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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2464

[ 18/117-121 अठारहवाँ अध्याय 447
महाप्रभुके द्वारा अपने वृत्तान्तका वर्णन :-
प्रभु कहे,—“स्वप्ने देखि, गेलाङ वृन्दावन।
देखि,—कृष्ण रास करेन गोपीगण-सने ॥ 117 ॥
जलक्रीड़ा करि' कैला वन्य-भोजने।
देखि' आमि प्रलाप कैलुँ, हेन लय मने ॥ ”118 ॥
महाप्रभुके इस महाभावके श्रवणसे अचैतन्यको भी कृष्णोन्मुखता रूपी चैतन्यकी प्राप्ति :-
एइ त' कहिलुँ प्रभुर समुद्र-पतन।
इहा येइ सुने, पाय चैतन्य-चरण ॥ 120 ॥
अनुवाद - महाप्रभुने कहा, — “मैं स्वप्नमें वृन्दावन गया था, जहाँ मैंने देखा कि श्रीकृष्ण गोपियोंके साथमें रास कर रहे हैं। श्रीकृष्ण और गोपियोंने जलक्रीड़ा करनेके पश्चात् वन-भोजन किया। मुझे ऐसा लगता है कि उसे देखकर ही मैंने प्रलाप किया होगा॥”117-118 ॥
अनुवाद - इस प्रकार मैंने महाप्रभुके समुद्रमें गिरनेकी लीलाका वर्णन किया है। इसे जो कोई भी श्रवण करेगा, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंकी अवश्य प्राप्ति होगी ॥ 120 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश।
चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 121 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुको स्नानके बाद घरपर लाना :-
इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे समुद्रपतनं नाम अष्टादशः परिच्छेदः।
तबे स्वरूप-गोसाञि ताँरे स्नान कराञा।
प्रभुरे लञा घर आइला आनन्दित हञा ॥ 119 ॥
अनुवाद - श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 121 ॥
अनुवाद - तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभुको स्नान करवाकर आनन्दपूर्वक उन्हें घर ले आये ॥ 119 ॥
श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें समुद्रपतन नामक अठारहवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।