमिते पड़िया आछेन दीर्घ सब काय।
जले श्वेत-तनु, बालु लाग्याछे गाय ॥ 71 ॥
अतिदीर्घ शिथिल तनु-चर्म नट्काय।
दूर पथ उठाञा आनन ना याय ॥ 72 ॥
अनुवाद—यह सुनकर मछुवारा आनन्दित हो गया।
उसने सभी भक्तोंको ले जाकर महाप्रभुके दर्शन
करवाये। महाप्रभु भूमिपर पड़े हुए थे, उनका शरीर
बहुत लम्बा हो गया था। बहुत समय तक जलमें
रहनेके कारण उनका शरीर सफेद पड़ गया था और
उनके पूरे शरीरपर बालू लगी हुई थी। महाप्रभुकी देह
बहुत लम्बी हो गयी थी और शिथिल होकर त्वचा
लटक गयी थी, इसलिये उन्हें बहुत दूर तक उठाकर
नहीं लाया जा सकता था॥ 70-72 ॥
[ 18/73-82
अठारहवाँ अध्याय
439
महाप्रभुको चेतनावस्थामें लानेके लिये बहुत प्रयत्न और सेवा :-
आर्द्र कौपीन दूर करि' शुष्क पराञा।
बहिर्वासे शोयाइला बालुका छाड़ाञा ॥ 73 ॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुके गीले कौपीनको उतारकर सूखा कौपीन बाँध दिया, उन्होंने महाप्रभुकी देहसे बालूको हटाकर उन्हें बहिर्वास वस्त्रपर लिटा दिया ॥ 73 ॥
सभीके द्वारा उच्च-सङ्कीर्तन :-
सबे मेलि' उच्च करि' करेन सङ्कीर्त्तने।
उच्च करि' कृष्णनाम कहेन प्रभुर काणे ॥ 74 ॥
अनुवाद-सभी भक्त मिलकर उच्च स्वरमें सङ्कीर्तन करने लगे। वे सभी उच्च स्वरसे महाप्रभुके कानमें कृष्णनामका कीर्तन करने लगे ॥ 74 ॥
महाप्रभुका अर्द्धबाह्यदशामें आगमन :-
कतक्षणे प्रभुर काणे शब्द परशिल।
हुङ्कार करिया प्रभु तबहिँ उठिल ॥ 75 ॥
उठितेइ अस्थि सब लागिल निज-स्थाने।
'अर्द्धबाह्ये', इति-उति करेन दरशने ॥ 76 ॥
अनुवाद-कुछ देरमें महाप्रभुके कानमें कृष्णनाम प्रविष्ट हुआ, तभी महाप्रभु हुङ्कार करते हुए उठ खड़े हुए। उठते ही उनकी सब हड्डियाँ अपने-अपने स्थानपर जुड़ गयी, वे अर्द्धबाह्य दशामें इधर-उधर देखने लगे ॥ 75-76 ॥
महाप्रभुकी तीन दशाओंका परिचय :-
तिन-दशाय महाप्रभु रहेन सर्वकाल।
'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा', 'अर्द्धबाह्य' आर ॥ 77 ॥
अनुवाद-महाप्रभु सब समय 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा' और 'अर्द्धबाह्यदशा'-इन तीनों दशाओंमेंसे किसी-न-किसी एक दशामें रहते ॥ 77 ॥
स्वयंको गोपियोंकी दासी माननेवाले महाप्रभुकी अर्द्धबाह्य-दशाका वर्णन (चित्रजल्प) :-
अन्तर्दशार किछु घोर, किछु बाह्य-ज्ञान।
सेइ दशा कहेन भक्त 'अर्द्धबाह्य' नाम ॥ 78 ॥
अनुवाद-जब अन्तर्दशाकी प्रबलता रहती है और कुछ-कुछ बाह्य ज्ञान भी होता है, तो भक्त लोग उस दशाको 'अर्द्धबाह्य' दशा कहते हैं ॥ 78 ॥
'अर्द्धबाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप-वचने।
आभासे कहेन प्रभु, शुनेन भक्तगणे ॥ 79 ॥
“कालिन्दी देखिया आमि गेलाङ वृन्दावन।
देखि, - जलक्रीड़ा करेन व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 80 ॥
राधिकादि गोपीगण-सङ्गे एक मेलि'।
यमुनार जले महारङ्गे करेन केलि ॥ 81 ॥
तीरे रहिं' देखि आमि सखीगण-सङ्गे।
एकसखी सखीगणे देखाय सेइ रङ्गे ॥ 82 ॥
अनुवाद-महाप्रभु उस अर्द्धबाह्य दशामें प्रलापपूर्ण वचन कहने लगे। महाप्रभु मन्द वाणीसे कहने लगे और भक्तगण उन्हें ध्यानसे श्रवण करने लगे। [मञ्जरी भावमें विभावित] महाप्रभुने कहा, - “मैं कालिन्दीको (यमुनाको) देखकर वृन्दावन गयी थी, मैंने देखा कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण कालिन्दीमें जल-क्रीड़ा कर रहे थे। वे श्रीराधिका आदि गोपियोंके साथ मिलकर यमुनाके जलमें महा-आनन्दसे क्रीड़ा कर रहे थे। मैं तटपर रहकर सखियोंके (मञ्जरियोंके) साथ वह क्रीड़ा देख रही थी। उनमें-से एक सखी अन्य सखियोंको श्रीकृष्णके साथ श्रीराधादि गोपियोंकी लीलाके आनन्दका वर्णन कर रही थी।॥ 79-82 ॥
अनुभाष्य-'अपनी-अपनी यूथेश्वरीके सेवानन्द-सुखमें तत्पर मैं और मेरी जैसी अन्यान्य नवीन लाल्य किङ्करियाँ (मञ्जरियाँ)'-इस वाक्यके द्वारा आत्मेन्द्रिय सम्भोगकी वाञ्छाके उद्देश्यसे साधकके लिये अहंग्रहोपासना
440 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/82-87 ]
निषिद्ध हुई है; मध्यलीला 8/202-204 संख्याका अनुभाष्य
देखें ॥ 82 ॥
स्वयंको गोपियोंकी दासी जानकर
महाप्रभुके द्वारा श्रीकृष्णकी श्रीराधादि
गोपियोंके साथ जलक्रीड़ाका वर्णन (चित्रजल्प) :—
यथा राग—
पट्टवस्त्र, अलङ्कारे, समर्पिया सखी करे,
सूक्ष्म-शुक्लवस्त्र परिधान।
कृष्ण लञा कान्तागण, कैला जलावगाहन,
जलकेलि रचिला सुठाम ॥ 83 ॥
अनुवाद—[श्रीकृष्णके साथ क्रीड़ा कर रही] गोपियोंने अपने रेशमी वस्त्र और अलङ्कार तटपर खड़ी सखियोंके (मञ्जरियोंके) हाथोंमें सौंपकर स्वयं सूक्ष्म श्वेत वस्त्र पहन लिये। तब श्रीकृष्णने कान्ताओंको अपने साथ लेकर जलमें प्रवेश किया और अत्यन्त सुन्दर जलकेलि की ॥ 83 ॥
सखि हे, देख कृष्णेर जलकेलि रङ्गे।
कृष्ण—मत्त करिवर, चञ्चल कर-पुष्कर,
गोपीगण करि' निज सङ्गे ॥ 84 ॥ ध्रु॥
आरम्भिला जलकेलि, अन्योऽन्ये जल फेलाफेली,
हुड़ाहूड़ि, वर्षे जलधार।
सबे जय-पराजय, नाहि किछु निश्चय,
जलयुद्ध बाड़िल अपार ॥ 85 ॥
अनुवाद—हे सखियों! श्रीकृष्णकी आनन्दमयी जलकेलिको देखो। मत्त गजराजकी भाँति श्रीकृष्णने गोपियोंको अपने साथ लेकर अपने चञ्चल हस्तरूपी कमलके द्वारा जलकेलि आरम्भ की है। श्रीकृष्ण और गोपियाँ एक-दूसरेके ऊपर जल उड़ेल रहे हैं और उनमें होड़ लग गयी है। उस होड़में जलकी बड़ी धाराओंका वर्षण हो रहा है, इस कारण किसकी जय हो रही है, किसकी पराजय—कुछ भी निश्चित नहीं हो पा रहा है। इस जलक्रीड़ामें जल उड़ेलनाका युद्ध अपार बढ़ गया है ॥ 84-85 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'करपुष्कर',—करकमल; (मतान्तरमें सूँडका अग्रभाग) ॥ 84 ॥
वर्षे स्थिर तड़िद्घन, सिञ्चे श्याम नवघन,
घन वर्षे तड़ित्-उपरे।
सखीगणेर नयन, तृषित चातकीगण,
सेइ अमृत सुखे पान करे ॥ 86 ॥
