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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2462, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2462

[ 18/104-109 अठारहवाँ अध्याय 445
सजाकर रखे थे। दासियोंने खरबूजा, क्षीरा, तालफल,
कशेरू, सिंघाड़ा, कमल-ककड़ी, बेल, पीलू और अनार
आदि विविध प्रकारके फलोंको सजाकर रखा। जितने
स्थानोंपर जितने प्रकारके फल प्रसिद्ध हैं, वृन्दावनमें
उन सब फलोंकी कितनी सैकड़ों जातियाँ उपलब्ध हैं
कि उनके विषयमें कोई नहीं लिख सकता? 104-105 ॥
अनुभाष्य - 'केलि',-बेर, बदरी; 'पनस',-कटहल;
'नारङ्ग',-नारङ्गी; 'द्राक्षा'-अङ्गुर; 'सन्तारा', -बड़े आकारकी
मौसमी (पूर्व बङ्गालमें चट्टग्राम विभागमें इस नामसे कही
जाती है); 'मेवा', -पिस्ता, बादाम इत्यादि, शीत-प्रधान
देशोंमें उत्पन्न लाभकारी सुस्वादु सूखे फल;
'खरमूजा'-खरबूजा; 'क्षीरिका',-क्षीरा; 'ताल',-ग्रन्थ-तालकी
खाने योग्य गिरी; 'केशुर'-कन्दजातिका तृणमूल, कशेरु,
कसेरु आदि नामसे भी परिचित; 'पानीफल', -काईसे
ढके अत्यधिक प्राचीन सरोवर अथवा नदीके जलमें
उत्पन्न फल सिंघाड़ा; 'मृणाल', -कमल-ककड़ी अथवा
कमलकी जड़(?); 'दाड़िम्ब',- 'अनार' ॥ 104-105 ॥
गङ्गाजल, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि,
सरपुरी, अमृति, पद्मचिनि ।
खण्डक्षिरिसार-वृक्ष, घरे करि' नाना भक्ष्य,
राधा याहा कृष्ण-लागि' आनि ॥ 106 ॥
अनुवाद - श्रीराधिका अपने साथ चीनी और छैनेसे
बनी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ लायी थीं, जैसे-गङ्गाजल
नामक लड्डू, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि, सरपुरी,
इमरती, पद्मचिनि और खण्डक्षीरिसार-वृक्ष आदि। इनको
भी किङ्करियोंने उन फलों और मेवोंके साथ सजाकर
रखा ॥ 106 ॥
अनुभाष्य - यहाँपर 'गङ्गाजल' इत्यादि सब कुछ
'लड्डू' थे और गायके दूधके बने छैनेके साथ चीनीके
सहयोगसे प्रस्तुत किये गये अनेक 'पिष्टक' (केक)के
जैसे खानेकी वस्तुएँ; 'खण्डक्षीरिसार',-चीनीसे निर्मित
वृक्षकी आकृतिकी अनेक प्रकारकी मिठाइयाँ ॥ 106 ॥
अठारहवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
भक्ष्येर परिपाटी देखि', कृष्ण हैला महासुखी,
बसि' कैल वन्य-भोजन ।
सङ्गे लञा सखीगण, राधा कैला भोजन,
दुँहे कैला मन्दिरे शयन ॥ 107 ॥
अनुवाद - श्रीकृष्ण इन खानेकी वस्तुओंके आयोजन
और उनकी सजावट देखकर बहुत प्रसन्न हुए और
उन्होंने बैठकर वन्य-भोजन किया। तत्पश्चात् श्रीराधाने
सखियोंके साथ बैठकर वन्य-भोजन किया। उसके बाद
श्रीकृष्ण और श्रीराधाने रत्न-मन्दिरमें शयन किया ॥ 107 ॥
केह करे व्यजन, केह पादसम्वाहन,
केह कराय ताम्बुल भक्षण।
राधाकृष्ण निद्रा गेला, सखीगण शयन कैला,
देखि' आमार सुखी हैल मन ॥ 108 ॥
अनुवाद - कुछ किङ्करियाँ उन दोनोंको पंखा कर
रही थीं, कुछ उनके चरणोंका सम्वाहन कर रही थीं
ओर कोई उन्हें ताम्बूल खिला रही थी। जब
श्रीराधा-कृष्णको नींद आ गयी, तब सखियाँ भी सो
गयीं। यह सब लीला देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न
हुआ ॥ 108 ॥
महाप्रभुकी श्रीकृष्णसुखकी वाञ्छा :-
हेनकाले मोरे धरि', महाकोलाहल करि',
तुमि सब इँहा लञा आइला।
काँहा यमुना, वृन्दावन, काँहा कृष्ण, गोपीगण,
सेइ सुख भङ्ग कराइला !!” 109 ॥
अनुवाद - उसी समय तुम सब लोग मुझे पकड़कर
महा-कोलाहल करके मुझे यहाँ लेकर आ गये। यमुना,