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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2455

438 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 18/60-72 ]

छुड़ाना जानता हूँ।” ऐसा कहकर श्रीस्वरूप दामोदरने
मन्त्र पढ़कर अपने श्रीहस्तको उस मछुवारेके सिरपर
रख दिया। तब उन्होंने उस मछुवारेको तीन थप्पड़
लगानेके बाद कहा,—“तुम्हारा भूत भाग गया है। अब
डरनेकी कोई बात नहीं है।” ऐसा कहकर उन्होंने
मछुवारेको सुस्थिर किया॥ 60-62 ॥

एके प्रेम, आरे भय—द्विगुण अस्थिर।
भय-अंश गेल,—से हैल किछु धीर ॥ 63 ॥

अनुवाद—मछुवारेमें एक तो प्रेम, उसपर भी
भय—इसलिये पहले वह दोगुना अस्थिर था। अब
उसका भयवाला अंश तो दूर हो गया, इसलिये उसको
कुछ धैर्य आ गया ॥ 63 ॥

श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका परिचय देना :—
स्वरूप कहे,—“याँरे तुमि कर ‘भूत’-ज्ञान।
भूत नहे, तेंहो—कृष्णचैतन्य भगवान् ॥ 64 ॥
प्रेमावेशे पड़िला तेंहो समुद्रेर जले।
ताँरे तुमि उठाइला आपनार जाले ॥ 65 ॥
ताँर स्पर्शे हैल तोमार कृष्णप्रेमोदय।
भूत-प्रेत-ज्ञाने तोमार हैल महाभय ॥ 66 ॥

श्रीस्वरूपके द्वारा मछुवारेको महाप्रभुको
दिखलानेका आदेश :—
एबे भय गेल, तोमार मन हैल स्थिरे।
काँहा ताँरे उठाञाछ, देखाह आमारे ॥”67॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने मछुवारेसे कहा,—“जिन्हें
तुम भूत मान रहे हो, वे भूत नहीं अपितु वे भगवान्
श्रीकृष्णचैतन्य हैं। वे प्रेमके आवेशमें समुद्रके जलमें
जा पड़े थे, तुमने उन्हींको अपने जालमें पकड़कर
उठाया है। उनके स्पर्शसे ही तुममें कृष्णप्रेम उदित हुआ
है। उन्हें भूत-प्रेत समझनेके कारण तुम्हें बहुत भय
लगा। अब तुम्हारा भय दूर हो गया है और तुम्हारा
मन स्थिर हो गया है। अब तुम हमें दिखलाओ कि
तुमने उन्हें समुद्रसे निकालकर कहाँ रखा है॥” 64-67॥

बुद्धिविभ्रम :—
जालिया कहे,—“प्रभुरे देख्याछौं बारबार।
तेंहो नहेन एइ अतिविकृत आकार ॥”68॥

अनुवाद—मछुवारेने कहा,—“मैंने महाप्रभुको अनेक
बार देखा है। ये वे नहीं हैं, यह तो कोई बहुत-ही
विकृत-आकारका व्यक्ति है॥”68॥

श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुके प्रेमका वर्णन :—
स्वरूप कहे,—“ताँर हय प्रेमेर विकार।
अस्थि-सन्धि छाड़े, हय अति दीर्घकार ॥”69॥

अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदरने कहा,—“महाप्रभुमें प्रेमका
विकार उत्पन्न होता है, उसी कारण उनकी हड्डियोंके
जोड़ खुल जाते हैं और वे बहुत दीर्घकार हो जाते
हैं॥”69॥

मछुवारेके द्वारा सभीको महाप्रभुके दर्शन
करवाना; महाप्रभुकी अवस्था :—
शुनि’ सेइ जालिया आनन्दित हइल।
सबा लञा गेल, महाप्रभुरे देखाइल ॥ 70 ॥
भूमिते पड़िया आछेन दीर्घ सब काय।
जले श्वेत-तनु, बालु लाग्याछे गाय ॥ 71 ॥
अतिदीर्घ शिथिल तनु-चर्म नट्काय।
दूर पथ उठाञा आनन ना याय ॥ 72 ॥

अनुवाद—यह सुनकर मछुवारा आनन्दित हो गया।
उसने सभी भक्तोंको ले जाकर महाप्रभुके दर्शन
करवाये। महाप्रभु भूमिपर पड़े हुए थे, उनका शरीर
बहुत लम्बा हो गया था। बहुत समय तक जलमें
रहनेके कारण उनका शरीर सफेद पड़ गया था और
उनके पूरे शरीरपर बालू लगी हुई थी। महाप्रभुकी देह
बहुत लम्बी हो गयी थी और शिथिल होकर त्वचा
लटक गयी थी, इसलिये उन्हें बहुत दूर तक उठाकर
नहीं लाया जा सकता था॥ 70-72 ॥