अनुवाद—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे। प्यासे चातककी (पपीहेकी) भाँति मञ्जरियोंके नयन उस अमृतका सुखपूर्वक पान कर रहे थे ॥ 86 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—स्थिर विद्युत्की भाँति गोपियाँ नवघनश्यामरूप कृष्णको जलकी वर्षा करके सींचने लगी, दूसरी ओर, श्यामरूपी नवघन भी पुनः (गोपीरूपी) विद्युत्पर जलकी वर्षा करने लगे ॥ 86 ॥
प्रथमे युद्ध 'जलाञ्जलि', तबे युद्ध 'कराकरिं',
तार पाछे युद्ध 'मुखामुखि'।
तबे युद्ध 'हृदाहृदि', तबे हैल 'वादावादि',
तबे हैल युद्ध 'नखानखि' ॥ 87 ॥
अनुवाद—पहले एक दूसरेपर जल फेंकते हुए युद्ध प्रारम्भ हुआ, उसके बाद हाथसे हाथका युद्ध होने लगा, फिर वह मुखसे मुखके युद्धमें परिवर्तित हो गया। तब हृदय-हृदयमें युद्ध होने लगा, फिर युद्धने वाद-विवादका रूप धारण किया और फिर नखसे नखका युद्ध होने लगा ॥ 87 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'रदा-रदि' ॥ 87 ॥
यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
[ 18/88–91 अठारहवाँ अध्याय 441 ]
सहस्र-करे जल-सेके, सहस्र-नेत्रे गोपी देखे,
सहस्रपाद निकटे गमने।
सहस्रमुख-चुम्बने, सहस्रवपु-सङ्गमे,
गोपीमर्म सुने सहस्र-काणे॥ 88॥
अनुवाद—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो श्रीकृष्ण सैंकड़ों हाथोंसे जल उड़ेल रहे हैं, सैंकड़ों नेत्रोंसे गोपियोंको देख रहे हैं, सैंकड़ों पदोंसे उनके निकट जा रहे हैं, सैंकड़ों मुखोंसे उनका चुम्बन कर रहे हैं, सैंकड़ों शरीरोंसे गोपियोंके साथ सङ्गम कर रहे हैं और सैंकड़ों कानोंसे गोपियोंके हास-परिहासको श्रवण कर रहे हैं॥ 88॥
अमृताणुकणा—"सहस्रपाद निकटे गमन",—सहस्रपाद अर्थात् सूर्य; सिञ्चित जलके अतिवेगके कारण सूर्यके निकट अर्थात् बहुत ऊँचा जाना। पाठान्तरमें "सहस्र-पदे निकटे गमन"। यहाँ 'सहस्र'का अर्थ असंख्य है। श्रीकृष्ण और गोपियोंके जलयुद्धके छलसे प्रेमात्मक मिलनमें परस्परके असीम अनुरागके प्रकाशरूपमें 'सहस्र'-शब्दका व्यवहार हुआ है, जैसे, "तुण्डे ताण्डविनी-रतिं वितनुते तुण्डावली लब्धये" (विदग्धमाधव) अर्थात् "जब ये (कृष्ण—ये दो अक्षर) मुखमें (जिह्वापर) नृत्याङ्गनाकी भाँति नृत्य करते हैं, तब अनेकानेक मुख पानेकी अपूर्व लालसा होती है।"॥ 88॥
कृष्ण राधा लञा बले, गेला कण्ठलग्न-जले,
छाड़िला ताँहा, याँहा अगाध पानी।
तेंहो कृष्णकण्ठ धरि', भासे जलेर उपरि,
गजोद्घाते यैछे कमलिनी॥ 89॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण बलपूर्वक श्रीराधाको अन्य एक स्थानपर ले गये जहाँपर श्रीराधाके कण्ठ तक जल था। फिर श्रीकृष्णने श्रीराधाको वहाँ छोड़ दिया जहाँपर अगाध जल था। श्रीराधा श्रीकृष्णके कण्ठको पकड़कर जलके ऊपर ऐसे तैरने लगीं जैसे जलमें निमग्न हाथीकी सूँडके द्वारा उखाड़ी हुई कमलिनी जलपर तैरती है॥ 89॥
यत गोपसुन्दरी, कृष्ण तत रूप धरि',
सबार वस्त्र करिला हरणे।
यमुना-जल निर्मल, अङ्ग करे झलमल,
सुखे करे कृष्ण दरशने॥ 90॥
अनुवाद—जितनी गोप-सुन्दरियाँ थी, श्रीकृष्णने उतने ही रूप धारण करके जलके भीतर ही उन सबके वस्त्रोंका हरण कर लिया। यमुनाजीका जल निर्मल स्वच्छ होनेके कारण श्रीकृष्ण आनन्दपूर्वक गोपियोंके झलमल कर रहे अङ्गोंके दर्शन करने लगे॥ 90॥
पद्मिनीलता-सखीचय, कैल कारो सहाय,
तार हस्ते पत्र समर्पिल।
केह मुक्त-केशपाश, आगे कैल अधोवास,
हस्ते केह कञ्चुलि धरिल॥ 91॥
अनुवाद—कमलकी नाल गोपियोंकी सखियाँ हैं और सखीके रूपमें सहायता करते हुए उन्होंने किसी-किसी गोपीके हाथमें उनके अङ्गोंको ढकनेके लिये जलके ऊपर तैरते अपने बड़े-बड़े पत्ते दिये। कुछ गोपियोंने अपने केशोंको खोलकर उन्हें अधोवासकी (लहँगेकी) भाँति व्यवस्थित किया और अन्य कुछ गोपियोंने अपने हाथोंको वक्षःस्थलको ढकनेवाली चोलीके रूपमें उपयोग किया॥ 91॥
अमृतप्रवाह भाष्य—अङ्ग आवरणके लिये हाथरूपी कमलका पत्ता; किसीने केशोंको खोलकर लहँगेके जैसी रचना की; किसी-किसीने हाथोंको 'चोली' बना लिया॥ 91॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—'स्वस्तिके काँचुली रचिलं॥ 91॥
अमृताणुकणा—जलमें तैरती हुई कमल-नालने सखीरूपमें सहायताके लिये किसी-किसी गोपीके हाथोंमें पत्ते समर्पित किये, उसके द्वारा उन्होंने वक्षके आवरणकी रचना की। किसीने केश खोलकर अपने आगे उनका
442 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/91-98 ]
विस्तार करके लहँगेका निर्माण किया, किसी किसीने अपने हाथोंको 'चोली'के अर्थात् वक्षके आवरणरूपमें धारण किया॥91॥
कृष्णोर कलह राधा-सने, गोपीगण सेइक्षणे,
हेमाब्ज-वने गेला लुकाइते।
आकण्ठ-वपु जले पशे, मुखमात्र जले भासे,
पद्मे-मुखे ना पारि चिन्ते॥92॥
अनुवाद—फिर श्रीकृष्णका श्रीराधाके साथ प्रेम-कलह हुआ, तब अन्य सब गोपियाँ स्वर्ण-कमलके समूहमें जाकर छिप गयीं। कण्ठ तक उनका शरीर जलमें डूबा हुआ था, केवल उनका मुख ही स्वर्ण कमलोंके साथ जलके ऊपर तैर रहा था। उन गोपियोंके मुखोंकी स्वर्ण-कमलोंसे पृथक् पहचान ही नहीं हो रही थी॥92॥
एथा कृष्ण राधा-सने, कैला ये आछिल मने,
गोपीगणे अन्वेषिते गेला।
तबे राधा सूक्ष्ममति, जानिया सखीर स्थिति,
सखीमध्ये आसिया मिलिला॥93॥
अनुवाद—इधर, श्रीकृष्णने श्रीराधाके साथ एकान्तमें अपनी इच्छानुसार क्रीड़ा की। तत्पश्चात् श्रीकृष्ण अन्यान्य गोपियोंको ढूँढ़ने लगे। श्रीराधा तीक्ष्ण बुद्धिवाली हैं, इसलिये उन्हें सखियोंकी स्थितिका सहज ही पता लग गया और वे तुरन्त सखियोंके बीचमें आकर मिल गयीं॥93॥
यत हेमाब्ज जले भासे, तत नीलाब्ज तार पाशे,
आसि' आसि' करये मिलन।
नीलाब्जे हेमाब्जे ठेके, युद्ध हय प्रत्येके,
कौतुके देखे तीरे गोपीगण॥94॥
अनुवाद—जितने स्वर्णकमल जलके ऊपर तैर रहे थे, उतने ही नीलकमल उनके पास आ-आकर उनसे मिल रहे थे। नीलकमलसे स्वर्णकमलके टकरानेपर प्रत्येकमें युद्ध हुआ। यमुनाके तटपर खड़ी हुई मञ्जरियाँ इस कौतुकको देखने लगीं॥94॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'हेमाब्ज',—गोपी; 'नीलाब्ज',—कृष्ण; सेवापरायणा गोपियाँ तटपर खड़ी होकर दोनोंकी क्रीड़ा देखने लगीं॥94॥
