श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें452 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/23-33 ]
अनुवाद-महाप्रभु पहेलीको सुनकर मन्द-मन्द
मुस्कराये और फिर “उनकी जैसी आज्ञा”-कहकर
मौन हो गये॥ 23॥
श्रीस्वरूपके द्वारा अर्थकी जिज्ञासा :-
जानिया स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे पुछिल।
“एइ तरजार अर्थ बुझिते नारिल॥” 24॥
अनुवाद-श्रीस्वरूप दामोदर उस पहेलीका रहस्य
जानते थे, तथापि उन्होंने महाप्रभुसे पूछा,-“मैं इस
पहेलीका अर्थ नहीं समझ पाया हूँ॥” 24॥
महाप्रभुके द्वारा पहेलीकी व्याख्याका सङ्केत :-
प्रभु कहेन,-“आचार्य हय पूजक प्रबल।
आगम-शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल॥ 25॥
उपासना लागि' देवेर करेन आवाहन।
पूजा लागि' कतकाल करेन निरोधन॥ 26॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-“श्रीअद्वैताचार्य भगवान्के
एक श्रेष्ठ पूजक हैं। वे आगम-शास्त्रोंके विधि-विधानमें
कुशल हैं। वे उपासनाके लिये देवताका आह्वान करते
हैं और पूजाके लिये कुछ समयके लिये देवताको
रोककर भी रखते हैं॥ 25-26॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'आवाहन',-पूजा करनेसे पहले
देवताका आह्वान; 'निरोधन',-जब तक पूजा होती
रहती है, तब तक देवताको रोके रखना॥ 26॥
पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन।
तरजार ना जानि अर्थ, किवा ताँर मन॥ 27॥
महायोगैश्वर्यशाली श्रीअद्वैतप्रभु :-
महायोगेश्वर आचार्य-तरजाते समर्थ।
आमिह बुझिते नारि तरजार अर्थ॥” 28॥
अनुवाद-पूजाके सम्पूर्ण होनेके पश्चात् वे देवताका
विसर्जन कर देते हैं। मैं इस पहेलीका अर्थ नहीं
जानता हूँ और मैं यह भी नहीं जानता कि उनके
मनमें क्या है? श्रीअद्वैताचार्य महायोगेश्वर हैं, वे
पहेलियाँ लिखनेमें निपुण हैं, किन्तु मैं भी उनकी इस
पहेलीका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ॥” 27-28॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'विसर्जन',-पूजाकी समाप्ति होनेपर
देवताको स्थानान्तरित करना॥ 27॥
भक्तोंमें विस्मय, श्रीस्वरूपका विमर्ष (दुःख) :-
शुनिया विस्मित हइला सब भक्तगण।
स्वरूप-गोसाञि किछु हइला विमन॥ 29॥
अनुवाद-यह सुनकर सभी भक्त आश्चर्यचकित
हुए और श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीका मन कुछ खिन्न
हो गया॥ 29॥
महाप्रभुकी श्रीकृष्णविरह-दशाकी वृद्धि :-
सेइ दिन हैते प्रभुर आर दशा हइल।
कृष्णेर विरह-दशा द्विगुण बाड़िल॥ 30॥
उन्माद-प्रलाप-चेष्टा करे रात्रि-दिने।
राधा-भावावेशे विरह बाड़े अनुक्षणे॥ 31॥
अनुवाद-उस दिनसे महाप्रभुकी दशा बहुत परिवर्तित
हो गयी। उनकी श्रीकृष्णविरह-दशा दो गुणा बढ़ गयी।
श्रीराधाके भावावेशमें उनका कृष्णविरह प्रतिक्षण बढ़ने
लगा और रात-दिन उनके सभी कार्यकलाप
उन्माद-प्रलापमय होते॥ 30-31॥
महाप्रभुकी उद्घूर्णा और प्रलाप :-
आचम्बिते स्फुरे कृष्णेर मथुरा-गमन।
उद्घूर्णा दशा हैल उन्माद-लक्षण॥ 32॥
अनुवाद-महाप्रभुको अकस्मात् ही स्फूर्ति हुई कि
श्रीकृष्ण मथुरा चले गये हैं और उन्मादमें उनकी
उद्घूर्णा-दशा उपस्थित हो गयी॥ 32॥
रामानन्देर गला धरि' करेन प्रलापन।
स्वरूपे पुछेन जानि' निज-सखीगण॥ 33॥
अनुवाद-महाप्रभु श्रीरामानन्द रायके कण्ठको पकड़कर
प्रलाप करने लगे और श्रीस्वरूप दामोदरको अपनी