चक्रवाक-मण्डल, पृथक् पृथक् युगल,
जल हैते करिल उद्गम।
उठिल पद्ममण्डल, पृथक् पृथक् युगल,
चक्रवाके कैल आच्छादन॥95॥
उठिल बहु रक्तोत्पल, पृथक् पृथक् युगल,
पद्मगणेर कैल निवारण।
'पद्म' चाहे लुटि' निते, 'उत्पल' चाहे राखिते,
'चक्रवाक लागि' दुँहार रण॥96॥
पद्मोत्पल-अचेतन, चक्रवाक-सचेतन,
चक्रवाके पद्म आस्वादय।
इँहा दुँहार उलटा स्थिति, धर्म हैल विपरीत,
कृष्णेर राज्ये ऐछे अन्याय हय॥97॥
मित्रेर मित्र सहवासी, चक्रवाके लुटे आसि',
कृष्णेर राज्ये ऐछे व्यवहार।
अपरिचित शत्रुर मित्र, राखे उत्पल,—ए बड़ चित्र,
एइ बड़ 'विरोध-अलङ्कार'॥98॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य एवं अनुभाष्य देखें॥95-98॥
अमृतप्रवाह भाष्य—गोपियोंके स्तन-चक्रवाक (एक प्रकारका जलपक्षी) मण्डल हैं; सभी जब पृथक् पृथक् युगलस्वरूपमें जलसे उठे, उस समय पृथक् पृथक् कृष्णके नीलकमलस्वरूप दोनों हाथोंने चक्रवाकोंका आच्छादन किया। गोपियोंके हाथ—रक्तकमल (लालकमल) हैं; वे युगल-युगल (दो-दो) उठकर नीलकमलोंको रोकने लगे। नीलकमल चक्रवाकोंको लूटना चाहते थे और रक्तकमल उनकी रक्षा करना चाहते थे, इसलिये दोनोंमें विवाद होने लगा। नीलकमल और रक्तकमल—प्रेममें
[ 18/95-99 अठारहवाँ अध्याय 443
अचेतन थे; चक्रवाकके सचेतन होनेपर भी (अचेतन)
नीलकमल उन चक्रवाकोंका आस्वादन करने लगे।
इसमें विपरीत धर्म यह है कि साधारणतः चक्रवाक पक्षी
ही कमलका आस्वादन करता है; परन्तु कृष्णकी इस
लीलामें अचेतन कमलने ही सचेतन चक्रवाकका
आस्वादन किया। सूर्यमित्र कमल सहजरूपमें ही चक्रवाकके
साथ रहनेवाला है, किन्तु मित्र होनेपर भी वह
चक्रवाकको लूट लेता है। उत्पल अर्थात् कुमुद रात्रिमें
प्रस्फुटित होता है, इसलिये वह चक्रवाकका अपरिचित
शत्रु है। ऐसा होनेपर भी गोपियोंके हस्तरूपी वह कुमुद
अपने स्तनरूपी चक्रवाककी रक्षा करता है; — यह बहुत
ही विचित्र है, अतएव यहाँपर 'विरोधासङ्कार' है॥ 95-98 ॥
अठारहवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
अनुभाष्य-सूर्योदयसे कमलके प्रस्फुटित होनेके
कारण सूर्य कमलका मित्र है। सूर्यके उदित होनेपर
(सूर्यसे) चक्रवाकका मिलन होता है। किन्तु यहाँपर
कमल सूर्यका मित्र होनेपर भी अपने-मित्र सूर्यके मित्र
चक्रवाकको लूट रहा है। चक्रवाक चेतन है और
कमल अचेतन पदार्थ है। किन्तु यहाँपर कृष्ण-हस्तरूपी
कमल अचेतन होनेपर भी गोपियोंके वक्षरूपी सचेतन
चक्रवाकपर आक्रमण कर रहे हैं, —यही 'विरोधाभासालङ्कार'
है। सूर्योदयके समय कुमुद बन्द हो जाता है, इसलिये
सूर्य कुमुदका शत्रु है। रात्रिमें कुमुद प्रस्फुटित होता है,
इसलिये वह चक्रवाकसे अपरिचित है। यहाँपर सूर्य
कुमुदका शत्रु है और चक्रवाक उस शत्रुका (सूर्यका)
मित्र है। गोपीवक्षरूपी चक्रवाक ही यहाँपर गोपियोंके
हस्तरूपी कुमुदके द्वारा रक्षित है, — यह भी विचित्र
'विरोधासङ्कार' है ॥ 95-98 ॥
अतिशयोक्ति, विरोधाभास, दुइ अलङ्कार प्रकाश,
करि' कृष्ण प्रकट देखाइल।
याहा करि' आस्वादन, आनन्दित मोर मन,
नेत्र-कर्ण-युग्म जुड़ाइल ॥ 99 ॥
अनुवाद— श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति' और 'विरोधाभास', —
इन दोनों अलङ्कारोंको एक साथ प्रकटित करके
दिखलाया जिसका आस्वादन करके मेरा मन आनन्दित
हो गया और मेरे नेत्र और कान सुशीतल हो
गये॥ 99 ॥
अनुभाष्य— 'अतिशयोक्ति',— उपमेय (जिसकी किसी
वस्तुसे उपमा दी गयी हो) पदार्थके स्थानपर उपमान
(वह वस्तु जिससे उपमा दी जाय) को अभिन्न
समझकर व्यवहार करनेसे वह — 'अतिशयोक्ति-अलङ्कार'
कहलाता है; जैसे साहित्यदर्पण (10/693)
कारिकामें— “सिद्धत्वेऽध्यवसायस्यातिशयोक्तिर्निगद्यते।" [अर्थात्
“अध्यवसायके (अभेद-प्रतिपादनके) अर्थात् उपमेय
और उपमानके एक ही भावकी सिद्धि होनेपर, उस
स्थानपर 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कार कहा जाता है (अर्थात्
उपमेय-रूपी गोपीवक्षके उपमान-'चक्रवाक' और
उपमेय-रूपी श्रीकृष्णहस्तके उपमान-'नीलकमल' एवं
उपमेय-रूपी गोपीहस्तके उपमान-'रक्तकमल' हैं।
उपमेय-विषयका निर्देश नहीं करके उपमानको ही
अभिन्न-विचारसे उपमेय-रूपमें स्थापन करनेको अतिशयोक्ति
अलङ्कार कहते हैं। यहाँपर उपमान— 'चक्रवाक', 'नीलकमल'
और 'रक्तकमल'को यथाक्रम उपमेय—गोपीवक्ष, श्रीकृष्णहस्त
और गोपीहस्तके साथ अभेद प्रतिपादित करवाकर
श्रीकृष्णने 'अतिशयोक्ति'-अलङ्कारको साक्षात् प्रकट करके
दिखलाया है) ।"]
'विरोधाभास',— जैसे काव्यप्रकाश (10/24) में—
“विरोधः सोऽविरोधेऽपि विरुद्धत्वेन यद्वचः ।
जातिश्चतुर्भिर्जात्याद्यैर्विरुद्धाः स्युर्गुणास्त्रिभिः ।
क्रियाद्वाभ्यामपि द्रव्यं द्रव्येणैवेति ते दश॥”
[अर्थात् “अविरोध होनेपर भी विरुद्धरूपी जो
वाक्य है, वह 'विरोध' है; चार प्रकारकी जाति, तीन
प्रकारके गुण, दो प्रकारकी क्रिया और द्रव्य—इन भेदोंसे
विरोध दस प्रकारका है।"] ॥ 99 ॥
444 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/100-105 ]
अप्राकृत मञ्जरियोंके द्वारा गोपियोंके
साथ श्रीकृष्णकी सेवाकी विचित्रता :-
ऐछे विचित्र क्रीड़ा करि', तीरे आइला श्रीहरि,
सङ्गे लञा सब कान्तागण।
गन्ध-तैल-मर्द्दन, आमलकी-उद्वर्त्तन,
सेवा करे तीरे सखीगण॥ 100॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण ऐसी विचित्र क्रीड़ा करके अपनी
सभी कान्ताओंके साथ यमुनाके तटपर आ गये। तटपर
खड़ी हुई मञ्जरियोंने उन सबको (श्रीश्रीराधा-कृष्ण
और जलक्रीड़ामें सम्मिलित सभी गोपियोंको) सुगन्धित
तेल मला और आँवलेका उबटन भी लगाया॥ 100॥
अनुभाष्य—'उद्वर्त्तन',—उबटन, जिसके द्वारा अङ्ग
स्वच्छ होता है॥ 100॥
पुनरपि कैल स्नान, शुष्कवस्त्र परिधान,
रत्न-मन्दिरे कैला आगमन।
वृन्दा-कृत सम्भार, गन्ध-पुष्प-अलङ्कार,
वन्यवेश करिल रचन॥ 101॥
अनुवाद—तब श्रीकृष्ण और सभी गोपियोंने स्नान
किया और सूखे वस्त्र धारण करके रत्न-मन्दिरमें आ
गये। वहाँ श्रीवृन्दादेवीने उनके लिये सुगन्धित पुष्पोंसे
रचित वस्त्र और अनेक प्रकारके अलङ्कारोंसे युक्त
वन्यवेश धारण करनेकी व्यवस्था की॥ 101॥
अनुभाष्य—'सम्भार',—पुष्पगन्ध, सज्जा-वेश आदिके
उपकरण समूह॥ 101॥
वृन्दावने तरुलता, अद्भुत ताहार कथा,
बारमास धरे फुल-फल।
वृन्दावने देवीगण, कुञ्जदासी यत
जन,
फल पाड़ि' आनिया सकल॥ 102॥
अनुवाद—वृन्दावनके वृक्ष और लताएँ भी अद्भुत
हैं, उनपर बारह मास फल-फूल लगते हैं। वृन्दावनमें
कुञ्जमें सेवा करनेवाली जितनी गोपियाँ और किङ्करियाँ
हैं, वे समस्त फलोंको एकत्रित करके ले आयीं॥ 102॥
उत्तम संस्कार करि', बड़ बड़ थाली भरि',
रत्न-मन्दिरे पिण्डार उपरे।
भक्षणेर क्रम करि', धरियाछे सारि सारि,
आगे आसन बसिवार तरे॥ 103॥
अनुवाद—उन गोपियों और किङ्करियोंने फलोंको
भली-भाँति धोकर, छीलकर, गुठली आदि निकालकर
और टुकड़े करके उन्हें बड़ी-बड़ी थालियोंमें भरकर
रत्न-मन्दिरके अन्दर बने चबूतरेपर रख दिया। उन्होंने
गुणोंपर आधारित खानेके क्रमानुसार फलोंकी थालियोंकी
पंक्तियाँ बनाकर रख दीं और उनके सामने बैठनेका
आसन लगा दिया॥ 103॥
अनुभाष्य—'संस्कार',—भोजन उपयोगी छिलके-गुठली
आदिसे रहित करना, खाद्य द्रव्योंको धोना, टुकड़े करना
इत्यादि॥ 103॥
एक नारिकेल नाना-जाति, एक आम्र नाना भाति,
कला, कोलि-विविधप्रकार।
पनस, खर्जुर, कमला, नारङ्ग, जाम, सन्तारा,
द्राक्षा, बादाम, मेओया यत आर॥ 104॥
खरमुजा, क्षीरिका, ताल, केशुर, पानीफल, मृणाल,
बिल्व, पीलु, दाड़िम्बादि यत।
कोन देशे कार ख्याति, वृन्दावने सब प्राप्ति,
सहस्रजाति लेखा याय कत?? 105॥
अनुवाद—उन फलोंमें अनेक जातियोंके नारियल
और अनेक प्रकारके आम भी थे। केले और बेर भी
विविध प्रकारके थे। पके हुए कटहल, खजूर, सन्तरा,
नारङ्गी, जामुन, बड़े आकारकी मौसमी और काले
अङ्गुर आदि फल तथा बादाम और बहुतसे मेवे भी
[ 18/104-109 अठारहवाँ अध्याय 445
सजाकर रखे थे। दासियोंने खरबूजा, क्षीरा, तालफल,
कशेरू, सिंघाड़ा, कमल-ककड़ी, बेल, पीलू और अनार
आदि विविध प्रकारके फलोंको सजाकर रखा। जितने
स्थानोंपर जितने प्रकारके फल प्रसिद्ध हैं, वृन्दावनमें
उन सब फलोंकी कितनी सैकड़ों जातियाँ उपलब्ध हैं
कि उनके विषयमें कोई नहीं लिख सकता? 104-105 ॥
अनुभाष्य - 'केलि',-बेर, बदरी; 'पनस',-कटहल;
'नारङ्ग',-नारङ्गी; 'द्राक्षा'-अङ्गुर; 'सन्तारा', -बड़े आकारकी
मौसमी (पूर्व बङ्गालमें चट्टग्राम विभागमें इस नामसे कही
जाती है); 'मेवा', -पिस्ता, बादाम इत्यादि, शीत-प्रधान
देशोंमें उत्पन्न लाभकारी सुस्वादु सूखे फल;
'खरमूजा'-खरबूजा; 'क्षीरिका',-क्षीरा; 'ताल',-ग्रन्थ-तालकी
खाने योग्य गिरी; 'केशुर'-कन्दजातिका तृणमूल, कशेरु,
कसेरु आदि नामसे भी परिचित; 'पानीफल', -काईसे
ढके अत्यधिक प्राचीन सरोवर अथवा नदीके जलमें
उत्पन्न फल सिंघाड़ा; 'मृणाल', -कमल-ककड़ी अथवा
कमलकी जड़(?); 'दाड़िम्ब',- 'अनार' ॥ 104-105 ॥
गङ्गाजल, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि,
सरपुरी, अमृति, पद्मचिनि ।
खण्डक्षिरिसार-वृक्ष, घरे करि' नाना भक्ष्य,
राधा याहा कृष्ण-लागि' आनि ॥ 106 ॥
अनुवाद - श्रीराधिका अपने साथ चीनी और छैनेसे
बनी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ लायी थीं, जैसे-गङ्गाजल
नामक लड्डू, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि, सरपुरी,
इमरती, पद्मचिनि और खण्डक्षीरिसार-वृक्ष आदि। इनको
भी किङ्करियोंने उन फलों और मेवोंके साथ सजाकर
रखा ॥ 106 ॥
अनुभाष्य - यहाँपर 'गङ्गाजल' इत्यादि सब कुछ
'लड्डू' थे और गायके दूधके बने छैनेके साथ चीनीके
सहयोगसे प्रस्तुत किये गये अनेक 'पिष्टक' (केक)के
जैसे खानेकी वस्तुएँ; 'खण्डक्षीरिसार',-चीनीसे निर्मित
वृक्षकी आकृतिकी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ ॥ 106 ॥
अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
भक्ष्येर परिपाटी देखि', कृष्ण हैला महासुखी,
बसि' कैल वन्य-भोजन ।
सङ्गे लञा सखीगण, राधा कैला भोजन,
दुँहे कैला मन्दिरे शयन ॥ 107 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण इन खानेकी वस्तुओंके आयोजन
और उनकी सजावट देखकर बहुत प्रसन्न हुए और
उन्होंने बैठकर वन्य-भोजन किया। तत्पश्चात् श्रीराधाने
सखियोंके साथ बैठकर वन्य-भोजन किया। उसके बाद
श्रीकृष्ण और श्रीराधाने रत्न-मन्दिरमें शयन किया ॥ 107 ॥
केह करे व्यजन, केह पादसम्वाहन,
केह कराय ताम्बुल भक्षण।
राधाकृष्ण निद्रा गेला, सखीगण शयन कैला,
देखि' आमार सुखी हैल मन ॥ 108 ॥
अनुवाद - कुछ किङ्करियाँ उन दोनोंको पंखा कर
रही थीं, कुछ उनके चरणोंका सम्वाहन कर रही थीं
ओर कोई उन्हें ताम्बूल खिला रही थी। जब
श्रीराधा-कृष्णको नींद आ गयी, तब सखियाँ भी सो
गयीं। यह सब लीला देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न
हुआ ॥ 108 ॥
महाप्रभुकी श्रीकृष्णसुखकी वाञ्छा :-
हेनकाले मोरे धरि', महाकोलाहल करि',
तुमि सब इँहा लञा आइला।
काँहा यमुना, वृन्दावन, काँहा कृष्ण, गोपीगण,
सेइ सुख भङ्ग कराइला !!” 109 ॥
अनुवाद - उसी समय तुम सब लोग मुझे पकड़कर
महा-कोलाहल करके मुझे यहाँ लेकर आ गये। यमुना,
446 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/110-117 ]
वृन्दावन, कृष्ण और गोपियाँ कहाँ गये, तुम लोगोंने मेरे कृष्णनाम लइते तोमार ‘अर्द्धबाह्य’ हइल।
उस सुखको भङ्ग कर दिया!” 109 ॥ ताते ये प्रलाप कैला, ताहा ये शुनिल॥” 116 ॥
अर्द्धबाह्यसे बाह्यदशामें आगमन, श्रीस्वरूपसे
कारणकी जिज्ञासा, श्रीस्वरूपका उत्तर :-
एतेक कहिते प्रभुर केवल ‘बाह्य’ हैल।
स्वरूप-गोसाञिरे देखि' ताँहारे पुछिल ॥ 110 ॥
“इँहा केने तोमरा आमारे लञा आइला?”
स्वरूप-गोसाञि तबे कहिते लागिला ॥ 111 ॥
“यमुनार भ्रमे तुमि समुद्रे पड़िला।
समुद्रेर तरङ्गे आसि' एतदूर आइला! ! 112 ॥
एइ जालिया जाले करि' तोमा उठाइल।
तोमार परशे एइ प्रेमे मत्त हइल ॥ 113 ॥
सब रात्रि सबे बेड़ाइ तोमारे अन्वेषिया।
जालियार मुखे शुनि' पाइनु आसिया ॥ 114 ॥
तुमि मूर्च्छा-छले वृन्दावने देख क्रीड़ा।
तोमार मूर्च्छा देखि' सबे मने पाय पीड़ा ॥ 115 ॥
अनुवाद—इस प्रकार कहते हुए महाप्रभु पूर्ण बाह्यदशामें आ गये। उन्होंने श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीको देखकर उनसे पूछा, — “तुम लोग मुझे यहाँ लेकर क्यों आ गये?” तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी बतलाने लगे,—“आप यमुनाके भ्रमसे समुद्रमें जा पड़े थे। आप समुद्रकी तरङ्गोंपर बहते हुए इतनी दूर आ गये थे। इस मछुवारेने आपको जालके द्वारा समुद्रसे निकाला है। आपके स्पर्शसे यह मछुआरा प्रेममें मत्त हो गया है। सारी रात सभी भक्त घूम-घूमकर आपको ढूँढ़ते रहे। मछुवारेके मुखसे आपके विषयमें सुनकर आप हमें यहाँपर मिले। आप तो मूर्च्छाके छलसे वृन्दावनमें लीला देख रहे थे, किन्तु आपको मूर्च्छित देखकर सभी भक्तोंके मनमें बहुत कष्ट हो रहा था। हमारे द्वारा कृष्णनाम कीर्तन करनेपर आपकी ‘अर्द्धबाह्य’ दशा हुई, उस अवस्थामें आपने जो प्रलाप किया, उसे भी हम सबने सुना॥” 110-116 ॥
[ 18/117-121 अठारहवाँ अध्याय 447
महाप्रभुके द्वारा अपने वृत्तान्तका वर्णन :-
प्रभु कहे,—“स्वप्ने देखि, गेलाङ वृन्दावन।
देखि,—कृष्ण रास करेन गोपीगण-सने ॥ 117 ॥
जलक्रीड़ा करि' कैला वन्य-भोजने।
देखि' आमि प्रलाप कैलुँ, हेन लय मने ॥ ”118 ॥
महाप्रभुके इस महाभावके श्रवणसे अचैतन्यको भी कृष्णोन्मुखता रूपी चैतन्यकी प्राप्ति :-
एइ त' कहिलुँ प्रभुर समुद्र-पतन।
इहा येइ सुने, पाय चैतन्य-चरण ॥ 120 ॥
अनुवाद - महाप्रभुने कहा, — “मैं स्वप्नमें वृन्दावन गया था, जहाँ मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोपियोंके साथमें रास कर रहे हैं। श्रीकृष्ण और गोपियोंने जलक्रीड़ा करनेके पश्चात् वन-भोजन किया। मुझे ऐसा लगता है कि उसे देखकर ही मैंने प्रलाप किया होगा॥”117-118 ॥
अनुवाद - इस प्रकार मैंने महाप्रभुके समुद्रमें गिरनेकी लीलाका वर्णन किया है। इसे जो कोई भी श्रवण करेगा, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अवश्य प्राप्ति होगी ॥ 120 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 121 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको स्नानके बाद घरपर लाना :-
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे समुद्रपतनं नाम अष्टादशः परिच्छेदः।
तबे स्वरूप-गोसाञि ताँरे स्नान कराञा।
प्रभुरे लञा घर आइला आनन्दित हञा ॥ 119 ॥
अनुवाद - श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 121 ॥
अनुवाद - तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुको स्नान करवाकर आनन्दपूर्वक उन्हें घर ले आये ॥ 119 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें समुद्रपतन नामक अठारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट) उपलब्ध नहीं है। यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।
उन्नीसवाँ अध्याय
कथासार-मातृभक्तिके द्वारा उत्तेजित होकर महाप्रभु
प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द-पण्डितको प्रसादी वस्त्र और
मिष्ठान्न देकर श्रीनवद्वीपमें भेजते थे। श्रीजगदानन्द उसी
प्रकार एक वर्ष नवद्वीपमें जाकर श्रीअद्वैताचार्यके द्वारा
लिखित एक पहेली लेकर आये। उसे पढ़कर महाप्रभुकी
दशा वर्धित होने लगी और भक्तगण विचार करने लगे
कि 'महाप्रभु शीघ्र ही अप्रकट होंगे।' (महाप्रभुकी
अवस्था) ऐसी हो गयी कि रात्रिमें मुखको घिसनेसे
महाप्रभुके क्षत-अङ्गोंसे रक्त निकलने लगा।
श्रीस्वरूप-गोस्वामीने उसे रोकनेके लिये शङ्कर पण्डितको
महाप्रभुके घरमें शयन करवाया। एक समय वैशाख-पूर्णिमाकी
रात्रिमें [महाप्रभुने] श्रीजगन्नाथवल्लभ उद्यानमें प्रवेश
करके अनेक प्रकारके भाव प्रकाशित करते-करते
अशोक वृक्षके नीचे अकस्मात् श्रीकृष्णका दर्शन किया;
उसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्णके अङ्गोंकी सुगन्धसे
उन्मत्त होकर भाव प्रकाशित करने लगे।
-(अमृतप्रवाह भाष्य)
मातारूपी भक्तके प्रति अतुलनीय स्नेहमय
एवं जगन्नाथवल्लभ उद्यानमें महाभावमें
आविष्ट महाप्रभुकी वन्दना :-
वन्दे तं कृष्णचैतन्यं मातृभक्तशिरोमणिम्।
प्रलप्य मुखसङ्घर्षी मधूद्याने ललास यः ॥ 1 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 1 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो मातृभक्त-शिरोमणि हैं और
जिन्होंने प्रलाप करते-करते घरकी दीवारोंसे मुखको
घिसा था और कृष्णप्रेमकी लालसाको प्रदर्शित करनेके
लिये जगन्नाथवल्लभरूपी मधु-उद्यानमें [वासन्तिक-विहार-
काननमें] लीला की थी, मैं उन कृष्णचैतन्यकी वन्दना
करता हूँ॥ 1 ॥
अनुभाष्य-
मुखसङ्घर्षी (मुखं सङ्घर्षयितुं शीलं यस्य सः) यः
(कृष्णचैतन्यदेवः) प्रलप्य (प्रलापवचनादिकम् उच्चार्य) मधूद्याने
(जगन्नाथवल्लभाख्ये वासन्तिकविहारकानने) ललास (विलसितवान्),
तं मातृभक्तशिरोमणिं (मातृभक्तेषु शिरोमणिः तं मस्तकभूषणं
परम-श्रेष्ठं कृष्णचैतन्यम्) अहं वन्दे।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1 ॥
जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द।
जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ 2 ॥
अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, जय हो।
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो
और श्रीगौरभक्तोंकी जय हो ॥ 2 ॥
महाप्रभुका दिव्योन्माद :-
एइमते महाप्रभु कृष्णप्रेमावेशे।
उन्माद-प्रलाप करे रात्रि-दिवसे ॥ 3 ॥
अनुवाद-इस प्रकार महाप्रभु कृष्णप्रेमके आवेशमें
रात-दिन उन्मादग्रस्त होकर प्रलाप करते थे॥ 3 ॥
पण्डित श्रीजगदानन्दके गुण :-
प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित-जगदानन्द।
याहार चरित्रे प्रभु पायेन आनन्द ॥ 4 ॥
अनुवाद-श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुको अत्यन्त
प्रिय थे। महाप्रभुको उनके क्रियाकलापोंको देखकर
बहुत आनन्द होता था॥ 4 ॥
प्रत्येक वर्षकी भाँति उस बार भी महाप्रभुके द्वारा
नवद्वीपमें अपनी माताके प्रति अतुलनीय
वात्सल्य-उक्ति-बतलानेके लिये श्रीजगदानन्दको भेजना :-
प्रति वत्सर प्रभु ताँरे पाठान नदीयाते।
विच्छेद-दुःखिता जानि' जननी आश्वासिते ॥ 5 ॥
450 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/5-15 ]
अनुवाद—महाप्रभु अपनी माता श्रीशचीदेवीके स्वयंसे
वियोगके दुःखको समझकर प्रत्येक वर्ष श्रीजगदानन्द
पण्डितको उन्हें आश्वासन देनेके लिये नदीयामें भेजते
थे॥ 5 ॥
“नदीया चलह, मातारे कहिह नमस्कार।
आमार नामे पादपद्म धरिह ताँहार ॥ 6 ॥
कहिह ताँहारे,—तुमि करह स्मरण।
नित्य आसि' तोमार वन्दिये चरण ॥ 7 ॥
ये-दिने तोमार इच्छा कराइते भोजन।
से-दिने अवश्य आमि करिये भक्षण ॥ 8 ॥
भक्तवत्सल भगवान्की भी स्वयंको भक्तकी सेवामें
अयोग्य जानकर दैन्यपूर्ण उक्ति और क्षमा-याचना :-
तोमार सेवा छाड़ि' आमि करिलुँ संन्यास।
‘बाउल’ हञा आमि कैलुँ धर्मनाश ॥ 9 ॥
एइ अपराध तुमि ना लइह आमार।
तोमार अधीन आमि—पुत्र से तोमार ॥ 10 ॥
श्रीशचीदेवीके आदेशसे ही महाप्रभुका पुरीमें वास :-
नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते।
यावत् जीव, तावत् आमि नारिब छाड़िते ॥” 11 ॥
अनुवाद—एकदिन महाप्रभुने श्रीजगदानन्द पण्डितसे
कहा,—“तुम नदीया जाओ और माताको मेरा प्रणाम
कहना। मेरी ओरसे उनके चरणकमलको स्पर्श करना
और उन्हें मेरी ओरसे कहना—आपको स्मरण है कि
मैं प्रतिदिन आकर आपके चरणोंकी वन्दना करता हूँ।
जिस दिन भी आपकी मुझे भोजन करानेकी इच्छा
होती है, मैं अवश्य ही आपके पास आकर भोजन
ग्रहण करता हूँ। मैंने आपकी सेवाको छोड़कर संन्यास
ग्रहण किया है। मैंने पागल होकर अपने (आपकी सेवा
करनेके कर्त्तव्यरूपी) धर्मका नाश किया है। आप मेरे
इस अपराधको ग्रहण मत करना, क्योंकि मैं आपका
पुत्र, आपके अधीन हूँ। मैं आपकी आज्ञानुसार ही
जगन्नाथपुरीमें वास कर रहा हूँ। मैं जब तक जीवित
रहूँगा, तब तक नीलाचलको नहीं छोड़ूँगा॥” 6-11 ॥
परमानन्द पुरीके अनुरोधसे श्रीशचीदेवीके लिये
नवद्वीपमें वस्त्र और प्रसाद भेजना :-
गोप-लीलाय पाइला येइ प्रसाद-वसने।
मातारे पाठान ताहा पुरीर वचने ॥ 12 ॥
अनुवाद—महाप्रभुको श्रीजगन्नाथदेवकी गोपलीलाका
जो प्रसादी वस्त्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने श्रीपरमानन्द
पुरीके कहनेपर उसे माताके लिये भेज दिया॥ 12 ॥
अनुभाष्य—श्रीजगन्नाथदेवके गोपवेश-सम्बन्धीय
प्रसादी-वस्त्र ॥ 12 ॥
जगन्नाथेर उत्तम प्रसाद आनिया यतने।
मातारे पृथक् पाठान, आर भक्तगणे ॥ 13 ॥
अनुवाद—महाप्रभु बहुत सावधानीसे श्रीजगन्नाथदेवका
उत्तम प्रसाद लाये और उन्होंने श्रीशचीमाता एवं
अन्य-अन्य भक्तोंके लिये पृथक्-पृथक् करके प्रसाद
भेजा ॥ 13 ॥
अप्राकृत वात्सल्य-प्रेमके वशीभूत भगवान् :-
मातृभक्तगणेर प्रभु हन शिरोमणि।
संन्यास करिया सदा सेवेन जननी ॥ 14 ॥
अनुवाद—महाप्रभु मातृ-भक्तोंमें शिरोमणि हैं, वे
संन्यास ग्रहण करके भी सदा माताकी सेवा करते
हैं॥ 14 ॥
अनुभाष्य—माताके द्वारा जन्म और लालन-पालनसे
पुष्ट किये जड़-शरीरको धारण करके उसे कृष्णभजनमें
नियुक्त करनेसे ही हरिभजनके द्वारा शुद्धरूपसे अति
उत्तम मातृ-सेवा होती है॥ 14 ॥
श्रीजगदानन्दका नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीदेवीको
महाप्रभुके द्वारा दिया गया सन्देशादि देना :-
जगदानन्द नदीया गिया मातारे मिलिला।
प्रभुर यत निवेदन, सकल कहिला ॥ 15 ॥
[ 19/15-23 उन्नीसवाँ अध्याय 451
नवद्वीप और शान्तिपुरमें रहनेके
बाद विदायी-हेतु प्रार्थना :-
आचार्यादि-भक्तगणे मिलिला प्रसाद दिया।
माता-ठाञि आज्ञा लइला मासेक रहिया ॥ 16 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीमातासे मिलकर उन्हें महाप्रभुका प्रणाम निवेदन किया और उनका सन्देश सुनाया। फिर वे श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंसे मिले और उन्होंने सभीको महाप्रभुके द्वारा भेजा गया श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद दिया। उन्होंने एक मास तक नवद्वीपमें रहनेके पश्चात् श्रीशचीमातासे जानेके लिये आज्ञा ली॥ 15-16॥
आचार्येर ठाञि गिया आज्ञा मागिला।
आचार्य-गोसाञि प्रभुरे सन्देश कहिला ॥ 17 ॥
पण्डितके माध्यमसे महाप्रभुके निकट
श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा पहेली भेजना :-
तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन ठारे-ठोरे।
प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥ 18 ॥
“प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार।
एइ निवेदन ताँर चरणे आमार ॥ 19 ॥
महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी सिद्धि एवं लीलाको
सङ्गोपन करनेके लिये इङ्गित करना :-
बाउलके कहिह,—लोक हइल बाउल।
बाउलके कहिह,—हाटे ना बिकाय चाउल ॥ 20 ॥
बाउलके कहिह,—काये नाहिक आउल।
बाउलके कहिह,—इहा कहियाछे बाउल ॥” 21 ॥
अनुवाद—उन्होंने श्रीअद्वैताचार्यसे भी जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब श्रीअद्वैताचार्य गोसांईने महाप्रभुके लिये एक सन्देश दिया। वह सन्देश एक तरजा-पहेलीके रूपमें था, जिसे एकमात्र महाप्रभु ही समझ सकते थे, अन्य कोई भी नहीं। श्रीअद्वैताचार्यने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“महाप्रभुको मेरा करोड़ों बार प्रणाम कहना। उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा यही निवेदन है,—'पागलसे कहना—लोग पागल हो गये हैं। पागलसे कहना—हाटमें अब चावल नहीं बिक रहे हैं। पागलसे कहना—पागलका अब कोई कार्य नहीं है। पागलसे कहना—यह बात एक पागलने कही है॥'” 17-21 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीअद्वैतप्रभुने पण्डित श्रीजगदानन्दके द्वारा यह कहकर भिजवाया,–) महाप्रभुको कहना कि लोग प्रेममें उन्मत्त हो गये हैं, और प्रेमके हाटमें प्रेमरूपी चावलको बेचनेका स्थान नहीं है। महाप्रभुको कहना कि आउल अर्थात् प्रेमोन्मत्त बाउलको और कोई सांसारिक कार्य नहीं है। महाप्रभुको कहना कि प्रेममें उन्मत्त होकर ही अद्वैतने यह बात कही है। तात्पर्य यह है कि महाप्रभुके आविर्भूत होनेका जो तात्पर्य था, वह सम्पूर्ण हो गया है, अब महाप्रभुकी जैसी इच्छा, वैसा हो॥ 20-21 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—‘बाउलके कहिओ, लोक हइल आउल।' आउल शब्दका अर्थ आतुर अर्थात् प्रेमपूर्ण है। कोई-कोई उसका ‘शिथिल', ‘असंलग्न' अर्थ भी करते हैं; आउल-शब्दसे ‘निष्किञ्चन', ‘आर्त्त' और ‘आतुर' आदि भी समझा जाता है।
‘काये नाहिक आउल',—कोई-कोई व्याख्या करते हैं कि प्रेम-प्रचार-कार्यमें और उच्छृङ्खलता नहीं है॥ 20-21 ॥
उसे सुनकर श्रीजगदानन्दका हँसना और पुरीमें
आकर महाप्रभुके समक्ष उसका वर्णन :-
एत शुनि' जगदानन्द हासिते लागिला।
नीलाचले आसि' तबे प्रभुरे कहिला ॥ 22 ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनकर हँसने लगे। उन्होंने नीलाचलमें आकर महाप्रभुको श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनाया॥ 22 ॥
उसे सुनकर महाप्रभुका हँसना
और मौन धारण करना :-
तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिला।
“ताँर येइ आज्ञा”—बलि' मौन धरिला ॥ 23 ॥
452 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/23-33 ]
अनुवाद-महाप्रभु पहेलीको सुनकर मन्द-मन्द
मुस्कराये और फिर “उनकी जैसी आज्ञा”-कहकर
मौन हो गये॥ 23॥
श्रीस्वरूपके द्वारा अर्थकी जिज्ञासा :-
जानिया स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे पुछिल।
“एइ तरजार अर्थ बुझिते नारिल॥” 24॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर उस पहेलीका रहस्य
जानते थे, तथापि उन्होंने महाप्रभुसे पूछा,-“मैं इस
पहेलीका अर्थ नहीं समझ पाया हूँ॥” 24॥
महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत :-
प्रभु कहेन,-“आचार्य हय पूजक प्रबल।
आगम-शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल॥ 25॥
उपासना लागि' देवेर करेन आवाहन।
पूजा लागि' कतकाल करेन निरोधन॥ 26॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“श्रीअद्वैताचार्य भगवान्के
एक श्रेष्ठ पूजक हैं। वे आगम-शास्त्रोंके विधि-विधानमें
कुशल हैं। वे उपासनाके लिये देवताका आह्वान करते
हैं और पूजाके लिये कुछ समयके लिये देवताको
रोककर भी रखते हैं॥ 25-26॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आवाहन',-पूजा करनेसे पहले
देवताका आह्वान; 'निरोधन',-जब तक पूजा होती
रहती है, तब तक देवताको रोके रखना॥ 26॥
पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन।
तरजार ना जानि अर्थ, किवा ताँर मन॥ 27॥
महायोगैश्वर्यशाली श्रीअद्वैतप्रभु :-
महायोगेश्वर आचार्य-तरजाते समर्थ।
आमिह बुझिते नारि तरजार अर्थ॥” 28॥
अनुवाद-पूजाके सम्पूर्ण होनेके पश्चात् वे देवताका
विसर्जन कर देते हैं। मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं
जानता हूँ और मैं यह भी नहीं जानता कि उनके
मनमें क्या है? श्रीअद्वैताचार्य महायोगेश्वर हैं, वे
पहेलियाँ लिखनेमें निपुण हैं, किन्तु मैं भी उनकी इस
पहेलीका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ॥” 27-28॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'विसर्जन',-पूजाकी समाप्ति होनेपर
देवताको स्थानान्तरित करना॥ 27॥
भक्तोंमें विस्मय, श्रीस्वरूपका विमर्ष (दुःख) :-
शुनिया विस्मित हइला सब भक्तगण।
स्वरूप-गोसाञि किछु हइला विमन॥ 29॥
अनुवाद-यह सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित
हुए और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीका मन कुछ खिन्न
हो गया॥ 29॥
महाप्रभुकी श्रीकृष्णविरह-दशाकी वृद्धि :-
सेइ दिन हैते प्रभुर आर दशा हइल।
कृष्णेर विरह-दशा द्विगुण बाड़िल॥ 30॥
उन्माद-प्रलाप-चेष्टा करे रात्रि-दिने।
राधा-भावावेशे विरह बाड़े अनुक्षणे॥ 31॥
अनुवाद-उस दिनसे महाप्रभुकी दशा बहुत परिवर्तित
हो गयी। उनकी श्रीकृष्णविरह-दशा दो गुणा बढ़ गयी।
श्रीराधाके भावावेशमें उनका कृष्णविरह प्रतिक्षण बढ़ने
लगा और रात-दिन उनके सभी कार्यकलाप
उन्माद-प्रलापमय होते॥ 30-31॥
महाप्रभुकी उद्घूर्णा और प्रलाप :-
आचम्बिते स्फुरे कृष्णेर मथुरा-गमन।
उद्घूर्णा दशा हैल उन्माद-लक्षण॥ 32॥
अनुवाद-महाप्रभुको अकस्मात् ही स्फूर्ति हुई कि
श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं और उन्मादमें उनकी
उद्घूर्णा-दशा उपस्थित हो गयी॥ 32॥
रामानन्देर गला धरि' करेन प्रलापन।
स्वरूपे पुछेन जानि' निज-सखीगण॥ 33॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके कण्ठको पकड़कर
प्रलाप करने लगे और श्रीस्वरूप दामोदरको अपनी
[ 19/33-37 ] उन्नीसवाँ अध्याय 453
सखी समझकर कुछ पूछने लगे ॥ ३३ ॥
पूर्वे येन विशाखारे राधिका पुछिला।
सेइ श्लोक पड़ि' प्रलाप करिते लागिला ॥ ३४ ॥
अनुवाद—पहले श्रीराधिकाने श्रीविशाखा सखीसे जो
पूछा था, महाप्रभु उसी श्लोकको पढ़कर प्रलाप करने
लगे॥ ३४ ॥
श्रीराधाकी श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके
विषयमें जिज्ञासा (चित्रजल्प) :—
ललितमाधव (3/25)में विशाखाके प्रति श्रीराधाकी उक्ति—
क्व नन्दकुलचन्द्रमाः क्व शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः
क्व मन्दमुरलीरवः क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युतिः।
क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि-
र्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व बत हा हन्त धिग्विधिम् ॥ ३५ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३५ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे सखि, वे नन्दकुलचन्द्रमा
कहाँ हैं? वे शिखिचन्द्रके (मयूर-पंखके) द्वारा (अलंकृति
अथवा अलंकृत कृष्ण) कहाँ हैं? वे मन्दमुरलीधर
(ध्वनि करनेवाले कृष्ण) कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणि कृष्ण
अथवा इन्द्रद्युति कहाँ हैं? रासरसमें नृत्य करनेवाले वे
कहाँ हैं? मेरी जीवन-रक्षाकी औषधि (स्वरूप श्याम)
कहाँ हैं? मेरी वह सर्वोत्तम सुहृदरूपी निधि कहाँ है?
हाय ! हाय ! विधाताको धिक्कार है ॥ ३५ ॥
अनुभाष्य—
हे सखि (विशाखे,) नन्दकुलचन्द्रमाः (नन्दयति इति नन्दः
क्षीरसिन्धुः इव तत्तस्मिन् कुले जातः चन्द्रमाः नन्दवंशशशधरः)
क्व (कुत्र वर्त्तते)? शिखिचन्द्रकालङ्कृतिः (शिखिचन्द्रकं
मयूरपिच्छकम् अलङ्कृतिः भूषणं यस्य सः) क्व तिष्ठति?
मन्दमुरलीरवः (मन्दः अनुच्चः अस्फुटः मुरलीरवः यस्य सः)
क्व वर्त्तते? सुरेन्द्रनीलद्युतिः (सुरेन्द्र इव इन्द्रनीलमणिरिव
नीला द्युतिः कान्तिः यस्य सः) क्व? रासरसताण्डवी (रासे
क्रीड़ायां रसेन ताण्डवं नृत्यं यस्य सः) क्व? जीवरक्षौषधिः
(जीवस्य जीवनस्य रक्षायैः परित्राणाय औषधिस্বরূপः यः सः)
क्व? मम सुहृत्तमः (परम प्रियतमः) निधिः (सर्वसम्पत्प्रसूः)
क्व? बत (खेदे) हा हन्त, विधिं (विधातारं) धिक्।
श्लोक-भावानुवाद—हे सखि विशाखे, (क्षीरसिन्धुसे
उत्पन्न चन्द्रमाकी भाँति) नन्दवंशमें उत्पन्न वे चन्द्रमा
कहाँ हैं? मयूरपंखरूपी भूषणसे अलङ्कृत वे कहाँ हैं?
मन्द अस्फुट मुरलीध्वनि करनेवाले कहाँ हैं? इन्द्रनीलमणिके
समान नीलकान्ति है जिनकी, वे कहाँ हैं? रासरसमें
ताण्डव नृत्य करनेवाले कहाँ हैं? जीवनका परित्राण
करनेवाले औषधिस्वरूप वे कहाँ हैं? मेरे परम प्रियतम,
मेरी समस्त सम्पत्तिस्वरूप वे कहाँ हैं? (खेदसे) हा
हन्त, विधाताको धिक्कार है॥ ३५ ॥
श्लोकका अर्थ; श्रीकृष्णविरहमें विधुरा श्रीराधाका
ब्रजवासियोंके जीवन स्वरूप श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन :—
यथा राग—
“व्रजेन्द्रकुल-दुग्धसिन्धु, कृष्ण—ताहे पूर्ण इन्दु,
जन्मि' कैला जगत् उजोर।
कान्त्यमृत येबा पिये, निरन्तर पिया जिये,
व्रज-जनेर नयन-चकोर ॥ ३६ ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ ३६ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—"श्रीनन्दका कुल—क्षीर समुद्रके
समान है, उसमें पूर्णचन्द्ररूपी कृष्णने उत्पन्न होकर
जगत्को आलोकित किया है। जो व्रजवासियोंके
नयन-चकोरके द्वारा प्राप्त होनेवाले कृष्णकान्तिरूप
अमृतका निरन्तर पान करते हैं, वे ही जीवित रहते
हैं।
'उजोर',—आलोकित (उज्ज्वल) ॥ ३६ ॥
श्रीकृष्णदर्शनकी तृष्णामें आर्त्त श्रीराधा :—
सखि हे, कोथा कृष्ण, कराह दरशन।
क्षणके याहार मुख, ना देखिले फाटे बुक,
शीघ्र देखाह, ना रहे जीवन ॥ ३७ ॥ ध्रु ॥
अनुवाद—हे सखि! कृष्ण कहाँ हैं? मुझे उनके
दर्शन कराओ। जिनका मुख क्षणमात्रके लिये भी नहीं
देखनेपर मेरा हृदय फटने लगता है, मुझे शीघ्र ही
454 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/37-41 ]
उनके दर्शन कराओ, अन्यथा मैं जीवित नहीं रह
पाऊँगी ॥ 37 ॥
गोपीप्राणधन श्रीकृष्णचन्द्र :-
एइ व्रजेर रमणी, कामार्कतप्त-कुमुदिनी,
निज-करामृत दिया दान।
प्रफुल्लित करे येह, काँहा मोर चन्द्र
सेइ,
देखाह, सखि, राख मोर प्राण ॥ 38 ॥
अनुवाद-इस व्रजकी रमणियाँ कामरूपी सूर्यसे
तप्त कुमुदिनीकी भाँति हैं। किन्तु अपने हस्तरूपी
अमृतको (किरणामृतको) प्रदान करके जो उन्हें प्रफुल्लित
करते हैं, वे मेरे चन्द्र (श्रीकृष्ण) कहाँ हैं? हे सखि!
मुझे उनके दर्शन करवाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा करो ॥ 38 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-कामरूपी सूर्यके द्वारा तप्त
कुमुदिनीरूपी व्रजरमणयोंको अपना हस्तरूपी अमृत
अर्थात् किरणामृत देकर ॥ 38 ॥
अनुभाष्य-गोपियोंका काम-सूर्यकी भाँति है; गोपियोंका
हृदय-कुमुदिनीके समान है; कृष्णकामसे तप्त गोपी-हृदय-
सूर्यकी किरणसे तप्त कुमुदिनी स्वरूप है। 'निज'-शब्दका
अर्थ कृष्णका 'कर' अर्थात् किरण, अथवा हस्त, उस
अमृतके समान किरण अथवा हस्तप्रदाता कृष्णचन्द्र
(चन्द्रकी उपमायुक्त कृष्ण) ॥ 38 ॥
श्रीकृष्णविरहमें श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :-
काँहा से चूड़ार ठाम, शिखीपिच्छेर उड़ाम,
नव-मेघे येन इन्द्रधनु।
पीताम्बर-तड़िद्द्युति, मुक्तामाला-बकपाँति,
नवाम्बुद जिनि' श्यामतनु ॥ 39 ॥
अनुवाद-इन्द्रधनुषसे शोभित नवमेघके सदृश अत्यन्त
सुन्दर मयूरपंखसे बने मुकुटको मस्तकपर धारण
करनेवाले कृष्ण कहाँ हैं? विद्युत जैसी कान्तिसे युक्त
पीताम्बर धारण करनेवाले, उड़ते हुए सारसकी पंक्ति के
समान मुक्ताकी मालाको धारण करनेवाले और नवमेघकी
शोभाको भी तिरस्कृत करनेवाले श्याम देहधारी श्रीकृष्ण
कहाँ हैं? 39 ॥
अनुभाष्य—'बकपाँति',—सारस-पंक्ति अथवा श्रेणी ॥ 39 ॥
एकबार यार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे,
कृष्णतनु-येन आम्र-आठा।
नारी-मने पशि' याय, यत्ने नाहि बाहिराय,
तनु नहे-सेयाकुलेर काँटा ॥ 40 ॥
अनुवाद-आमके वृक्षकी चिपचिपी गोंदकी भाँति
श्रीकृष्णकी देह एकबार भी जिसके नेत्रोंके समक्ष
प्रकाशित हो जाती है, वह उस व्यक्तिके हृदयमें सदा
ही उदित रहती है। श्रीकृष्णकी अत्यन्त सुशोभित देह
नारियोंके हृदयमें ऐसे प्रवेश कर जाती है कि अनेक
प्रयास करनेपर भी बाहर नहीं निकलती, मानो वह देह
नहीं अपितु सेया-बेरीका काँटा हो ॥ 40 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'तनु नहे सेयाकुलेर
काँटा',-कृष्णकी देहकी सेया-बेरीके काँटेके साथ
तुलना की जा सकती है; इसका धर्म यह है कि उसके
एकबार चुभनेपर उसे छुड़ाना दुष्कर होता है ॥ 40 ॥
अनुभाष्य-'आम्र-आठा',—आमके वृक्षकी गोंदके
एकबार कहीं भी लग जानेपर उसे छुड़ाना कठिन होता
है; वह जिस स्थानपर लगती है, वहाँपर घाव होने
तककी सम्भावना होती है ॥ 40 ॥
जिनिया तमाल-द्युति, इन्द्रनीलसम कान्ति,
से कान्तिते जगत् माताय।
शृङ्गार रससार छानि', ताते चन्द्र-ज्योत्स्ना छानि',
जानि' विधि निरमिला ताय ॥ 41 ॥
अनुवाद-तमालकी कान्तिको पराजित करनेवाली
श्रीकृष्णकी इन्द्रनीलके समान कान्ति जगत्को मतवाला
बना देती है, क्योंकि विधिने शृङ्गार-रसके सारको
छानकर उसमें चन्द्रकी ज्योत्स्नाको मिलाकर श्रीकृष्णकी
कान्तिको निर्मल बनाया है ॥ 41 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'छानि',—मिलाकर,
(निचोड़ना) ॥ 41 ॥